कोल्हान विश्वविद्यालय का मेरे प्रति रवैया पक्षपातपूर्ण, किया जा रहा त्रस्त

Updated:
विज्ञापन

जमशेदपुर : एबीएम कॉलेज की प्राचार्य डॉ मुदिता चंद्रा ने कोल्हान विश्वविद्यालय के कुलसचिव को पत्र लिखा है. पत्र में प्राचार्य ने आरोप लगाया है कि विवि प्रशासन उनके प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया अपना रहा है. उन्हें त्रस्त किया जा रहा है. प्राचार्य ने अपने पत्र में हिंदी विभाग में शोध पंजीयन एवं शोध समिति के […]

विज्ञापन

जमशेदपुर : एबीएम कॉलेज की प्राचार्य डॉ मुदिता चंद्रा ने कोल्हान विश्वविद्यालय के कुलसचिव को पत्र लिखा है. पत्र में प्राचार्य ने आरोप लगाया है कि विवि प्रशासन उनके प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया अपना रहा है. उन्हें त्रस्त किया जा रहा है. प्राचार्य ने अपने पत्र में हिंदी विभाग में शोध पंजीयन एवं शोध समिति के गठन को लेकर सवाल उठाये हैैं. पत्र में कहा गया है कि डॉ मुदिता चंद्रा के निर्देशन में शोध कार्य के लिए पांच छात्राओं की ओर से विभाग में आवेदन जमा किया गया.

आपके शहर में

विज्ञापन

आठ माह का समय गुजरने के बावजूद संबंधित छात्राओं के पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी नहीं की गयी. पूछने पर बताया गया कि बतौर प्राचार्य डॉ मुदिता चंद्रा शोध करा सकती हैं अथवा नहीं. इससे संबंधित निर्देश विवि से मांगा गया है. अब तक इसका जवाब प्राप्त नहीं हुआ है. पत्र में उन्होंने कहा है कि राज्य के दूसरे विवि में नियुक्त प्राचार्य शोध करवा रहे हैं. फिर उनके लिए विभागीय स्तर पर निर्देश लेने की आवश्यकता क्यों पड़ी.

उन्होंने झारखंड सरकार द्वारा प्रकाशित झारखंड गजट का हवाला देते हुए दावा किया है कि प्राचार्य को शिक्षक मानते हुए उनके पद को शैक्षणिक माना गया है. इसलिए प्राचार्य के अवकाश ग्रहण की उम्र शिक्षकों की तरह 65 वर्ष रखी गयी है. पत्र में कहा गया है कि सभी तथ्यों को देखकर लगाता है कि विवि का रवैया दुर्भाग्यपूर्ण है. इस व्यवहार से वह मानसिक तनाव में हैं. इस मामले को एकेडमिक काउंसिल में रखकर समाधान की मांग की है.

शोध समिति पर सवाल : डॉ मुदिता चंद्रा ने अपने पत्र में विभागीय स्तर पर गठित शोध समिति पर भी सवाल उठाये हैं. दावा किया गया है कि समिति में कुछ सदस्यों को बार-बार रखा जा रहा है. कई वरीय शिक्षक विवि के अलग-अलग कॉलेजों में कार्यरत हैं. उन्हें डीआरसी में सदस्य नहीं बनाया जा रहा. अल्पसंख्यक कॉलेज के शिक्षकों को डीआरसी व पीजीआरसी में सदस्य बनाने के प्रावधानों के बारे में भी प्राचार्य ने सवाल खड़ा किया है.

सहायक प्राध्यापकों के समिति के सदस्य बनाने में वरीयता की अनदेखी करने का आरोप लगाया है. कहा है कि 10,000 एजीपी के साथ प्रोफेसर हूं. फिर भी डीआरसी व पीजीआरसी का सदस्य बनने का अधिकार क्यों नहीं. कहा कि यूनिवर्सिटी लॉ का हवाला देते हुए पूछा गया है कि अगर प्राचार्य डीन ऑफ फैकल्टी बन सकता है तो शोध समिति का सदस्य क्यों नहीं.

विज्ञापन

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola