नक्सली गढ़ में जन्मे, देश के लिए दी शहादत

Published at :20 Sep 2016 8:30 AM (IST)
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नक्सली गढ़ में जन्मे, देश के लिए दी शहादत

शहीद के पैतृक गांव उरू में न चलने के लिए सड़क है, न स्वास्थ्य सेवा की व्यवस्था गांव में सरकारी सुविधाओं का घोर अभाव शहीद के गांव से दुर्जय पासवान उड़ी में आतंकी हमले में शहीद हुए नायमन कुजूर का पैतृक गांव चैनपुर प्रखंड का कुरुमगढ़ थाना का उरू गांव है. उरू गांव गुमला से […]

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शहीद के पैतृक गांव उरू में न चलने के लिए सड़क है, न स्वास्थ्य सेवा की व्यवस्था
गांव में सरकारी सुविधाओं का घोर अभाव
शहीद के गांव से दुर्जय पासवान
उड़ी में आतंकी हमले में शहीद हुए नायमन कुजूर का पैतृक गांव चैनपुर प्रखंड का कुरुमगढ़ थाना का उरू गांव है. उरू गांव गुमला से 15 किमी (जंगली रास्ता) दूर है. सड़क से जाने के लिए 80 किमी की दूरी तय करना पड़ता है.
मुख्य सड़क से गांव तक जाने के लिए सड़क नहीं है और नक्सल प्रभावित इलाका है. प्रशासन के अधिकारी भी कभी गांव नहीं जाते. नायमन के शहीद होने की खबर मिलने पर सोमवार को प्रभात खबर शहीद के गांव पहुंचा. नायमन कुजूर के शहादत की जानकारी गांव के लोगों को प्रभात खबर के माध्यम से ही मिली. परिजन के साथ पूरा गांव रो पड़ा. पूरा गांव शहीद को एक बार देखना चाह रहा है.
15 किमी साइकिल चला कर गुमला आये वृद्ध पिता
शहीद के पिता का नाम महानंद कुजूर है. वृद्ध हैं, लेकिन बेटे के शहीद होने की सूचना पर साइकिल से 15 किमी की दूरी तय कर गुमला पहुंचे. वे जंगल व पहाड़ से होते हुए सोकराहातू के मार्ग से होकर गुमला आये और फिर बस में बैठ कर रांची अपने बेटे के शव को लेने रांची पहुंचे. साथ में उनके रिश्तेदार भी रांची गये.
घर के बगल में नक्सलियों ने स्लोगन लिखा है
शहीद के घर की दीवार के बगल में भाकपा माओवादियों ने एक अगस्त को शहीद दिवस को लेकर स्लोगन लिखा था. आज भी माओवादियों द्वारा किया गया दीवार लेखन है. बताया जा रहा है कि माओवादी अक्सर शहीद के घर की दीवार के बगल में ही स्लोगन लिखते हैं, क्योंकि नायमन के अलावा उसके एक भाई सेना में और एक झारखंड पुलिस में हैं.
चार भाई-बहनों में थे सबसे छोटे
शहीद नैमन कुजूर अपने चार भाइयों में सबसे छोटा था. बड़ा भाई सागरस कुजूर खेतीबारी करते है. नेम्हस कुजूर सेना में और जगदीश कुजूर झारखंड पुलिस में जवान है. मां सुशांति कुजूर नैमन के रांची स्थित कोकर खोराटोली के घर में रहती है. नायमन की पत्नी वीणा तिग्गा व सात साल का बेटा अभिनव कुजूर रांची में ही रहते हैं.
अच्छे फुटबॉलर थे नायमन कुजूर
शहीद नायमन कुजूर सेना में नौकरी करने से पहले खेल-कूद में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेता था. वह एक अच्छा फुटबॉलर थे. उनकी प्राथमिक शिक्षा गांव में ही हुई. इसके बाद वर्ष 2007 में वह सेना में भरती हुए. ग्रामीण बताते हैं कि नैमन जब भी गांव आता था, तो गांव वालों के लिए कुछ न कुछ सामान जरूर लेकर आता था. वह अपने पैसे से गांव में फुटबॉल मैच कराता था.
शहीद के शव को आज लाया जायेगा
गुमला के डीसी श्रवण साय ने बताया कि शहीद के शव को 20 सितंबर को सम्मान के साथ गुमला लाया जायेगा. पर्यटन मंत्री अमर बाउरी शहीद के शव को लेकर गुमला आयेंगे. गुमला में कुछ देर रूकने के बाद शहीद के शव को पैतृक गांव उरू ले जाया जायेगा, जहां उसका दफन क्रिया होगी. शहीद का गांव पूरा प्रशासनिक महकमा जायेगा.
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