बूढ़ा पहाड़ के गांवों में आज भी बुनियादी सुविधाएं नहीं

बूढ़ा पहाड़ के गांवों में बुनियादी सुविधाएं नहीं
बड़गड़. झारखंड और छत्तीसगढ़ राज्य की सीमा पर अवस्थित पहाड़ियों से घिरा बूढ़ा पहाड़ का झालू डेरा क्षेत्र गढ़वा जिले के अंतिम छोर पर बसा बड़गड़ प्रखंड का गांव है. यहां के लोग आजादी के 75 वर्ष बीत जाने के बाद भी बिजली, पानी तथा सड़क, स्वास्थ्य व शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित हैं. गौरतलब है कि यह क्षेत्र पिछले तीन दशक से अधिक समय तक नक्सलियों के कब्जे में था. उक्त क्षेत्र में रहनेवाले लोग नक्सलियों के रहमों करम पर थे. लगभग ढाई वर्ष पूर्व सीआरपीएफ, झारखंड पुलिस एवं गढ़वा जिला पुलिस बल के संयुक्त प्रयास से यह क्षेत्र नक्सलियों के प्रभाव से मुक्त हुआ. तब लोगों में उम्मीद जगी थी कि अब उनके क्षेत्र का भी समुचित विकास होगा. लोगों को जीवन की मूलभूत सुविधाएं मिल सकेंगी. लेकिन यह सब यहां के ग्रामीणों के लिए अब भी सपना है. विदित हो कि नक्सलियों से मुक्त होने के बाद 27 जनवरी 2023 को राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सहित तत्कालीन मंत्री मिथिलेश ठाकुर एवं राज्य से लेकर जिला तक के आला अधिकारी बूढ़ा पहाड़ पहुंचे थे. उन्होेंने यहां के ग्रामीणों को नक्सलियों की गुलामी से मुक्ति मिलने की बधाई दी थी. साथ ही मुख्यमंत्री ने बूढ़ा पहाड़ क्षेत्र में समुचित विकास करने का वादा यहां के लोगों से किया था. इसी दौरान उन्होंने बूढ़ा पहाड़ डेवलपमेंट योजना के नाम से 100 करोड़ की एक योजना भी लांच की थी. इसके बावजूद बूढ़ा पहाड़ एवं इसके आसपास लगे क्षेत्र में अभी तक बुनियादी सुविधा उपलब्ध नहीं हो सकी है. बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं से यहां के लोग अभी भी वंचित हैं. हालांकि जिला प्रशासन ने यहां रहने वाले लोगों को राशन व पेंशन सहित कई अन्य लाभ से जोड़ने का कार्य किया है. इससे लोग लाभान्वित भी हो रहे हैं. लेकिन लोगों को जो मूलभूत सुविधाएं मिलनी चाहिए थी, वह उन्हें नहीं मिल पा रही है. लाभकारी योजना में सड़क नहीं होना बाधा : ग्रामीण सरजू बिरजिया, निर्मल बिरजिया, शुकुल बिरजिया, चंदन यादव, देव कुमार यादव, सुकुल बिरजिया व बलदेव बिरजिया ने कहा कि उन्हें सरकार द्वारा पीएम आवास, अबुआ आवास एवं कूप निर्माण जैसी योजनाओं का लाभ मिला है. लेकिन वे लोग उक्त योजनाओं का निर्माण नहीं कर पा रहे हैं. इसका मुख्य कारण है गांव तक सड़क का न होना. उन्होंने बताया कि झालू डेरा एवं बुढ़ा गांव बूढ़ा पहाड़ की चोटी पर स्थित हैं. क्षेत्र के नक्सल मुक्त होने के ढाई वर्ष से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी यहां सड़क का निर्माण नहीं हो सका है. इससे योजनाओं के निर्माण में लगने वाली सामग्री गांव तक ला पाना कठिन हो जाता है. ग्रामीणों ने कहा कि अगर सड़क का निर्माण हो जाता, तो उन्हें काफी सहूलियत होती. उन्होंने बताया कि वर्तमान में सड़क की जो स्थिति है, उसमें ट्रैक्टर या अन्य वाहन थोड़ा सा भी वजन लेकर गांव तक नहीं पहुंच पाते हैं. गांव में पर्याप्त पेयजल की व्यवस्था भी नहीं : इधर गांव में पर्याप्त पेयजल की व्यवस्था भी नहीं है. बूढ़ा पहाड़ से नीचे लगायी गयी जल मीनार, जिसका पानी झालूडेरा गांव तक के लोगों को मिलता है, वह लंबे समय से खराब है. ग्रामीणों ने बताया कि बूढ़ा पहाड़ पर स्थित झालूडेरा सीआरपीएफ कैंप में तैनात जवानों द्वारा कभी-कभी सड़क की मरम्मत करायी जाती है, लेकिन कुछ ही दिनों में वह खराब हो जाती है. उक्त सड़क से जवानों को भी अपने रसद-पानी या अन्य जरूरत के सामान लाने ले जाने में कठिनाइयों से जूझना पड़ता है. इलाज की सुविधा नहीं : विदित हो कि बूढ़ा पहाड़ एवं इसके आसपास झालूडेरा, बूढ़ा गांव, खपरी महुआ, तुरेर, तूमेरा आदि गांव के रहने वाले ज्यादातर अनुसूचित जाति एवं जनजाति परिवार के लोग हैं. इलाज के लिए इन्हें अपने गांव से 25 किलोमीटर दूर स्थित स्वास्थ्य उप केंद्र, हेसातु जाना पड़ता है. ग्रामीणों के मुताबिक वह केंद्र भी नियमित रूप से नहीं खुलता है. इस कारण यहां इलाज के लिए आने वाले लोगों को बैरंग वापस लौटना पड़ता है. बच्चों की शिक्षा सीआरपीएफ के भरोसे : बूढ़ा पहाड़ एवं इसके आसपास के गांव के बच्चों की शिक्षा व्यवस्था सीआरपीएफ-172 बटालियन के भरोसे चल रही है. सीआरपीएफ कैंप में 50 से अधिक बच्चों को जवानों द्वारा नियमित कक्षा के साथ-साथ भोजन, पोशाक एवं खेलकूद सहित पठन-पाठन सामग्री लगभग ढाई वर्ष से मुहैया करायी जा रही है. सीआरपीएफ द्वारा संचालित डीजी स्कूल में बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं.
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