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Jmm News : पहली बार बिना गुरुजी के मनेगा झामुमो का स्थापना दिवस

Updated at : 04 Feb 2026 12:33 AM (IST)
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Jmm News : पहली बार बिना गुरुजी के मनेगा झामुमो का स्थापना दिवस

Jmm News : पहली बार बिना गुरुजी के मनेगा झामुमो का स्थापना दिवस

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Jmm News : स्थापना दिवस पर विशेष

नारायण चंद्र मंडल, धनबाद

चार फरवरी को झारखंड मुक्ति मोर्चा अपना 54वां स्थापना दिवस धनबाद के ऐतिहासिक गोल्फ ग्राउंड में मना रहा है. पार्टी के संस्थापक दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अगुआई में पार्टी अपना पहला स्थापना दिवस मना रही है. गत वर्ष 13-14 अप्रैल में रांची में हुए पार्टी के महाधिवेशन में हेमंत सोरेन को पार्टी का केंद्रीय अध्यक्ष चुना गया. स्वास्थ्य को देखते हुए अधिवेशन में गुरुजी को मुख्य संरक्षक बनाया गया था.

बढ़ता गया पार्टी का सामाजिक दायरा :

झारखंड अलग राज्य दिलाने वाला झामुमो अभी शीर्ष पर है, पर इस स्थिति तक पहुंचने में पार्टी को आंतरिक उपनिवेशवादी शोषण के खिलाफ कई संघर्ष करने पड़े. उसमें सैकड़ों लोगों को शहादतें भी देनी पड़ी. अलग राज्य के अलावा गांवों में वंचित जमात को हक दिलाने का संघर्ष तीव्र रहने के कारण सत्ता-शासन के अलावा प्रतिक्रियावादी ताकतों का शिकार झामुमो होता रहा, पर अभी हालात कुछ अलग है. पहले की तरह झामुमो को अब लोग केवल कुड़मी-मांझी का दल नहीं मानते. हेमंत सोरेन की दूरदर्शी राजनीति के कारण ग्रामीण क्षेत्र की हर जमात के लोग न केवल झामुमो से जुड़े, बल्कि शहरी क्षेत्रों में भी पार्टी ने अलग पहचान बनायी. उसके कारण दिन-ब-दिन संगठन में विस्तार हो रहा है, जिसका परिणाम 2024 के दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव में देखने को मिला. पार्टी ने अब तक के सबसे अधिक न केवल 34 सीटें जीतीं, बल्कि अपने सहयोगी दलों को भी जिताया और इंडिया गठबंधन के नाम पर 56 सीटें आयीं.

देश के सबसे मजबूत आदिवासी नेता बन कर उभरे हेमंत सोरेनभले ही हेमंत सोरेन को राजनीति विरासत में मिली, पर दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने अपने संघर्ष के बल पर जिस चांद को छुआ था, उसकी चांदनी को बरकरार रखने में उनके पुत्र हेमंत सोरेन कामयाब हुए हैं. हेमंत सोरेन की पार्टी झामुमो ने गत चुनाव में जो प्रदर्शन किया, उससे उनकी अपनी पहचान बनी. झारखंड की 28 जनजातीय आरक्षित सीटों में से 27 पर झामुमो ने जीत दर्ज कर संदेश दिया कि आदिवासी अस्मिता व संस्कृति का हितैषी केवल झामुमो ही है. यही नहीं, संताल परगना की कुल 18 सीटों में 17 सीटों पर गठबंधन दलों का परचम लहरा. उनमें झामुमो को अकेले 11 सीटें मिलीं. कोल्हान क्षेत्र में भी पार्टी ने अपना जलवा बरकरार रखा. हालांकि 2019 के चुनाव के मुकाबले गठबंधन दलों को तीन सीटों का खमियाजा भुगतना पड़ा. यही नहीं, दक्षिणी और उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल में भी पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन किया. झामुमो 2024 के चुनाव में 23.44 प्रतिशत मत लेकर राज्य में सबसे बड़े दल के रूप में उभरा. उसका स्ट्राइक रेट 79 फीसदी रहा.

दिल बड़ा कर गठबंधन दलों को दी इज्जत, तो कई जगह लहरा परचमइतनी कम सीट वाले राज्य में भी हेमंत सोरेन ने चुनाव के दौरान गठबंधन दलों को काफी सम्मान दिया. इंडिया ब्लॉक में कांग्रेस, राजद के साथ सीपीआइ (एम-एल) को पहली बार गठबंधन दल में शामिल किया. इसका कारण रहा कि भाजपा का गढ़ बन चुके कोयलांचल क्षेत्र (धनबाद-बोकारो) में गठबंधन दलों को सफलता मिली. बोकारो जैसे शहरी क्षेत्र में जहां कांग्रेस ने बाजी मारी, वहीं चंदनकियारी में दशकों के बाद झामुमो ने सीट विपक्ष से झटक ली. उसी तरह निरसा में भाकपा माले ने जीत दर्ज की और सिंदरी में 24 साल बाद फिर से लाल झंडा फहरा. पलामू प्रमंडल के गढ़वा जिला के भवनाथपुर में पार्टी ने जीत दर्ज कर यह संकेत दिया कि झामुमो अब केवल संथाल व कोल्हान का दल नहीं रह गया.

आदिवासियों के बीच सिंबोलिक पहचान बना चुका है झामुमो

झामुमो का चुनाव चिह्न तीर-धनुष है. आदिवासी समाज में यह चिह्न उनके संस्कृति से जुड़ा समझता है. इसलिए चुनाव के समय यह समाज तीर-धनुष देख कर मतदान करता है, उम्मीदवार कौन है, उनके लिए वह मायने नहीं रखता. यही कारण है कि संताल परगना में जिस नेता ने झामुमो छोड़ा, उनका या तो राजनीतिक अस्तित्व नष्ट हो गया या फिर घूम-फिर कर झामुमो में ही शामिल हुआ. पिछले 54 सालों से यह पहचान बनाये रखने में झामुमो ने जो सफलता पायी है, हिंदी पट्टी के किसी भी क्षेत्रीय दल के लिए यह संभव नहीं हो पाया है.

मजबूत सहयोगी के रूप में उभरीं हैं कल्पना सोरेन

जमीन के एक मामले में सीएम रहते हेमंत सोरेन को जेल जाने के बाद उनकी पत्नी कल्पना सोरेन एक मजूबत नेता के रूप में उभर कर सामने आयीं. गिरिडीह के गांडेय से रिकॉर्ड मतों से न केवल उन्होंने जीत दर्ज की, बल्कि गत लोकसभा और विधानसभा चुनाव में सुपर स्टार प्रचारक के रूप में अपनी छाप छोड़ी. उन्हें सुनने के लिए जनसैलाब उमड़ा. हिंदी-अंग्रेजी समेत क्षेत्रीय भाषाओंं में जिस तरह बोलकर लोगों को झामुमो और इंडिया ब्लॉक की ओर मोहा, वह हाल के दिनों में पूरे भारत वर्ष में किसी सीएम की पत्नी में नहीं दिखता. भले ही वह अभी झामुमो केंद्रीय कार्यकारिणी की सदस्य मात्र है, पर झामुमो में नंबर दो पर रह चुकी है. विपक्षी दलों की नीतियों की आलोचना भी वह एक संस्कार युक्त महिला के रूप में करतीं, जिसके कारण युवा व प्रबुद्ध लोगों की वह पसंद बनती जा रही हैं. झामुमो में कल्पना के रूप में एक तेज तर्रार नेता के उदय के बाद झामुमो को नहीं चाहने वाले लोगों के घरों की महिलाओं में भी कल्पना सोरेन का क्रेज बना. सरकार बनने के बाद विदेश दौरा हो या फिर सदन के भीतर की गतिविधि, कल्पना ने आम लोगों की कल्पना से अधिक अच्छा प्रदर्शन किया.

हेमंत की सादगी लोगों को भायी

गुरुजी के चार अगस्त 2024 के निधन के बाद उनके दशकर्म को लेकर आदिवासी परंपरा के अनुसार जिस तरह सीएम हेमंत सोरेन ने सादगी दिखायी, उसे लोगों ने खूब पसंद किया. पूरे कार्यक्रम तक अपने गांव नेमरा में कुटुंब संबंधियों के साथ रहना, संथाली परंपरा के अनुसार कर्मकांड करना और अतिथियों की आवभगत जिस तरह से किया, उसे उनके धुर विरोधियों ने भी प्रशंसा की.

एके राय और बिनोद बाबू के साथ मिल गुरुजी ने बनाया था झामुमो

झामुमो का उदय :

अलग झारखंड प्रांत के लिए प्रखर आंदोलन करने वाली जयपाल सिंह मुंडा की झारखंड पार्टी का विलय 1963 में कांग्रेस में हो चुका था. इसके बाद अलग राज्य की मांग में शिथिलता आ गयी थी. 1908 में बने छोटानागपुर कास्तकारी अधिनियम को ताक पर रख कर आदिवासियों की जमीन औने-पौने दाम में ली जा रही थी. यहां के आदिवासी व अन्य उत्पादक वर्ग जमींदारों के यहां बंधुआ मजदूर के रूप में कार्यरत थे. राजनीतिक-सामाजिक व आर्थिक शोषण जारी था. कोलियरी क्षेत्रों में निजी खान मालिकों व सत्ताधारी दलों के गठबंधन द्वारा मजदूरों का अनवरत शोषण किया जा रहा था. छोटानागपुर क्षेत्र औद्योगिक इलाका होने के कारण देश के अन्य प्रांतों व उत्तर बिहार के लोग आकर यहां रोजगार पा रहे थे. जिनकी जमीन पर खदान बनायी गयी या कल कारखाने खोले गये, उनका कोई अस्तित्व नहीं था. उनकी आवाज उठाने वाला व्यक्ति भी नहीं था. उस समय के सत्ताधारी दल के जनप्रतिनिधियों का गांवों के गैर उत्पादक चतुर वर्ग के साथ मित्रवत संबंध था. चुनाव के समय भी उन्हीं वर्ग के इशारे पर मतदान किया जाता था. इसकी मुखालफत की जहमत उठाने की हिम्मत किसी में नहीं थी. खेती से उपजी फसल को भी आसानी से बिक्री करने की आजादी नहीं थी.

तिकड़ी ने बदली राजनीति की दिशा

सिंदरी से तीन बार विधायक बन कर एके राय पूरे कोयलांचल में सादगी व संघर्ष के कारण गरीबों के हितैषी के रूप में अपनी छाप छोड़ चुके थे. बलियापुर के बड़ादाहा निवासी बिनोद बिहारी महतो से उनकी दोस्ती हो चुकी थी. दोनों ही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे. उधर, अपने पिता की हत्या के प्रतिशोध में आदिवासियों को एकजुट करने के कारण एक मामले में शिबू सोरेन हजारीबाग जेल में बंद थे. बिनोद बिहारी महतो उस समय एक बड़े अधिवक्ता के रूप में चर्चित हो चुके थे. 1969-70 के आसपास आदिवासियों के उत्थान के लिए बने सोनोत संथाल समाज को शिबू सोरेन संचालित करते थे. उन्होंने हजारीबाग जेल से शिबू सोरेन को अपने हीरापुर आवास लाया. साथ में राजगंज के शंकर किशोर महतो भी थे. फिर एके राय, बिनोद बिहारी महतो व शिबू सोरेन की तिकड़ी बेजुबानों की आवाज बन कर उभरी. झामुमो के संस्थापक कार्यालय सचिव रहे शंकर किशोर महतो इस बाबत बताते हैं कि 1972 में केंद्रीय मंत्री कार्तिक उरांव, एनइ होरो, बागुन सुंब्रई ने बिनोद बाबू को रांची बुलाया. धनबाद से शंकर किशोर महतो व वरिष्ठ अधिवक्ता नारायण महतो को लेकर बिनोद बाबू रांची गये, वहीं पर छोटनागपुर व संताल परगना को मिला कर अलग राज्य की मांग सरकार से की जाने की योजना बनी. धनबाद लौट कर बिनोद बाबू ने एके राय व शिबू सोरेन से इस बात को साझा किया, जिसमें सभी ने सहमति जतायी.

वियतनाम के आंदोलन से प्रभावित होकर पड़ा था नाम

1972 बिनोद बिहारी महतो के चीरागोड़ा स्थित आवास में मसौदा तैयार किया गया कि दक्षिण बिहार (छोटनागपुर, संथाल परगना प्रमंडल) के अलावा झारखंड की भाषा, संस्कृति व परंपरा की समानता पाये जाने वाले ओडिशा के क्योंझर, मयूरभंज, मध्यप्रदेश के सरगुजा व बस्तर तथा पश्चिम बंगाल के पुरुलिया, बांकुड़ा व मिदनापुर को मिला कर अलग राज्य की मांग की जाए. समय वियतनाम में राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व में उपनिवेशवाद से मुक्ति के लिए कम्युनिस्ट नेता हो ची मिन्ह के नेतृत्व में लड़ी जा रही आजादी की लड़ाई और बांग्लादेश में बांग्लादेश मुक्ति वाहिनी नामक संगठन के बैनर तले आजादी की लड़ाई जारी थी. दोनों देशों का संघर्ष उन दिनों काफी चर्चा में था. वहां के संगठनों से प्रेरित होकर नाम दिया गया झारखंड मुक्ति मोर्चा. इसका झंडा तय हुआ हरा झंडा. यह भी तय हुआ कि लाल और हरा झंडा मिल कर लोगों को एकजुट किया जायेगा और अलग राज्य की लड़ाई लड़ी जायेगी. तय हुआ कि अलग राज्य मांग दिवस के रूप में हर साल चार फरवरी को मनाया जायेगा. झामुमो का विधिवत स्थापना दिवस भी उसी तिथि को मनाया जायेगा. समारोह के लिए स्थान का चयन धनबाद का गोल्फ ग्राउंड को किया गया. इससे पहले तीन फरवरी (1973) की रात को बिनोद बाबू के आवास पर प्रमुख नेताओं ने बैठक की. उसमें सारा मसौदा तैयार कर कमेटी बनी. फिर अगले दिन चार फरवरी को गोल्फ मैदान में पहला अधिवेशन हुआ. अधिवेशन के मुख्य वक्ता एके राय थे. कमेटी की घोषणा की गयी, जिसमें अध्यक्ष बिनोद बिहारी महतो, महासचिव शिबू सोरेन व टेकलाल महतो (तोपचांची), उपाध्यक्ष कतरास के राजा पूर्णेंदु नारायण सिंह, कोषाध्यक्ष निरसा के चुड़ामन महतो व कार्यालय सचिव राजगंज लाठाटांड़ के शंकर किशोर महतो बनाये गये. उस समय सचिव बनाये जाने की परंपरा नहीं थी.

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NARAYAN CHANDRA MANDAL

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By NARAYAN CHANDRA MANDAL

NARAYAN CHANDRA MANDAL is a contributor at Prabhat Khabar.

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