झारखंड के खूंटी में 87 वर्षों से मनाई जा रही रामनवमी, अंग्रेज एसडीओ नहीं दे रहे थे जुलूस की अनुमति

Updated at : 23 Mar 2026 9:15 AM (IST)
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Khunti Ram Navami History

खूंटी में 1960 में मनाई गई रामनवमी की तस्वीर. फोटो: प्रभात खबर

Khunti Ram Navami History: झारखंड के खूंटी में 87 वर्षों से रामनवमी जुलूस की ऐतिहासिक परंपरा जारी है. 1939 में अंग्रेजी शासन के विरोध के बावजूद इसकी शुरुआत हुई थी. आज यह पर्व सामाजिक एकता, आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बन चुका है, जिसमें सैकड़ों मंडलियां और हजारों लोग शामिल होते हैं. इससे संबंधित पूरी खबर नीचे पढ़ें.

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खूंटी से भूषण कांसी की रिपोर्ट

Khunti Ram Navami History: परंपरा, आस्था और सामाजिक एकता का प्रतीक रामनवमी महोत्सव खूंटी में इस वर्ष भी ऐतिहासिक गौरव के साथ मनाया जाएगा. जिला मुख्यालय में करीब 87 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी लोगों के दिलों में वैसी ही श्रद्धा और उत्साह के साथ जीवित है, जैसी इसकी शुरुआत के समय थी.

खूंटी में कब शुरू हुआ था रामनवमी का जुलूस

खूंटी में रामनवमी जुलूस की शुरुआत वर्ष 1939 में हुई थी. बताया जाता है कि वर्ष 1938 में तत्कालीन अंग्रेज एसडीओ वेबस्टल जुलूस की अनुमति देने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन रामकिस्टो साव उर्फ घसिया साव, रामटहल भगत और नारायण चौधरी गिरधारी गंझु जैसे समाजसेवियों के अथक प्रयास से रांची के तत्कालीन डीसी ने इसकी अनुमति दी. इसके बाद दो झंडों के साथ पहला जुलूस निकाला गया, जिसने इतिहास रच दिया.

1950 में मेला और खेलकूद प्रतियोगिता की शुरुआत

प्रारंभिक वर्षों में यह पर्व केवल एक दिन चैत शुक्ल नवमी को मनाया जाता था, लेकिन समय के साथ इसकी भव्यता बढ़ती गई. वर्ष 1950 में दशमी के दिन आश्रम मैदान में मेला सह खेलकूद प्रतियोगिता की शुरुआत हुई, जिसका उद्घाटन तत्कालीन बिहार के राज्यपाल एमएस अन्ने ने किया था. अस्त्र-शस्त्र प्रदर्शन से प्रभावित होकर उन्होंने इस आयोजन की सराहना की थी.

इन लोगों ने निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

धीरे-धीरे खूंटी की पहचान पूरे प्रदेश में रामनवमी महोत्सव के लिए बनने लगी. आदित्य साहू, सुखू साहू, वनवारी सिंह, नंदकिशोर भगत, शिवअवतार चौधरी और कस्तूरी लाल सुरेंद्र मिश्रा जैसे लोगों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

15-20 दिन पहले शुरू हो जाती हैं तैयारियां

वर्तमान में शहर में 15-20 दिन पहले से ही तैयारियां शुरू हो जाती हैं. विभिन्न अखाड़ा और मंडलियां इस आयोजन को जीवंत बनाती हैं. 1950-60 के दशक में जहां करीब 60 मंडलियों की शोभायात्रा निकलती थी, वहीं आज भी उसी उत्साह के साथ ग्रामीण और शहरी क्षेत्र की सैकड़ों मंडलियां भाग लेती हैं.

क्या कहते हैं बुजुर्ग

75 वर्षीय आदित्य प्रसाद गुप्ता बताते हैं कि वे 1955 से इस परंपरा से जुड़े हुए हैं और आज भी प्रथम झंडा पूजा में उनकी अहम भूमिका रहती है. वे बताते हैं कि पहले हाथी-घोड़े और पारंपरिक वेशभूषा के साथ शोभायात्रा निकलती थी, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग उमड़ पड़ते थे.

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सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत की मिसाल

रामनवमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि खूंटी की सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत की जीवंत मिसाल है. इसमें सभी समुदायों की भागीदारी इसे और भी विशेष बनाती है. यह पर्व हर वर्ष लोगों के बीच भाईचारे, सौहार्द और आपसी विश्वास का संदेश देता है, जो खूंटी की पहचान बन चुका है.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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