कोरवा जाति के लोग खुद निबटाते हैं विवाद

Published at :02 Jan 2016 8:34 AM (IST)
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कोरवा जाति के लोग खुद निबटाते हैं विवाद

गांव में बिजली, पेयजल व सड़क जैसी सुविधाओं का घोर अभाव. दुर्जय पासवान गुमला : परमवीर अलबर्ट एक्का जारी प्रखंड के ऊंचे पहाड़ और घने जंगलों में स्थित कोरवा जाति के तीन गांव उरईकोना, बंधकोना और गुरूदकोना है. जिला मुख्यालय से 80 किमी दूर है. सरकारी सुविधाओं से जूझ रहे यहां कोरवा जातियों का अपना […]

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गांव में बिजली, पेयजल व सड़क जैसी सुविधाओं का घोर अभाव.

दुर्जय पासवान

गुमला : परमवीर अलबर्ट एक्का जारी प्रखंड के ऊंचे पहाड़ और घने जंगलों में स्थित कोरवा जाति के तीन गांव उरईकोना, बंधकोना और गुरूदकोना है. जिला मुख्यालय से 80 किमी दूर है. सरकारी सुविधाओं से जूझ रहे यहां कोरवा जातियों का अपना शासन चलता है. इन तीनों गांवों में 40 परिवार के लोग रहते हैं. गांव में कोई विवाद हो जाये, तो पंचायत लगा कर खुद ही निबटारा करते हैं. एक हत्या का मामला छोड़ दिया जाये, तो एक भी मामला थाना व कोर्ट तक नहीं पहुंचा है. यहां की खासियत यह है कि लोग डायन-बिसाही नहीं मानते हैं. जबकि इस गांव में शिक्षा का स्तर पर भी ठीक नहीं है.

गांव में कोई भी मैट्रिक पास नहीं है. लेकिन इस गांव के लोग दु:खी इस बात को लेकर हैं कि अभी तक गांव का विकास नहीं हो सका है. कोई भी प्रशासनिक मुलाजिम या नेता गांव तक नहीं पहुंचे हैं. गांव के मोहना कोरबा, बिरसू कोरबा, टुंयु कोरबा, सहदु कोरबा, रमसू कोरबा, सुखू कोरबा आदि ग्रामीणों ने बताया कि गांव में बिरसा आवास योजना के तहत 29 कोरवा परिवार का चयन हुआ था. पर अभी तक आवास अधूरा है. गांव में बिजली पोल व तार लगा है. पर बिजली नहीं रहती है. गांव का एक मात्र चापानल खराब पड़ा हुआ है. गांव के लोग डोभा व कुआं के पानी पर आश्रित हैं. गांव में प्रवेश करने से पूर्व रास्ते में पड़ने वाली छोटी नदी व नाला पार करना पड़ता है.

कमाऊ लड़के-लड़कियां दिल्ली में हैं

गांव के सभी 12 से 25 वर्ष के कमाऊ लड़के-लड़कियां दिल्ली में हैं. कारण, गांव में काम नहीं है. इसलिए सभी दिल्ली में जाकर मजदूरी कर रहे हैं. गांव की घुलेश्वरी कुमारी, राजमुनी कुमारी, फुलमईत कुमारी, दशरथ कोरवा, पुष्पा कुमारी, मूत्तर्ि कुमारी, जगमनी कुमारी, भारती कुमारी, दशरथ कोरवा, बैगमुनी कुमारी सहित लगभग 30 लड़के-लड़कियां ऐसे हैं, जो रोजगार के अभाव में दिल्ली पलायन कर चुके हैं.

भवन अधूरा हैशिक्षक भी नहीं

पहाड़ पर स्कूल है. गांव के ही पारा शिक्षक हैं. लेकिन भवन अधूरा है. बच्चों को पढ़ने में दिक्कत होती है. इस इलाके के स्कूलों में शिक्षकों का आने जाने का समय नहीं है. इस कारण शिक्षा का स्तर कम है.

सड़क बनी थी, बह गयी

कुछ दूरी तक पक्की सड़क बनी थी. लेकिन बीते साल बारिश में बह गया. जिसे अभी तक नहीं बनाया गया है. बड़ी गाड़ी गांव तक नहीं पहुंच सकती है. बाइक से ही गांव जा सकते हैं. अधिकारी सुरक्षा के साथ गांव जाते हैं.

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