प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ रमेश शरण का निधन, ज्यां द्रेज ने कहा-हम उन्हें एक महान शिक्षक, विद्वान और मित्र के रूप में प्रेमपूर्वक याद रखेंगे

Dr Ramesh Sharan passes away : सामाजिक कार्यकर्ता बलराम ने बताया कि डाॅ शरण के साथ मैंने लगभग 25-30 साल काम किया था. वे एक अर्थशास्त्री नहीं बल्कि समाजशास्त्री भी थे. वे झारखंड की समस्याओं को बहुत ही अच्छे से समझते थे. मैंने उनके साथ राइट टू फूड पर काम किया. हम दोनों ही सुप्रीम कोर्ट के एडवाइजर थे.
Dr Ramesh Sharan passes away : प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और झारखंड के विनोबा भावे विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ रमेश शरण का सोमवार देर रात कोलकाता के एक अस्पताल में निधन हो गया. उनके असामयिक निधन पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने दुख व्यक्त किया है और इसे झारखंड के लिए अपूरणीय क्षति बताया है. उन्होंने एक्स पर पोस्ट लिखा- मैं डाॅ रमेश शरण के निधन से व्यक्तिगत रूप से काफी मर्माहत हूं, यह झारखंड के लिए बहुत बड़ी क्षति है. मै़ं मरांग बुरु से उनकी आत्मा की शांति एवं उनके परिजनों को यह दुःख सहन करने की शक्ति प्रदान करने की कामना करता हूं.
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज ने डाॅ रमेश शरण के निधन पर शोक जताया और उन्हें जनवादी अर्थशास्त्री बताया, जो जनहित के लिए काम करते थे. उन्होंने प्रभात खबर से बातचीत में कहा कि वे हाशिए पर मौजूद समुदायों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध थे. डाॅ शरण एक दयालु इंसान थे. हम उन्हें एक महान शिक्षक, विद्वान और मित्र के रूप में प्रेमपूर्वक याद रखेंगे.
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ रमेश शरण का कोलकाता के अस्पताल में 69 वर्ष की उम्र में निधन हुआ. उन्हें लंग्स में इंफेक्शन था, जिसकी वजह से वे पिछले सात-आठ दिन से बीमार थे. पहले उन्हें रांची के मेडिका अस्पताल में भर्ती कराया गया और तबीयत में सुधार नहीं होने के बाद एयर एंबुलेंस से कोलकाता ले जाया गया, जहां कल देर रात उनका निधन हो गया. उनके परिवार में उनकी पत्नी और दो बेटियां हैं. रांची के प्रसिद्ध डाॅक्टर अंकित श्रीवास्तव उनके दामाद हैं. डाॅ शरण सुप्रीम कोर्ट के एडवाइजर भी रहे थे.
डाॅ रमेश शरण विनोबा भावे विश्वविद्यालय के कुलपति रहे थे
डाॅ रमेश शरण विनोबा भावे विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति थे. उनके निधन से झारखंड में शोक की लहर दौड़ गई है. लंग्स में इंफेक्शन बढ़ जाने के बाद उन्हें कोलकाता ले जाया गया था, लेकिन उनकी तबीयत में सुधार नहीं हुआ और अंतत: उनका निधन हो गया . उन्हें 2017 में विनोबा भावे विश्वविद्यालय का कुलपति बनाया गया था, उससे पहले वे रांची विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में एचओडी थे. उन्होंने रांची के संत जाॅन्स काॅलेज से पढ़ाई की थी और रांची विश्वविद्यालय से एमए किया था, वे अपने बैच के टाॅपर थे. वे कोलकाता आईआईएम में पीएचडी के समकक्ष डिग्री ले रहे थे, उसी वक्त उनके पिता का निधन हो गया, जिसके बाद वे रांची वापस आ गए और लेक्चररशिप ज्वाइन किया. रिटायरमेंट के बाद वे इंस्टीच्यूट फाॅर ह्यूमन डेवलपमेंट संस्था के डायरेक्टर बने और विनोबा भावे विश्वविद्यालय के लोकपाल भी थे.
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मैंने अपना गाइड खो दिया : डाॅ हरिश्वर दयाल
झारखंड के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डाॅ हरिश्वर दयाल ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि यह मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति है, मैंने अपना गाइड और सबसे करीबी मित्र खो दिया. मैं डाॅ शरण को बचपन से जानता था, वे संत जाॅन्स स्कूल में मेरे सीनियर थे. उनके छोटे भाई मुझसे एक साल जूनियर थे, चूंकि हम एक साथ ही स्कूल आना-जाना करते थे, इसलिए हमारे संबंध बहुत करीबी और आत्मीय थे. जब भी कोई दुविधा होती हम उनसे समाधान पूछते थे. मैं आगे की पढ़ाई के लिए जेएनयू चला गया, लेकिन हमारे संबंध बने रहे. जब भी हम मिलते तो खूब बातें होतीं, हमारे विचार एक जैसे थे. हमने साथ मिलकर रिसर्च का काम किया. हमने कई रिसर्च पेपर साथ में लिखे. लेबर इकोनाॅमिक्स पर हमने साथ में रिसर्च किया. जब हम साथ काम नहीं कर रहे होते थे, तब भी मैं उनसे परामर्श लेता था और वे बहुत ही बेहतरीन सुझाव देते थे. यही वजह है कि मैं उन्हें अपना सबसे अच्छा दोस्त और गाइड मानता था. वे हमेशा यह कहते थे कि अगर आपको आम जनता तक अपनी आवाज पहुंचानी है तो सिर्फ जर्नल में नहीं, अखबारों में भी अपनी बात लिखा करें.
एक बेहतरीन शिक्षक थे डाॅ रमेश शरण
डाॅ शरण के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे बहुत ही सहज और सरल व्यक्ति थे. साथ ही वे एक बेहतरीन शिक्षक थे. जब वे छात्रों को पढ़ाते थे तो कठिन से कठिन विषयों को भी इतना सहज करके पढ़ाते थे कि कोई भी आसानी से समझ जाए. वे हमें यह भी बताते थे कि विद्यार्थियों को पढ़ाया कैसे जाए. वे कहते थे टीचर को हमेशा स्टूडेंट को पाॅजिटिव स्ट्रोक देना चाहिए, तब ही स्टूडेंट बेहतर कर पाता है. उनके संबंध अपने छात्रों के साथ बेहतरीन थे और वे इस बात के उदाहरण थे कि शिक्षकों को स्टूडेंट के साथ कैसे संबंध बनाने चाहिए.
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डाॅ रमेश शरण एक अर्थशास्त्री ही नहीं समाजशास्त्री थी थे : बलराम
सामाजिक कार्यकर्ता बलराम ने बताया कि डाॅ शरण के साथ मैंने लगभग 25-30 साल काम किया था. वे एक अर्थशास्त्री नहीं बल्कि समाजशास्त्री भी थे. वे बहुत ही सहज व्यक्ति थे और यह उनके व्यक्तित्व की खासियत थी. वे झारखंड की समस्याओं को बहुत ही अच्छे तरीके से समझते थे. मैंने उनके साथ राइट टू फूड पर काम किया. इसके अलावा भी हमने साथ काम किया. हम दोनों ही सुप्रीम कोर्ट के एडवाइजर थे. उन्होंने झारखंड आंदोलन में भी अहम भूमिका निभाई थी. हमने 1996 से पेसा कानून पर काम किया. वे एक ऐसी शख्सीयत थे, जिनके बारे में यह कहा जा सकता है कि वे संपूर्ण थे.
डाॅ शरण एक बेहतरीन व्यक्तित्व : मिथिलेश
प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष और डाॅ शरण के स्टूडेंट रहे मिथिलेश बताते हैं कि वे हमारे शिक्षक थे. मैं उन्हें 1987 से जानता था, जब मैं रांची विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए आया था. जब मैंने उनको पहली बार देखा था, तो वे एक क्लास लेकर आ रहे थे. उस वक्त उनके हाथों में चाॅक लगा था, कुछ चाॅक शर्ट पर भी लगा था. वे हाथ में रजिस्टर और डस्टर लेकर आए. उनकी छवि देखकर मेरे मन में यही भाव आया कि टीचर हो तो ऐसा हो. मैंने उनसे क्लास के बाहर भी बहुत पढ़ाई की. वे मेरे गाइड थे, आजीवन मैंने उनसे सीखा. वे प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य तो नहीं थे, लेकिन जब भी उन्हें कार्यक्रमों में आमंत्रित किया गया वे आए और हमारा मार्गदर्शन किया. उन्होंने साहित्य की आर्थिक चेतना को समझाने का प्रयास किया. उन्होंने विश्वविद्यालय में बैक टू कैंपस अभियान चलवाया था. उनका कहना था कि स्टूडेंट होगा ही नहीं तो टीचर क्या करेंगे. उनके इस अभियान में मैंने भी भागीदारी की थी. वे हमेशा इस पर विचार करते थे कि विद्यार्थियों की समस्या का समाधान कैसे हो.
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लेखक के बारे में
By रजनीश आनंद
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.
राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.
रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.
आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.
रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.
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