Jamshedpur News : डॉ. बिक्रम बिरूली ने पहला ऑटोमैटिक स्पीच रिकग्निशन डेटासेट हो भाषा में किया तैयारअब विलुप्त हो रहे भाषाओं को डिजिटल रूप से संरक्षित कर भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंचाया जा सकता हैएआई तकनीक के माध्यम से आदिवासी भाषाओं को मोबाइल एप्लिकेशन और डिजिटल शिक्षा में शामिल किया जा सकेगाहो भाषा के संरक्षण के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की पहचान का अनुप्रयोग विषय पर किया शोधवरीय संवाददाता, जमशेदपुरडॉ. बिक्रम बिरूली ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) पर हो भाषा के संरक्षण से जुड़ा पहला पीएचडी पूर्ण किया है. उनका शोध विषय था- “हो भाषा के संरक्षण के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की पहचान का अनुप्रयोग.” इस शोध का मार्गदर्शन डॉ. यशवंत दास और डॉ. सत्यरंजन दास ने किया. अपने शोध में उन्होंने ऑटोमैटिक स्पीच रिकग्निशन (एएसआर), नेम्ड एंटिटी रिकग्निशन (एनइआर) और पार्ट-ऑफ-स्पीच टैगिंग (पीओसी) जैसे उन्नत एआई अनुप्रयोगों पर कार्य किया. डॉ. बिरूली द्वारा यह शोध कार्य हो भाषा को डिजिटल युग में जीवंत रखने की दिशा में एक वैज्ञानिक और सामाजिक प्रयास है. अपने शोध में डॉ. बिरूली ने एआई की आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर भाषा संरक्षण की नयी राह खोली. उन्होंने पहला ऑटोमैटिक स्पीच रिकग्निशन (एएसआर) डेटासेट हो भाषा में तैयार किया, जो इस क्षेत्र में विश्वस्तर पर अद्वितीय है. इस प्रक्रिया के माध्यम से भाषा की ध्वनियों, शब्दों और वाक्य संरचनाओं को डिजिटल रूप में संग्रहित कर मशीनों को सिखाया गया कि वे हो भाषा को पहचान सकें. इसके अलावा उन्होंने टेक्स्ट कॉर्पस निर्माण पर विशेष ध्यान दिया, जिससे हो भाषा के शब्द-संग्रह, व्याकरणिक पैटर्न और उच्चारण को वैज्ञानिक रूप से व्यवस्थित किया गया. डॉ. बिरूली ने यह दिखाया कि यदि एआई का उपयोग सही दिशा में किया जाये, तो कई आदिवासी भाषाओं को विलुप्त होने से बचाया जा सकता है. एआई आधारित अनुसंधान से इन भाषाओं को डिजिटल रूप से संरक्षित कर भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंचाया जा सकता है. यह शोध न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह युवाओं और शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनेगा. आने वाले समय में एआई तकनीक के माध्यम से आदिवासी भाषाओं को मोबाइल एप्लिकेशन, डिजिटल शिक्षा और सांस्कृतिक अभिलेखागार में शामिल किया जा सकेगा. गरीबी व संघर्ष में गुजरा बिक्रम बिरूली का बचपनडॉ. बिक्रम बिरूली ओडिशा के मयूरभंज जिले के कप्तीपदा ब्लॉक के सिमलीपाल वन क्षेत्र के बीच स्थित माटकाम साही के निवासी हैं. उन्होंने गरीबी और संघर्ष में अपनी पढ़ाई को पूरा किया है. उनका जन्म 1996 में हुआ था. उनके पिताजी पुरुषोत्तम बिरुली गाय-बकरी चराकर परिवार का भरण-पोषण करते थे. जबकि उनकी माताजी जंगल से पत्ते इकट्ठे कर छह बच्चों का जीवन चलाती थीं. बचपन में बिक्रम अपने पिता के साथ जंगल में पशु चराया करते थे. लेकिन अपने साथ किताब, कॉपी और पेन जरूर रखते थे. 1999 में ओडिशा में आये भीषण चक्रवात ने उनका घर उजाड़ दिया. उनका परिवार कई दिनों तक सहजन साग व पानी पीकर जीवित रहा. अपनी पढ़ाई के लिए बिक्रम ने शाल और अन्य वन उत्पाद इकट्ठा कर बाजार में बेचने का भी काम किया. साथ ही गांव के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर कुछ आमदनी की. अपनी पढ़ाई व परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए रात में करते थे कामडॉ. बिक्रम बिरूली जवाहर नवोदय विद्यालय, बागुड़ी (बालेश्वर) के छात्र रह चुके हैं. जहां से उन्होंने वर्ष 2013 में प्लस-2 विज्ञान (कंप्यूटर विज्ञान) की पढ़ाई पूरी की. 17 वर्ष की उम्र में परिवार की जिम्मेदारी के दबाव में वे पंजाब काम करने के लिए चले गये. वहां एजीसी पटियाला (पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से संबद्ध कॉलेज) में कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग में बीटेक में दाखिला लिया. वे दिन में कॉलेज में पढ़ाई और रात में काम करते थे. वर्ष 2018 में उन्होंने कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस, भुवनेश्वर में एमएससी (इंडिजिनस नॉलेज, साइंस एंड टेक्नोलॉजी) में प्रवेश लिया. अपनी मातृभाषा हो और लिपि वारंग क्षिति को दस्तावेजीकरण करने के उद्देश्य से उन्होंने ‘हो समाज लाइव’ नाम से एक यूट्यूब चैनल शुरू किया. जिसकी वर्तमान समय में लाखों सब्सक्राइबर हैं.
Updated at : 13 Oct 2025 1:10 AM (IST)
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Jamshedpur News : डॉ. बिक्रम बिरूली ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) पर हो भाषा के संरक्षण से जुड़ा पहला पीएचडी पूर्ण किया है.
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डॉ. बिक्रम बिरूली ने पहला ऑटोमैटिक स्पीच रिकग्निशन डेटासेट हो भाषा में किया तैयार
अब विलुप्त हो रहे भाषाओं को डिजिटल रूप से संरक्षित कर भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंचाया जा सकता है
एआई तकनीक के माध्यम से आदिवासी भाषाओं को मोबाइल एप्लिकेशन और डिजिटल शिक्षा में शामिल किया जा सकेगा
हो भाषा के संरक्षण के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की पहचान का अनुप्रयोग विषय पर किया शोध
Jamshedpur News :
डॉ. बिक्रम बिरूली ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) पर हो भाषा के संरक्षण से जुड़ा पहला पीएचडी पूर्ण किया है. उनका शोध विषय था- “हो भाषा के संरक्षण के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की पहचान का अनुप्रयोग.” इस शोध का मार्गदर्शन डॉ. यशवंत दास और डॉ. सत्यरंजन दास ने किया. अपने शोध में उन्होंने ऑटोमैटिक स्पीच रिकग्निशन (एएसआर), नेम्ड एंटिटी रिकग्निशन (एनइआर) और पार्ट-ऑफ-स्पीच टैगिंग (पीओसी) जैसे उन्नत एआई अनुप्रयोगों पर कार्य किया. डॉ. बिरूली द्वारा यह शोध कार्य हो भाषा को डिजिटल युग में जीवंत रखने की दिशा में एक वैज्ञानिक और सामाजिक प्रयास है. अपने शोध में डॉ. बिरूली ने एआई की आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर भाषा संरक्षण की नयी राह खोली. उन्होंने पहला ऑटोमैटिक स्पीच रिकग्निशन (एएसआर) डेटासेट हो भाषा में तैयार किया, जो इस क्षेत्र में विश्वस्तर पर अद्वितीय है. इस प्रक्रिया के माध्यम से भाषा की ध्वनियों, शब्दों और वाक्य संरचनाओं को डिजिटल रूप में संग्रहित कर मशीनों को सिखाया गया कि वे हो भाषा को पहचान सकें. इसके अलावा उन्होंने टेक्स्ट कॉर्पस निर्माण पर विशेष ध्यान दिया, जिससे हो भाषा के शब्द-संग्रह, व्याकरणिक पैटर्न और उच्चारण को वैज्ञानिक रूप से व्यवस्थित किया गया. डॉ. बिरूली ने यह दिखाया कि यदि एआई का उपयोग सही दिशा में किया जाये, तो कई आदिवासी भाषाओं को विलुप्त होने से बचाया जा सकता है. एआई आधारित अनुसंधान से इन भाषाओं को डिजिटल रूप से संरक्षित कर भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंचाया जा सकता है. यह शोध न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह युवाओं और शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनेगा. आने वाले समय में एआई तकनीक के माध्यम से आदिवासी भाषाओं को मोबाइल एप्लिकेशन, डिजिटल शिक्षा और सांस्कृतिक अभिलेखागार में शामिल किया जा सकेगा.गरीबी व संघर्ष में गुजरा बिक्रम बिरूली का बचपन
डॉ. बिक्रम बिरूली ओडिशा के मयूरभंज जिले के कप्तीपदा ब्लॉक के सिमलीपाल वन क्षेत्र के बीच स्थित माटकाम साही के निवासी हैं. उन्होंने गरीबी और संघर्ष में अपनी पढ़ाई को पूरा किया है. उनका जन्म 1996 में हुआ था. उनके पिताजी पुरुषोत्तम बिरुली गाय-बकरी चराकर परिवार का भरण-पोषण करते थे. जबकि उनकी माताजी जंगल से पत्ते इकट्ठे कर छह बच्चों का जीवन चलाती थीं. बचपन में बिक्रम अपने पिता के साथ जंगल में पशु चराया करते थे. लेकिन अपने साथ किताब, कॉपी और पेन जरूर रखते थे. 1999 में ओडिशा में आये भीषण चक्रवात ने उनका घर उजाड़ दिया. उनका परिवार कई दिनों तक सहजन साग व पानी पीकर जीवित रहा. अपनी पढ़ाई के लिए बिक्रम ने शाल और अन्य वन उत्पाद इकट्ठा कर बाजार में बेचने का भी काम किया. साथ ही गांव के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर कुछ आमदनी की.अपनी पढ़ाई व परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए रात में करते थे काम
डॉ. बिक्रम बिरूली जवाहर नवोदय विद्यालय, बागुड़ी (बालेश्वर) के छात्र रह चुके हैं. जहां से उन्होंने वर्ष 2013 में प्लस-2 विज्ञान (कंप्यूटर विज्ञान) की पढ़ाई पूरी की. 17 वर्ष की उम्र में परिवार की जिम्मेदारी के दबाव में वे पंजाब काम करने के लिए चले गये. वहां एजीसी पटियाला (पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से संबद्ध कॉलेज) में कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग में बीटेक में दाखिला लिया. वे दिन में कॉलेज में पढ़ाई और रात में काम करते थे. वर्ष 2018 में उन्होंने कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस, भुवनेश्वर में एमएससी (इंडिजिनस नॉलेज, साइंस एंड टेक्नोलॉजी) में प्रवेश लिया. अपनी मातृभाषा हो और लिपि वारंग क्षिति को दस्तावेजीकरण करने के उद्देश्य से उन्होंने ‘हो समाज लाइव’ नाम से एक यूट्यूब चैनल शुरू किया. जिसकी वर्तमान समय में लाखों सब्सक्राइबर हैं.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
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