विश्व आदिवासी दिवस पर विनोबा भावे विश्वविद्यालय में व्याख्यान, आधुनिक विकास मॉडल पर उठे सवाल

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विश्व आदिवासी दिवस पर विभावि के राजनीति विज्ञान विभाग में डॉ. रंजीत कुमार महली ने पर्यावरण और आदिवासी जीवन पद्धति के महत्व पर विशेष व्याख्यान दिया।

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हजारीबाग: विश्व आदिवासी दिवस पर विनोबा भावे विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग में सोमवार को वर्चुअल मोड में व्याख्यान हुआ. मुख्य वक्ता नीलांबर पीतांबर विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्राध्यापक डॉ रंजीत कुमार महली थे. ब्यख्यान का विषय पर्यावरण प्रकृति और आदिवासी था. विषय प्रवेश विभागाध्यक्ष डॉ सुकल्याण मोइत्रा ने किया.

डॉ महली ने नौ अगस्त के दिन को जनजाति दिवस के रूप में मनाये जाने के महत्व पर प्रकाश डाला. उन्होंने युद्ध, महामारी, पर्यावरण का विनाश आदि वर्तमान समय की कई चुनौतियां को गिनाया. बताया कि यह सब प्रकृति और पर्यावरण से जुड़ा हुआ है. इन सब का दुष्प्रभाव पर्यावरण पर पड़ रहा है.

उन्होंने बताया कि यह तथाकथित आधुनिकता को बनाये रखने के लिए विश्व आज भौतिकता और उसके लिए विनाश और संघर्ष की राह पर चल पड़ाी है. उन्होंने कहा कि लोग आदिवासियों को गलती से पिछड़ा समझ लेते हैं. लेकिन जब हम उनकी भाषा, उनकी धार्मिक आस्था, विविध ज्ञान और परंपरा का अध्ययन करते हैं तो हम जान पाते हैं कि यह किसी भी दृष्टिकोण से पिछड़े लोग नहीं है. उन्होंने कहा कि आदिवासियत एक संपूर्ण जीवन पद्धति है.

जीने का ऐसा तौर तरीका है, जिससे किसी को नुकसान नहीं होता. कहीं विनाश नहीं होता. डॉ महली ने कहा यदि सुख पाना है तो कृत्रिम सभ्यता को छोड़ प्रकृति की ओर लौटना होगा. आज प्रकृति की कीमत पर विकास हो रहा है, जो खतरनाक है.

इससे असमानता और असंतोष बढ़ रहा है. अंत में उन्होंने बताया कि पर्यावरण को और प्रकृति को समझने के लिए आदिवासी को समझना होगा और इन्हीं के पास उपलब्ध जीवन शैली को अपनाना होगा. कार्यक्रम में शिक्षक, विद्यार्थी जुड़े थे. धन्यवाद ज्ञापन डॉ अशोक राम ने किया.


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