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चुनौतियों को पीछे छोड़ नीलांबर-पीतांबर यूनिवर्सिटी के 17 साल पूरे, शिक्षा और शोध में कई बड़ी उपलब्धियां हासिल

Updated at : 17 Jan 2026 10:18 PM (IST)
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Nilamber Pitamber University

नीलांबर पीतांबर विश्वविद्यालय की स्थापना साल 2009 में हुई थी.

Medininagar News: नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय ने अपनी स्थापना के 17 वर्ष पूरे कर लिए हैं. सीमित संसाधनों और कई चुनौतियों के बावजूद एनपीयू ने शिक्षा, शोध और डिजिटल प्रणाली में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं. डॉ ऋचा सिंह के अनुसार, विश्वविद्यालय आज पलामू, गढ़वा और लातेहार के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा का प्रमुख केंद्र बन चुका है. रोजगारपरक शिक्षा, डिजिटल लर्निंग, स्थानीय समस्याओं पर शोध और नई शिक्षा नीति के तहत इनोवेशन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है.

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Medininagar News: नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय (एनपीयू) ने अपनी स्थापना के 17 वर्ष पूरे कर लिए हैं. इस अवसर पर विश्वविद्यालय की शैक्षणिक यात्रा, संघर्ष और उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए मेदिनीनगर के जीएलए कॉलेज के राजनीति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ ऋचा सिंह ने कहा कि एनपीयू ने सीमित संसाधनों और अनेक चुनौतियों के बावजूद शिक्षा, शोध और डिजिटल सिस्टम के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है. उन्होंने कहा कि यह विश्वविद्यालय आज पलामू प्रमंडल के लिए केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि बौद्धिक चेतना और क्षेत्रीय विकास का मजबूत केंद्र बन चुका है.

रांची विश्वविद्यालय से अलग होकर बना क्षेत्रीय शिक्षा का केंद्र

डॉ ऋचा सिंह ने बताया कि नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय पहले रांची विश्वविद्यालय का अंग था. इसकी स्थापना 17 जनवरी 2009 को हुई थी. विश्वविद्यालय की मांग को लेकर वर्षों तक छात्रों और शिक्षकों ने आंदोलन किया. सड़क से लेकर सदन तक संघर्ष हुआ, जिसके बाद पलामू के अमर शहीद नीलांबर-पीतांबर के नाम पर इस विश्वविद्यालय की स्थापना संभव हो सकी. उन्होंने कहा कि इस विश्वविद्यालय का मुख्य उद्देश्य पलामू, गढ़वा और लातेहार जिलों के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए रांची जैसी दूरस्थ जगहों पर भटकने से बचाना और क्षेत्र को शिक्षा का मजबूत केंद्र बनाना था.

17 सालों में हुआ शैक्षणिक विस्तार

स्थापना के बाद से विश्वविद्यालय ने कई विकासात्मक पड़ाव तय किए हैं. वर्तमान में इसके अंतर्गत अनेक अंगीभूत और संबद्ध कॉलेज संचालित हो रहे हैं. पारंपरिक स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के साथ-साथ बीएड, एमबीए और मेडिकल शिक्षा जैसे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की शुरुआत की गई है. डॉ सिंह ने कहा कि इससे न केवल छात्रों को विविध विषयों में पढ़ाई का अवसर मिला है, बल्कि क्षेत्र में उच्च शिक्षा का दायरा भी व्यापक हुआ है.

शिक्षकों की कमी से लेकर नई शिक्षा नीति तक की चुनौतियां

उन्होंने स्वीकार किया कि इस 17 सालों की यात्रा में विश्वविद्यालय को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. शिक्षकों की भारी कमी, बुनियादी ढांचे का अभाव और नई शिक्षा नीति का क्रियान्वयन बड़ी चुनौतियां रहीं. हालांकि, उन्होंने संतोष जताते करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय अब संक्रमण काल से बाहर निकल रहा है. विभिन्न स्तरों पर नई नियुक्तियां हुई हैं. परीक्षा प्रणाली को डिजिटल किया गया है और प्रशासनिक सुधारों के कारण शैक्षणिक व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है.

रोजगारपरक शिक्षा और शोध को मिली नई दिशा

डॉ ऋचा सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि समाज की बौद्धिकता, संस्कृति और आर्थिक विकास को मजबूती देना है. इसी सोच के तहत इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज की स्थापना की गई है, ताकि छात्रों को रोजगारपरक शिक्षा मिल सके. उन्होंने बताया कि पलामू क्षेत्र की प्रमुख समस्याओं जैसे जल संरक्षण, पर्यावरण नीति, पंचायत व्यवस्था और जनजातीय अध्ययन पर शोध कार्य किए जा रहे हैं. इससे विश्वविद्यालय का शोध स्थानीय समाज से सीधे जुड़ रहा है.

डिजिटल लर्निंग और भविष्य की तैयारी

शैक्षणिक गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म का लगातार इस्तेमाल किया जा रहा है. डॉ सिंह ने कहा कि इंडस्ट्री 4.0 और जेन-जेड के दौर में विश्वविद्यालय को नवाचार और कौशल विकास का केंद्र बनना होगा. उन्होंने जोर देते हुए कहा कि मजबूत फिजिकल कैंपस के साथ-साथ डिजिटल कैंपस भी समय की आवश्यकता है. नई शिक्षा नीति के अंतर्गत भारतीय ज्ञान परंपरा और अंतरविषयक अध्ययन को बढ़ावा देकर विद्यार्थियों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार किया जा सकता है.

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छात्र कल्याण और राष्ट्र निर्माण पर फोकस

डॉ ऋचा सिंह ने छात्राओं के लिए बेहतर छात्रावास, परामर्श केंद्र और तनाव प्रबंधन सुविधाओं को प्राथमिकता देने की आवश्यकता बताई. उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का लक्ष्य केवल डिग्री देना नहीं, बल्कि ऐसी प्रतिभाशाली युवा पीढ़ी तैयार करना है, जो समाज और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा सके.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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