सरकार पहल करे, तो शुरू हो सकता है उत्पादन
Updated at : 10 Jul 2018 6:36 AM (IST)
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मेदिनीनगर : पलामू की लाइफ लाइन राजहरा कोलियरी पर लगा ग्रहण आखिर कब हटेगा? यह एक ऐसा सवाल है जो पलामू के लोगों को मन मस्तिष्क में है. पुराने लोगों से बात करें तो वह कहते हैं कि राजहरा कोलियरी का उत्पादन ठप होना जैसे इस इलाका का सूरज डूब जाने के बराबर है. राजहरा […]
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मेदिनीनगर : पलामू की लाइफ लाइन राजहरा कोलियरी पर लगा ग्रहण आखिर कब हटेगा? यह एक ऐसा सवाल है जो पलामू के लोगों को मन मस्तिष्क में है. पुराने लोगों से बात करें तो वह कहते हैं कि राजहरा कोलियरी का उत्पादन ठप होना जैसे इस इलाका का सूरज डूब जाने के बराबर है. राजहरा कोलियरी में उत्पादन फिर से शुरू हो इसके लिए प्रयास हो रहे हैं, दावे किये जा रहे हैं पर प्रयास का कोई सकारात्मक नतीजा सामने नहीं आया है.जपला सीमेंट फैक्टरी के मामले में जिस तरह लोगों को नाउम्मीदी हाथ लगी वह सोचकर राजहरा कोलियरी के मामले में सहम जा रहे हैं. ऐसा न हो कि राजहरा कोलियरी भी इतिहास बन जाये.
कब से ठप है उत्पादन : राजहरा कोलियरी में उत्पादन वर्ष 2010-11 से बंद है. सेक्शन -22 लगने के कारण कोलियरी में उत्पादन बंद हुआ था. सेक्शन 22 डीजीएमएस द्वारा लगाया गया था. तकनीकी कारणों से यह सेक्शन लगा था. क्योंकि उत्पादन करने के दौरान यह भी देखना है कि उत्खनन के दौरान कोई दुर्घटना न हो.
उसके बाद सेक्शन 22 हटा लेकिन उत्पादन ठप था. पुन: उत्पादन शुरू कराने के लिए पर्यावरण स्वीकृति जरूरी थी. इसके लिए प्रक्रिया शुरू हुई,लेकिन अब तक यह प्रक्रिया पूर्ण नहीं हुई है. वन पर्यावरण मामले को देखने के लिए राज्य स्तर पर बनी कमेटी द्वारा अभी तक कोलियरी में उत्पादन शुरू कराने के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं दिया गया.
कोलियरी के नाम पर होती रही है राजनीति : राजहरा कोलियरी में भले ही पिछले दस वर्षों से उत्पादन ठप है. लेकिन इस कोलियरी के नाम पर राजनीति भी खूब हुई है. इंटक के नेता चंद्रशेखर दुबे हो या फिर राजेंद्र सिंह. दोनों ने आकर भरोसा दिलाया है कि उत्पादन शुरू करा देंगे. वर्तमान सांसद बीडी राम तो इस मसले को लेकर गंभीरता से लगे भी हुए हैं.
क्या है मामला
राजहरा कोलियरी की जो परिधि है, वह पड़वा के नावाबाजर अंचल के अंतर्गत आता है. पर्यावरण स्वीकृति के लिए पड़वा अंचल द्वारा 235.73 एकड़ व नावाबाजार द्वारा 133.14 एकड़ भूमि की रिपोर्ट दी जानी थी. इसे लेकर कुछ वर्ष तक गतिरोध रहा. दोनों अंचल के अंचलाधिकारी ने बताया कि अंचल में खतियान नहीं है. इसके कारण वह रिपोर्ट नहीं दे सकते हैं. बाद में स्थल निरीक्षण कर रिपोर्ट देने की बात कही गयी थी. फिर भी रिपोर्ट नहीं दी गयी.
बाद में सीसीएल प्रबंधन द्वारा कुछ जमीन का खतियान उपलब्ध कराया गया जिसके आधार पर पड़वा अंचल की 67.55 व नावाबाजार अंचल की 43.95 एकड़ जमीन का अनापत्ति प्रमाण पत्र दिया गया. कूल 111 एकड़ जमीन का सर्टिफिकेट सीसीएल प्रबंधन द्वारा स्टेट लेबल एक्सपर्ट अप्रेजल कमेटी को दिया गया. कमेटी द्वारा यह कहा जा रहा है कि सीसीएल प्रबंधन ने पूर्व में 369 एकड़ जमीन के अनापत्ति प्रमाण पत्र के लिए आवेदन दिया था.
जब तक पूरी जमीन की रिपोर्ट नहीं देंगे तब तक कमेटी अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं दे सकती है. इसके कारण मामला लटका हुआ है. जानकारों की मानें तो 111 एकड़ भूमि का दस्तावेज कोलियरी प्रबंधन उपलब्ध कराया है. यदि शासन प्रशासन के स्तर से प्रयास किया जाये तो उस 111 एकड़ में भी उत्खनन का कार्य शुरू हो सकता है. उसमें भी यह कोलियरी पांच से सात साल चल सकता है.
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