झारखंड के दलमा में मिलीं तितलियों की पांच नई प्रजातियां, जैव विविधता के लिए बड़ी उपलब्धि
दलमा के जंगलों में पाई जाने वाली पांच नई प्रजातियों की तितलियों में ऑर्किड टिट (बाएं ऊपर), कॉपर फ्लैश (ऊपर बीच में), सफ्यूज्ड स्नो फ्लैट (ऊपर दाएं), रेड स्पॉट (बाएं नीचे) और पेंटेड कर्टिसन (दाहिने नीचे). फोटो: प्रभात खबर
Dalma Wildlife Sanctuary: दलमा वन्यजीव अभयारण्य सहित जमशेदपुर और पोड़ाहाट वन क्षेत्रों में तितलियों की पांच नई प्रजातियों की पुष्टि हुई है. शोध नोवा जियोडेसिया में प्रकाशित हुआ है. तीन प्रजातियां वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत संरक्षित हैं, जो झारखंड की समृद्ध जैव विविधता को दर्शाती हैं. पूरी खबर नीचे पढ़ें.
रांची से मनोज सिंह की रिपोर्ट
Dalma Wildlife Sanctuary: झारखंड के जंगलों से प्रकृति प्रेमियों के लिए खुशखबरी है. एक हालिया वैज्ञानिक अध्ययन में झारखंड के जमशेदपुर वन प्रभाग, पोड़ाहाट वन प्रभाग और दलमा वन्यजीव अभयारण्य में तितलियों की पांच नई प्रजातियों की उपस्थिति की पुष्टि की गई है. यह शोध ‘नोवा जियोडेसिया’ पत्रिका में जनवरी 2026 में प्रकाशित हुआ है. राजा घोष (वनरक्षी) और मोहम्मद अबू इमरान मल्लिक (शोधार्थी) का यह शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ है.
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तितलियों का ऑर्किड के पौधों के साथ संबंध
दलमा के जंगलों में पाई गईं तितलियों में ऑर्किड टिट ऑर्किड के पौधों के साथ अपने विशेष पारिस्थितिक संबंध के लिए जानी जाती है. कॉपर फ्लैश में नर और मादा के पंखों के रंग में स्पष्ट अंतर होता है. नर गहरे लाल-भूरे रंग के होते हैं, जबकि मादा हल्के नीले रंग की होती है. सफ्यूज्ड स्नो फ्लैट इंडोमलयन क्षेत्र की मूल निवासी है और अक्सर छायादार सदाबहार जंगलों में अपने पंख फैलाकर आराम करती देखी जाती है. रेड स्पॉट एक छोटी तितली है, जिसके पंखों के निचले हिस्से पर लाल-भूरे रंग की धारियों का पैटर्न होता है. पेंटेड कर्टिसन प्रजाति की मादाएं शिकारियों से बचने के लिए ”मैगपाई क्रो” तितली की नकल करती है.
कानूनी संरक्षण और महत्व
यह खोज केवल शैक्षणिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसका कानूनी महत्व भी है. इन पांच में से तीन प्रजातियां भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत संरक्षित हैं. ऑर्किड टिट को अनुसूची-1में रखा गया है, यह लुप्त प्राय है. इसे भारत में उच्चतम स्तर की कानूनी सुरक्षा प्रदान है. रेड स्पॉट और पेंटेड कर्टिसन को अनुसूची-II के तहत वर्गीकृत किया गया है. अध्ययन के अनुसार, इन संरक्षित प्रजातियों की मौजूदगी झारखंड के जंगलों के उच्च पारिस्थितिक (इकोलॉजी) मूल्य को दर्शाती है. यहां मुख्य रूप से साल के वृक्ष पाये जाते हैं.
क्यों है संरक्षण की आवश्यकता
तितलियां बायोइंडिकेटर (पर्यावरण स्वास्थ्य के संकेतक) के रूप में कार्य करती हैं. वह जलवायु और आवास की गुणवत्ता में होने वाले बदलावों के प्रति बहुत संवेदनशील होती हैं. शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि आवासीय व्यवस्था में छेड़छाड़ और मानवीय गतिविधियां इन नाजुक जीवों के लिए खतरा पैदा कर रही हैं.
अध्ययन में की गयी सिफारिश
- स्थानीय पौधों और पराग स्रोतों को लगाकर खराब हो चुके हैबिटेट का पुनरुद्धार किया जाए.
- तितलियों की आबादी पर नजर रखने के लिए दीर्घकालिक निगरानी की जाए.
- वन प्रबंधन योजनाओं में तितली संरक्षण को भी शामिल किया जाए.
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क्या कहते हैं वनरक्षी राजा घोष
दलमा रेंज के वनरक्षी राजा घोष का कहना है कि उन्हें जंगलों में घूमने का शौक है. कोरोना काल के बाद से अब तक कुछ नई किस्म की तितलियां दिखी थीं. इसी का अध्ययन चल रहा था. कई प्रकार के शोध के बाद झारखंड में इसके पाए जाने की पुष्टि हुई है. इसको शोध में प्रकाशित किया गया है.
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