बिशुनपुर से ग्राउंड रिपोर्टः खेत देख रहे पानी की राह, रोजगार-शिक्षा के लिए परदेस जाना भी मजबूरी

Updated at : 28 Nov 2019 1:03 PM (IST)
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बिशुनपुर से ग्राउंड रिपोर्टः खेत देख रहे पानी की राह, रोजगार-शिक्षा के लिए परदेस जाना भी मजबूरी

गुमला जिले के बिशुनपुर विधानसभा क्षेत्र में मतदान 30 नंवबर को है. ऐसे में सवाल यह है कि किस मुद्दे को लेकर चुनाव लड़ा जा रहा है और यहां की जनता क्या चाहती है? यहां की जनता क्या सिर्फ नेताओं के चेहरे पर वोट करेगी या स्थानीय मुद्दों का महत्व होगा ? जातीय समीकरण कितना […]

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गुमला जिले के बिशुनपुर विधानसभा क्षेत्र में मतदान 30 नंवबर को है. ऐसे में सवाल यह है कि किस मुद्दे को लेकर चुनाव लड़ा जा रहा है और यहां की जनता क्या चाहती है? यहां की जनता क्या सिर्फ नेताओं के चेहरे पर वोट करेगी या स्थानीय मुद्दों का महत्व होगा ? जातीय समीकरण कितना चलेगा ? विकास के दावे और हकीकत के बीच कितना फासला है ? इन सारे सवालों का जवाब ढूंढ़ने और चुनावी मिजाज को टटोलने के लिए Prabhatkhabar.com की टीम बिशुनपुर पहुंची. तो पढ़ें ग्राउंड जीरो से अमिताभ कुमार और उत्पल कांत की रिपोर्ट और जानें इस विधानसभा क्षेत्र का हाल:-
बिशुनपुर विधानसभा क्षेत्र में लाल आतंक का साया है. यहां 154 संवेदनशील मतदान जबकि 144 अति संवेदनशील मतदान केंद्र बनाए गए हैं. यह विधानसभा क्षेत्र पूर्व में घाघरा ब्लॉक, उत्तर-पश्चिम में पालमू जिला, और दक्षिण में चैनपुर ब्लॉक से घिरा हुआ है. लोहरदगा संसदीय क्षेत्र में आने वाल यह सीट अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित है. आदिवासी खासकर उरांव जनजाति बहुल इस विधानसभा क्षेत्र को झामुमो अपना गढ़ मानता है. यहां बुनियादी सुविधाओं की खासा कमी है. लोग समस्याओं से लोग जूझ रहे हैं.
आज भी क्षेत्र की बड़ी आबादी अच्छी सड़क, पानी- सिंचाई और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है. इसे क्षेत्र के गांवों में बिजली जरूर पहुंच चुकी है. क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति अन्य इलाकों से भिन्न नहीं है. बिशुनपर प्रखंड के चारों तरफ नजर दौड़ाएं तो पहाड़ी से घिरा नजर आता है. यहां की भौगोलिक स्थिति भले ही अन्य जगहों जैसी है मगर सामाजिक हालात थोड़े अलग हैं. चुनावी माहौल है मगर इसके बाद भी पूरे क्षेत्र में कहीं पर भी पांच-10 लोग एक साथ बैठे नजर नहीं आ रहे.
पार्टी कार्यकर्ताओं को छोड़ दें तो किसी भी गांव में एक भी दृश्य ऐसा नजर नहीं आया जहां पांच लोग बैठ कर गप्प कर रहे हैं. खेतों में धान की कटाई चल रही है. कहीं कहीं सब्जियों के खेतो में लोग काम करते दिख रहे. हमें बिशुनपुर जाने से पहले हिदायत दी गई थी कि शाम होने से पहले सुरिक्षत स्थान पर पहुंच जाए. इस निर्देश का कारण भी हमें समझ आया. बिशुनपुर प्रखंड में कार्यरत कर्मचारियों से बात की तो पता चला शाम छह बजे के बाद इधर सन्नाटा हो जाता है. इसी विधानसभा क्षेत्र के घाघरा प्रखंड में भी ऐसा ही बताया गया. हालांकि घाघरा बिशुनपुर से ज्यादा संपन्न नजर आय़ा.
बिशुनपुर दो जिलों से मिलता है. एक साइड से लोहरदगा जबकि दूसरी तरफ से गुमला. लोहरदगा से आने पर सेन्हा और घाघरा में बाजार है. गुमला की ओर से आने पर टोटो और अदरा बाजार में रौनक देखने को मिलती है. इस पूरे क्षेत्र में मीडिया के कैमरे को लेकर अजीब सी घबराहट है . कैमरे पर कोई कुछ बोलना नहीं चाहता. राजनीति पर कुछ बोलना नहीं चाहता. यहां के लोगों को ही स्थानीय मुद्दों की फिक्र नहीं. काफी कुरेदने पर शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य सेवा पर आते हैं और यहीं उनकी बात खत्म हो जाती है.
खेत में काम कर रहे अशोक भगत ने कहा कि कोई कुछ नहीं बोलेगा. हम लोगों की सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि सिंचाई की सुविधा नहीं है. सब लोग चाहता है कि बिशुनपुर में एक डैम बने लेकिन कोई कुछ नही बलोता है. यहां के लोगों को लगता है कि जब डैम बनना होगा तो बना जाएगा. सब भगवान भरोसे हैं. बारिश हुई तो फसल अच्छी होगी. अगर बारिश नहीं हुई तो भगवान की मार समझकर सह लेते हैं.
इस क्षेत्र से स्थानीय मुद्दें गायब हैं. नेताओं के चेहरे पर ही लोग मतदान करते हैं.
घाघरा में होटल व्यवसायी औऱ पूर्व सरकारी कर्मचारी ने अरविंद भगत ने कहा कि यहां नेता के चेहरा पर ही वोट होगा. ग्रामीण परिवेश है. जो जैसा बोलता है वैसा ही सुनता है. कहा कि इस आदिवासी बहुल इलाके में शिक्षा का स्तर आज भी खराब है. संपन्न लोग अपने बच्चों को बाहर पढ़ने के लिए भेज देते हैं. स्थानीय लोग 10वीं या 12वीं तक की पढ़ाई कर के छोड़ देते हैं. उनके लिए पैसा कमाना जरूरी है . 12वीं के बोद अधिकतर लोग काम की जुगाड़ में लग जाते हैं.
राजनीतिक दलों के नेता काफी कुरेदने पर ही कुछ बोलते हैं. झामुमो और कांग्रेस का गठबंधन है तो कई जगहों पर इनके कार्यकर्ता दिख जाते हैं. आदिवासी छात्र संगठन के लड़के चुनाव में अपनी ताकत इसी गठबंधन के लिए झोंके हुए हैं.
बिशुनपुर विधानसभासीट का राजनीतिक इतिहास
गुमला जिले का हिस्‍सा यह क्षेत्र ब्‍लॉक मुख्‍यालय होने के कारण जिले की राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र भी माना जाता है. 1977 में बिशुनपुर अनुसूचित जनजाति के कोटे से विधानसभा सीट बनी थी. बिशुनपुर के पहले विधायक कांग्रेस के कार्तिक उरांव थे. इस सीट पर उरांव व भगत जाति के विधायकों का सबसे ज्यादा कब्जा रहा. लेकिन दो चुनावों से चमरा लिंडा यहां काबिज हैं. यहां से चार बार कांग्रेस व तीन बार भाजपा के विधायक जीत चुके हैं. कांग्रेस के स्व भुखला भगत सबसे अधिक तीन बार विधायक चुने गये थे. वहीं पिछले तीन चुनाव पर नजर डालें तो 2005 में कराए गए चुनाव में यहां से भाजपा के चंद्रेश उरांव ने जीत हासिल की. 2009 में राष्ट्रीय कल्याण पक्ष के उम्मीदवार चमरा लिंडा इस सीट से विधायक चुने गए. 2014 के चुनाव में भी चमरा लिंडा झामुमो से विधायक चुने गए.
क्या है मौजूदा हालात
बिशुनपुर में बॉक्साइट खनन का कार्य करीब करीब बंद है. इस कारण मजदूरों को काम नहीं मिल रहा है. बिशुनपुर और इसके आस पास के क्षेत्र की पूरी अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है. 30 से 40 हजार की आबादी पर इसका प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से असर पड़ा है. यह बिशुनपुर की मुख्य सड़क को देखने से भी पता चल जाता है. हम छह घंटे वहां रहे लेकिन बॉक्साइट ढुलाई का एक भी ट्रक नहीं गुजरा. बिशुनपुर के राजेश कहते हैं कि यहां हजारों की संख्या में लोग रोजगार के लिए पलायन कर रहे हैं. बंद खदानों का असर कहीं अधिक व्यापक है. लोगों की जेब में पैसे नहीं हैं, बाजार पर सीधा असर दिख रहा है. इस पीड़ा का एहसास नेताओं को भी है लेकिन इसे चुनावी मुद्दा बनाने में हर किसी को जोखिम नजर आ रहा है.
चुनावी समीकरण हुआ रोचक
बिशुनपुर विधानसभा सीट पर भाजपा और झारखंड मुक्ति मोर्चा के बीच सीधी टक्कर है. जेएमम के चमरा लिंडा बिशुनपुर विधानसभा सीट से वर्तमान विधायक हैं. वो जीत की हैट्रिक लगाने के इरादे से मैदान में उतरे हैं. 2014 के विधानसभा चुनाव में लिंडा ने भाजपा के समीर उरांव को 10 हजार से अधिक वोटों से हराया था. तब निर्दल उम्मीदवार अशोक उरांव तीसरे स्थान पर रहे थे. इस बारअशोक भाजपा के प्रत्याशी हैं और जीत का दावा कर रहे हैं.
बिशुनपुर विधानसभा क्षेत्र में इस बार चमरा लिंडा को हैट्रिक बनाने से रोकने के लिए जबरदस्त राजनीतिक घेराबंदी नजर आ रही है. झाविमो प्रत्याशी महात्मा उरांव के दमखम के साथ चुनाव मैदान में डटे होने और भाजपा का टिकट अशोक उरांव को मिलने से राजनीतिक सीन रोचक हो गया है. अशोक उरांव का पहाड़ और जंगल में खासा प्रभाव रहा है तो महात्मा उरांव, चमरा लिंडा के अंदरूनी और बाहरी रणनीति के जानकार हैं.
किसको किससे कितनी उम्मीद
आदिवासी खासकर उरांव जनजाति बहुल इस विधानसभा क्षेत्र को झामुमो अपना गढ़ मानता है. झामुमो समर्थकों के अनुसार इस बार कांग्रेस के साथ गठबंधन होने से गैर आदिवासियों का भी एक बड़ा तबका उनके साथ है. इधर, झाविमो से महात्मा उरांव के मैदान में आने से आदिवासी मतों में बिखराव होना तय है. दूसरी तरफ भाजपा समर्थकों का दावा है कि विशुनपुर आज भी उसका मजबूत किला है. उनका तर्क है कि इस क्षेत्र पर 2001 से लेकर 2009 तक भाजपा का कब्जा रहा था.
गत लोकसभा चुनाव के दौरान इस क्षेत्र में अपनी पार्टी को मिली बढ़त से भाजपा समर्थक काफी उत्साहित हैं. बता दें कि पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी रहे और पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष लोहरदगा विधायक सुखदेव भगत कुछ दिन पहले भाजपा में शामिल हो गये हैं, इससे बिशुनपुर में भाजपा को थोड़ा बल मिल रहा है. लोकसभा चुनाव के बाद परिस्थितियों में आये बदलाव से इस सीट की लड़ाई रोमांचक दिखने लगी है. देखना दिलचस्प होगा कि ऊंट किस करवट बैठता है.
ये हैं चार बड़े मुद्दे
बेरोजगारी: खनन और ट्रकों से माल ढुलाई की पहचान वाले इस क्षेत्र में बीते 20 साल से अन्य नौकरियों के दूसरे अवसर बढ़े ही नहीं. यही कारण है कि बेरोजगारी बढ़ी और अब लोग नौकरी के लिए बाहर जा रहे हैं. इधर खनन कार्य कम होने से व्यापक असर नजर आ रहा है.
कॉलेज: शिक्षा का स्तर बढ़ता गया पर, यहां बिशुनपुर में कॉलेज खुले ही नहीं. 12वीं की बाद के पढ़ाई के लिए लड़के-लड़कियों को दूसरे शहरों का रुख करना पड़ता है. जो खर्च करने में असमर्थ हैं, उनकी पढ़ाई छूट रही है. स्कूलों की भी हालात ठीक नहीं. बिशुनपर में 11वीं चात्रा पायल और उशकी सहेलियों ने कहा कि वो 28 किमी दूरे से रोजाना यहां पढ़ने आती है. अगर उसके गांव में या पास में स्कूल होता तो यहां आने और जाने वाला समय बचाता. किराये में भी बचत होती.
सिंचाई-पेयजल: पठारों के नीचे बसी छोटी बस्तियों के लिए न तो सड़कें बनीं और न ही बिजली पहुंची. खेती के लिए संसाधन भी नहीं बढ़े और सिंचाई और पेयजल के लिए नया कुछ भी नहीं हुआ.
अस्पतालः बिशुनपुर में सामुदायिक केंद्र है. भवन नया और आकर्षक है. इमेरजेंसी और ओपीडी भी है. बाहर दो चार एंबुलेंस भी खड़ा है. मगर ग्रामीण कहते हैं कि ये महज हाथ के दांत के बराबर है. यहां हर रोज डाक्टर नहीं आते. दवाओं का टोटा रहता है. थोड़ी सी भी गंभीर स्थिति होने पर रेफर कर दिया जाता है. बस बुखार और चोट लगने पर ही यहां इलाज की सुविधा मिलती है बाकी अन्य बिमारियों के लिए जिला अस्पताल या रांची की ओर रूख कना पड़ता है.
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