Chaibasa News : 1447 हिजरी इस्लामिक नववर्ष 27 जून से, मुहर्रम पहला महीना

Edited by AKASH
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27 जून से इस्लामिक नववर्ष की शुरुआत हो रही है, जिसे हिजरी संवत भी कहा जाता है. इस्लामिक पंचांग के अनुसार यह वर्ष 1447 हिजरी का आरंभ है. इस्लामिक नववर्ष की शुरुआत मुहर्रम के महीने से होती है, जो कि इस्लाम धर्म के चार पवित्र महीनों में से एक है.

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चक्रधरपुर.

27 जून से इस्लामिक नववर्ष की शुरुआत हो रही है, जिसे हिजरी संवत भी कहा जाता है. इस्लामिक पंचांग के अनुसार यह वर्ष 1447 हिजरी का आरंभ है. इस्लामिक नववर्ष की शुरुआत मुहर्रम के महीने से होती है, जो कि इस्लाम धर्म के चार पवित्र महीनों में से एक है. यह न केवल एक नया वर्ष है बल्कि आत्मचिंतन, बलिदान और शांति का प्रतीक भी है. मुहर्रम इस्लाम का पहला महीना होता है और यह अत्यंत पवित्र माना जाता है. यह महीना विशेष रूप से 10वीं तारीख आशूरा के कारण प्रसिद्ध है. आशूरा के दिन इस्लाम के इतिहास की सबसे दर्दनाक और शिक्षाप्रद घटना करबला की युद्ध हुई थी. इसमें हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नवासे हज़रत इमाम हुसैन (र.अ) और उनके परिवार के सदस्यों ने सत्य, न्याय और इस्लामी मूल्यों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी.

शिया मुस्लिम मुहर्रम को शोक के रूप में मनाते हैं

इस्लामिक नववर्ष केवल जश्न मनाने का अवसर नहीं है, बल्कि आत्मनिरीक्षण और आत्मसुधार का समय है. अन्याय के विरुद्ध सत्य और धैर्य की मिसाल से प्रेरणा लेने का अवसर है. जीवन में संयम, तक़वा (धर्मपरायणता) और इंसानियत को प्राथमिकता देने की प्रेरणा मिलती है. यह महीना शांति, भाईचारे और इबादत में व्यतीत करने की शिक्षा देता है. शिया मुस्लिम मुहर्रम को शोक के रूप में मनाते हैं और इमाम हुसैन की शहादत की याद में मजलिसें और मातम करते हैं. सुन्नी मुस्लिम इस दिन रोज़ा रखते हैं और दुआ, खैरात तथा कुरान की तिलावत करते हैं. हज़रत मूसा (अ.) को फिरऔन से निजात इसी दिन मिली थी. नूह (अ.) की नाव इसी दिन जूदी पहाड़ पर ठहरी थी. आशूरा के दिन इमाम हुसैन (र.अ) ने करबला में यज़ीद की सत्ता को चुनौती देते हुए शहादत दी थी.

इंसाफ की रक्षा करना ही असली ईमानदारी है

मुहर्रम हमें सिखाता है कि सच्चाई की राह पर चलने के लिए बलिदान देना पड़े तो भी पीछे नहीं हटना चाहिए. यह महीना दुनिया को यह संदेश देता है कि ज़ुल्म के खिलाफ खड़ा होना और इंसाफ की रक्षा करना ही असली ईमानदारी है. इस्लामिक नववर्ष का स्वागत हम सब को आत्मचिंतन, नफरत के विरुद्ध प्रेम, और अन्याय के विरुद्ध इंसाफ की भावना से करना चाहिए. करबला से प्रेरणा लेकर हम अपने जीवन को सच्चाई, सेवा और समर्पण के मार्ग पर आगे बढ़ा सकते हैं.

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