हजारीबाग के सीआरसी केंद्र बने ‘भूत बंगला’, शिक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

Published by :KumarVishwat Sen
Published at :07 May 2026 3:39 PM (IST)
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Hazaribagh News

हजारीबाग में भूत बंगला बना सीआरसी केंद्र. फोटो: प्रभात खबर

Hazaribagh News: हजारीबाग के कई सीआरसी केंद्र बदहाल और जर्जर स्थिति में पहुंच गए हैं. भवनों की खराब हालत, सुविधाओं की कमी और राशि आवंटन में गड़बड़ी के आरोपों से शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं. डीईओ ने जांच और खर्च रिपोर्ट लेने की बात कही है. इससे जुड़ी खबर नीचे पढ़ें.

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हजारीबाग से आरिफ की रिपोर्ट

Hazaribagh News: झारखंड के हजारीबाग जिले में समग्र शिक्षा अभियान के तहत प्राथमिक से माध्यमिक यानी कक्षा एक से दसवीं तक के सरकारी स्कूलों की शैक्षणिक गुणवत्ता सुधारने के लिए 112 संकुल संसाधन केंद्र (सीआरसी) स्थापित किए गए हैं. इन केंद्रों के अधीन जिले के 1484 सरकारी स्कूल संचालित हो रहे हैं. सीआरसी का मुख्य उद्देश्य स्कूलों में शिक्षण व्यवस्था को मजबूत करना, शिक्षकों को प्रशिक्षण देना और विभिन्न शैक्षणिक गतिविधियों की निगरानी करना है.

सबसे अधिक विष्णुगढ़ और चौपारण में सीआरसी

सीआरसी केंद्रों में संकुल साधन सेवी (सीआरपी) की नियुक्ति की गई है. इन्हें झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद (जेईपीसी) की ओर से हर महीने मानदेय दिया जाता है. जिले में सबसे अधिक 12-12 सीआरसी विष्णुगढ़ और चौपारण प्रखंड में हैं, जबकि दारू और चलकुसा प्रखंड में सबसे कम तीन-तीन सीआरसी केंद्र संचालित हैं.

पंचायत स्तर पर शिक्षा व्यवस्था की अहम कड़ी

सीआरसी केंद्र पंचायत स्तर पर सरकारी स्कूलों के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. स्कूलों के रखरखाव, शिक्षकों की उपस्थिति, शिक्षण गतिविधियों की निगरानी और बच्चों की पढ़ाई की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी इन केंद्रों पर होती है. शिक्षकों के प्रशिक्षण और विभागीय योजनाओं के क्रियान्वयन में भी इनकी भूमिका अहम मानी जाती है. लेकिन, जिले के कई सीआरसी केंद्र अपनी बदहाल स्थिति के कारण खुद सवालों के घेरे में हैं.

कई सीआरसी भवन जर्जर, दिखते हैं ‘भूत बंगला’ जैसे

प्रशासनिक देखरेख के अभाव में जिले के कई सीआरसी केंद्र बदहाल स्थिति में पहुंच चुके हैं. कई भवन इतने जर्जर हो चुके हैं कि उनके गिरने का खतरा बना हुआ है. कई केंद्रों में शिक्षकों के बैठने तक की उचित व्यवस्था नहीं है. साफ-सफाई का अभाव, पेयजल की कमी और भवनों के आसपास उगी झाड़ियां इन केंद्रों की स्थिति को और खराब बना रही हैं. कई सीआरसी केंद्रों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो वहां कोई गतिविधि नहीं होती और भवन वीरान पड़े हों. स्थानीय शिक्षा कर्मियों का कहना है कि अगर समय रहते इन भवनों की मरम्मत और देखभाल नहीं हुई तो स्थिति और गंभीर हो सकती है.

राशि आवंटन में गड़बड़ी के आरोप

सीआरसी केंद्रों के रखरखाव, स्टेशनरी और अन्य आवश्यक सामग्रियों की खरीदारी के लिए 31 मार्च से पहले कुछ केंद्रों को राशि आवंटित की गई थी. एक सीआरसी को 23 हजार रुपये दिए गए. इस हिसाब से 112 केंद्रों के लिए कुल 25.76 लाख रुपये खर्च होने थे. बताया जा रहा है कि इसमें आठ हजार रुपये सीआरपी के बैंक खाते में भेजे गए, जबकि शेष राशि वेंडर के खाते में ट्रांसफर कर दी गई. आरोप है कि जिन सामानों की खरीदारी के लिए राशि भेजी गई, वे अब तक कई सीआरसी केंद्रों तक नहीं पहुंचे हैं. इसी को लेकर शिक्षा कर्मियों के बीच सवाल उठने लगे हैं कि आखिर बिना सामग्री आपूर्ति के सरकारी राशि वेंडर को क्यों भेजी गई. कई लोग इसे कमीशनखोरी और वित्तीय अनियमितता से जोड़कर देख रहे हैं.

कहां कितना सीआरसी

  • बरही: 07
  • बड़कागांव: 09
  • बरकट्ठा: 07
  • विष्णुगढ़: 12
  • चरकुला: 03
  • चौपारण: 12
  • चुरचू: 05
  • डाडी: 05
  • दारू: 03
  • सदर: 07
  • इचाक: 11
  • कटकमदाग: 05
  • कटकमसांडी: 09
  • केरेडारी: 08
  • पदमा: 04
  • टाटीझरिया: 05

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क्या कहते हैं डीईओ

जिला शिक्षा पदाधिकारी (डीईओ) सह जिला कार्यक्रम पदाधिकारी प्रवीण रंजन ने कहा कि सीआरसी को व्यवस्थित करने के लिए 31 मार्च 2026 से पहले राशि का आवंटन किया गया है. उन्होंने कहा कि जिस सीआरसी को राशि मिली है, उससे खर्च की रिपोर्ट ली जाएगी. वहीं, जिस सीआरसी को राशि नहीं मिली है, उससे कारण पूछा जाएगा.

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लेखक के बारे में

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कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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