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कोड़ा एवं मित्र मंडली के कारोबार, खबर कैसे लीक हुई ?

– हरिवंश – मीडिया से सरोकार रखनेवाला एक वर्ग चिंतित है. वह उत्सुकता से खोज रहा है, अटकलें लगा रहा है, आधारहीन अनुमान कर रहा है, बेबुनियाद आरोप भी लगा रहा है. इस वर्ग की चिंता है कि कोड़ा एवं उनकी मित्र मंडली की खबर कैसे लीक हुई ? प्रभात खबर ने की, तो प्रभात […]

– हरिवंश –
मीडिया से सरोकार रखनेवाला एक वर्ग चिंतित है. वह उत्सुकता से खोज रहा है, अटकलें लगा रहा है, आधारहीन अनुमान कर रहा है, बेबुनियाद आरोप भी लगा रहा है. इस वर्ग की चिंता है कि कोड़ा एवं उनकी मित्र मंडली की खबर कैसे लीक हुई ? प्रभात खबर ने की, तो प्रभात खबर का मकसद क्या था? वगैरह-वगैरह. हालांकि मुख्य सवाल गौण है कि जो खबरें छपी हैं, वे सही हैं या गलत? जब बोफोर्स या पशुपालन के मामले हुए, तो उसमें समाज की चिंता झलकी.
राजनीति में मुद्दा यह बना कि वे खबरें सही हैं या गलत? गुजरे दो दशकों में यह सामाजिक-राजनीतिक सरोकार बदला है. अब यह भी मुद्दा है कि खबर लीक क्यों-कैसे हुई ? करनेवाले की मंशा क्या थी?यह भी सही है, सवाल जरूर उठने चाहिए. पर बिना तहकीकात, मनगढ़ंत बातें लिखकर कुछ भी कह देना. यह नयी प्रवृत्ति-संस्कृति है.
यह कोई नहीं कह या पूछ या तलाश रहा कि यह सब खेल तो वर्षों से चलता रहा होगा, यह सब एक दिन में तो हो नहीं सकता, तब आवाज क्यों नहीं उठी? ऐसा भी नहीं था कि इन चीजों की जानकारी किसी को न हो, खुद अजय माकन के नेतृत्व में कांग्रेस ने कोड़ा सरकार एवं मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाये. पर किसने उन आरोपों की गहरी छानबीन की? पुख्ता सबूत जुटाये? झारखंड की राजनीति में जुड़े लोग सब जान-देख रहे थे. यह खुला खेल फर्रूखाबादी था. जग जाहिर था. तब क्यों नहीं उठे ये मामले? इस प्रसंग पर चर्चा बाद में. पहले खबर सार्वजनिक होने के स्रोत पर जो चीजें छपी हैं, उन पर बात.
1. यह खबर कैसे लीक हुई , इस पर एक सामग्री राष्ट्रीय सहारा में छपी है. 11 नवंबर 2009 को. दिल्ली से. ‘ हैकर की सेंध से हुआ फर्जीवाड़े का खुलासा’ (देखें – खबर संलग्न: 1). इस खबर के अनुसार इसका भंडाफोड़ एक आइटी हैकर ने किया . इस हैकर का नाम चंदन बताया गया है. खबर के अनुसार इस हैकर ने एक साल पहले आयकर विभाग के अफसरों को इस मामले में एक मोटी फाइल सौंपी थी.
इस खबर में यह भी उल्लेख है कि सरकारी विभागों ने इस हैकर को मोटी फी देने की बात की और वह आगे काम करता रहा. इस खबर के अनुसार, एक साल में यह हैकर 120 मेल भेज चुका है. इस खबर के अनुसार कोड़ा ने अनेक उद्योगपतियों से खान देने के नाम पर मोटा पैसा वसूला था, लेकिन इन लोगों को न तो खदानें मिलीं, न ही पैसा वापस मिला. उल्टे मुख्यमंत्री पद पर बैठे कोड़ा ने अंजाम भुगतने की धमकी दी. इस हरकत से चिढ़ करके इन लोगों ने हैकर को काम दिया.
2. Hackers Crack the Koda Code !(खबर,संलग्न : 2). हिंदुस्तान टाइम्स्, 18 नवंबर 2009 रांची संस्करण. इस खबर का सारांश है कि अवैध ढंग से अर्जित 4000 करोड़ का निवेश कई देशों के खदानों में किया गया. इस खबर की सुराग किसने पायी? क्या प्रवर्तन निदेशालय? उत्तर, हां और ना दोनों में. इस खबर में यह भी संभावना व्यक्त की गयी है कि कुछ निवेशक जो कोड़ा सरकार से नाराज रहे होंगे, उन्होंने हैकर्स को लगाया होगा. यह काम वर्ष भर पहले शुरू हुआ होगा.
3. तीसरी खबर है आउटलुक पत्रिका में, 23 नवंबर 09, (खबर संलग्न:3). इस खबर के अनुसार प्रभात खबर में 2007 से लगातार खोजपरक रपटें छपीं, जिनसे इस मामले का भंडाफोड़ हुआ. खबर के अनुसार, प्रभात खबर का स्वामित्व न्यूट्रल पब्लिशिंग हाउस के पास है.
न्यूट्रल पब्लिशिंग हाउस में उषा मार्टिन ग्रुप के मालिकों का मेजारिटी शेयर है. यह कंपनी झारखंड स्टेट मिनरल डेवलपमेंट कारपोरेशन के साथ मिलकर संयुक्त उपक्रम (ज्वांइट वेंचर) में कंपनी बनाना चाहती थी. कोड़ा जब मुख्यमंत्री हुए , तो उन्‍होंने अंतत: इसको खारिज कर दिया. पत्रिका के अनुसार रांची के अफवाह बाजार को मानें, तो इसके बाद एक प्राइवेट डिटेक्टिव फर्म को हायर किया गया .
इस तरह खबरें एक्सपोज हुईं. पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार इस स्कैम का खुलासा तब हुआ, जब कोड़ा ने उषा मार्टिन ग्रुप का प्रपोजल रिजेक्ट कर दिया. तब प्रभात खबर ने अनेक रिपोर्टों की श्रृंखला शुरू की.
4. एक चौथा कोण है, कोड़ा जी एंड कंपनी का. हालांकि यह तीसरे कोण का ही विस्तार है. 25 जुलाई 2009 को राज्य सरकार के निगरानी विभाग ने झारखंड के कुछ पूर्व मंत्रियों समेत, कोड़ा के घर पर छापे डाले. याद रखिएगा. यह झारखंड सरकार के निगरानी विभाग ने ये छापे मारे थे. भारत सरकार के आयकर या प्रवर्तन निदेशालय ने नहीं. प्रभात खबर में यह खबर छपी (देखें प्रभात खबर 25 जुलाई 2009) (संल :4).
प्रभात खबर ने खबर देने के साथ, तब यह सवाल उठाया कि झारखंड में जब यह सब हो रहा था, तब सब मौन क्यों थे? इस अंक में प्रभात खबर में इस विषय पर खासतौर से तीन पेज की सामग्री छपी, कि तब झारखंड के मंत्री क्या-क्या कर रहे थे? कैसे यह स्कैम हो रहा था, इनकी खबरें तब प्रभात खबर में कैसे छपीं, यह भी उल्लेख था.(25 जुलाई, पेज 15, 16, 17-संल:5,6,7). इस खबर से तमताये कोड़ा जी ने अगले दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस किया. प्रभात खबर के खिलाफ बोले. उनके सभी आरोप प्रभात खबर में छपे. प्रभात खबर ने उनका जवाब भी दिया (प्रभात खबर 26 एवं 27 जुलाई 09, संलग्न – 8,9). कोड़ा ने यह भी कहा ये छापे कागजी कतरन के आधार पर डाले गये हैं. मेरे खिलाफ एक भी प्रमाण नहीं है.
31 अक्टूबर को कोड़ा जी एवं उनके मित्रों से जुड़े 76 ठिकानों पर आयकर, प्रवर्तन निदेशालय के छापे पड़े. प्रभात खबर में छापों के विवरण छपे. कुल 5 पेजों की सामग्री. (देखें प्रभात खबर 1 नवंबर 09, संलग्न : 10). इसके बाद कोड़ा जी के पिताजी ने अंग्रेजी में पत्र भेजा. वित्त मंत्री को.
तीन पेज के इस पत्र में एक आरोप यह भी था कि एक स्थानीय दैनिक इस मामले में गड़बड़ चीजें छाप रहा है, क्योंकि कोड़ाजी ने एक इंडस्ट्रियल हाउस का काम नहीं किया. उनका आशय ‘प्रभात खबर’ से ही रहा होगा, यह लगा. सबसे पहले कोड़ा जी के पिता जी के आरोप की यह खबर प्रभात खबर में ही छपी. पहले पेज पर. (देखें प्रभात खबर 11 नवंबर 09, संग्लन: 11). बाद में अन्यत्र. हालांकि बताते चलें कि कोड़ाजी के पिताजी ‘हो’ भाषा छोड़कर अन्य नहीं जानते. पर अंग्रेजी में उनका यह पत्र लिखा गया था.
यह सब उल्लेख इसलिए कि कोड़ा जी और उनके मित्रमंडली के जो भी आरोप प्रभात खबर पर लगे, प्रभात खबर ने उन्हें सबसे पहले छापा. प्रमुखता से छापा. पहले पेज पर छापा. आयकर छापों-प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई के बाद कोड़ा जी धमकी देते घूमे कि हम इस मामले का राज बतायेंगे. साफ है प्रभात खबर और इंडस्ट्रियल हाउस के बारे में उनके जो भी दुख-दर्द-पीड़ा हैं, वे अनेक बार बाहर आ चुके हैं.
पर इस घटना के बहाने अब वह कांग्रेस को धमकी देते घूम रहे थे. उनके सहयोगी कांग्रेस पर तरह -तरह के आरोप लगाते घूम रहे हैं. यह कांग्रेस जाने, कोड़ाजी जानें. पर जो लोग प्रभात खबर के खिलाफ रांची के रियूमर मिल (अफवाहों की दुनिया) से निकली चीजों पर आरोप लगा रहे हैं, या गॉसिप सुन कर प्रभात खबर के खिलाफ निष्कर्ष निकाल रहे हैं, उनकी जानकारी के लिए एक-एक तथ्य यहां प्रस्तुत है ताकि पूरी तस्वीर स्पष्ट हो.
फिर दोहरा दें, हम रियूमर मिल की बात नहीं, इस पूरे प्रकरण के तथ्य और यथार्थ सामने रख रहे हैं. प्रभात खबर में विनोद सिन्हा के बारे में सबसे पहले कब रिपोर्ट छपी? आउटलुक के आरोप में आपने पढ़ा कि कोड़ाजी ने प्रभात खबर से जुड़ी कंपनी का कोई प्रोपोजल रिजेक्ट कर दिया. इसके बाद. हालांकि आरोप लगाने वाले यह भी कह रहे हैं कि रियूमर मिल (चंडूखाने की गप) की चर्चा के अनुसार ऐसा है. पर तथ्य यह है कि विनोद सिन्हा से जुड़ी पहली (लीड खबर) बड़ी खबर12 नवंबर 2006 को प्रभात खबर में छपी थी (देखें खबर, संलग्न:12). इस रिपोर्ट का विषय क्या था? तब कोड़ाजी न मुख्यमंत्री थे, न दूर-दूर तक उनके मुख्यमंत्री होने के आसार थे. विनोद सिन्हा ने सोनालिका ट्रैक्टर की एजेंसी ली थी. चाईबासा में.
सरकारी प्रावधान के तहत गरीबों को ट्रैक्टर मिलने थे. बैंक आफ बड़ौदा ने ऋण दिया था. और राज्य सरकार ने प्रति ट्रैक्टर सब्सिडी. इसमें घोटाला हो गया.
बैंक आफ बड़ौदा ने कार्रवाई की. शिकायत दर्ज हुई . चाईबासा के प्रमंडलीय आयुक्त ने इस पूरे मामले की जांच की. सूचना यह थी कि बैंक आफ बड़ौदा के स्थानीय मैनेजर, ट्रैक्टर डीलर और सरकारी अफसरों ने मिल कर जमीन के फर्ज कागजातों पर ऋण निकासी की. इन लोगों ने आदिवासी किसानों को गुमराह कर ऋण का पैसा आपस में बांट लिया. बाद में बैंक आफ बड़ौदा इस मामले की सीबीआइ जांच कराने के प्रस्ताव के साथ हाइकोर्ट गया. तब तक मधु कोड़ा मंत्री थे.
विनोद सिन्हा उनके प्रियपात्र. पर प्रमंडलीय आयुक्त की जांच रिपोर्ट के बाद भी मामले पर कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी. क्योंकि आरोप था कि कोई ताकतवर आदमी विनोद सिन्हा को कानून के फंदे से बचा रहा है. वह ताकतवर कोई और नहीं, विनोद सिन्हा जी के संरक्षक कोड़ाजी थे. रविवार 12 नवंबर 2006 को यह लीड खबर प्रभात खबर में छपी. किसी और जगह यह खबर नहीं आयी.
आयकर के हाल के छापों से एक कंपनी का पता चला है, जिससे ब्लैकमनी को व्हाइट बना कर बैंक आफ बड़ौदा का लोन हाल में चुकाया गया. कोर्ट से बाहर सेटलमेंट कर. वर्षों बाद इस मामले में हाईकोर्ट का सख्त रूख देख कर विनोद सिन्हा ने कोर्ट से बाहर बैंक को पैसा चुका कर सेटलमेंट की कोशिश की. अपनी एक विवादास्पद कंपनी से ब्लैकमनी देकर. इस कंपनी के पास कहां से पैसे आते थे, यह राज हाल के आयकर छापों से पता चला है.
सूचना है कि यह मामला अब नये सिरे से बढ़ेगा. क्योंकि पैसा चुका देने के बाद भी जिन फर्जी लोगों को ट्रैक्टर देने की बात सामने आयी है, उसमें स्टेट की सब्सिडी इनवाल्व है. सवाल यह उठ रहा है कि पैसा चुका देने के बाद भी धोखाधड़ी या अपराध का जो मामला हुआ है, सरकार की सब्सिडी हड़प कर, फर्जी किसानों को ऋण दे कर, ये मामले अलग हैं.
अपराध की भाषा में कहें, तो लोन तो चुकता हो गया, पर धोखाधड़ी वगैरह का ‘क्राइम’ तो हुआ ही. यह अलग इश्यू है. इसलिए कानूनविद कह रहें हैं कि इनके खिलाफ तो ऋण चुकाने के बाद भी कार्रवाई होगी ही. क्योंकि ये धोखाघड़ी और फर्जी काम से जुड़े प्रसंग हैं. सूचना है कि आयकर छापों के बाद, बैंक आफ बड़ौदा से भी पूछताछ हुई है कि उन्हें चुकता किये गये पैसे कहां से, कैसे आये, यह पता है? अब दोबारा यह मामला भी नये सिरे से शुरू हो रहा है.
इस तरह प्रभात खबर ने विनोद सिन्हा पर 2007, 2008 या 2009 में पहली रिपोर्ट नहीं छपी. 2006 में ही पहली रिपोर्ट छपी थी. तब कोड़ा जी या किसी ने कोई आरोप नहीं लगाया. वे दिन थे, जब विनोद सिन्हा चाईबासा से उभर कर रांची में अपनी कला दिखाने लगे थे.
फिर 18 सितंबर 2006 को कोड़ाजी मुख्यमंत्री बने. कोड़ाजी के मुख्यमंत्री बनने के समय ही प्रभात खबर ने लगभग छह लेख छपे.
– झारखंड का राजनीतिक भविष्य (दिनांक 11 सितंबर 06, संल : 13)
-निराशा के फर्ज (दिनांक 12 सितंबर 06, संल : 14)
– ये चेहरे और इनके काम याद रखें (दिनांक 13 सितंबर 06, संल : 15)
– झारखंडी विधायकों से अनुरोध (दिनांक 14 सितंबर 06, संल : 16)
– प्रत्याशा के विपरीत, पर स्वागत योग्य (दिनांक 15 सितंबर 06, संल : 17)
– होनेवाले मुख्यमंत्री जी! बिन मांगी एक सलाह (दिनांक 17 सितंबर 06, संल : 18)
इसमें बार-बार कहा गया कि यह निर्दलियों की सरकार सबसे अधिक गैर जिम्मेदार, भ्रष्ट और गलत होगी. क्योंकि प्रभात खबर की दृष्टि पहले दिन से ही साफ थी. झारखंड के राजनीतिज्ञों और मंत्रियों की करतूतों को देख कर. ये सभी अर्जुन मुंडा सरकार में भी मंत्री थे. अर्जुन मुंडा सरकार के इन मंत्रियों के कारनामों पर लगातार प्रभात खबर में खबरें छपतीं रहीं थीं.
एक से बढ़कर एक हैरतअंगेज कारनामे. सोने की ईंट खरीदने से लेकर दो करोड़ की हार पहनने तक. लाखों की अंगूठी पहन कर सार्वजनिक प्रदर्शन तक. इससे स्पष्ट था कि बिना लगाम यह सरकार क्या करेगी? क्योंकि इन निर्दलियों पर किसी का अंकुश नहीं था. न दल का, न दल के किसी वरिष्ठ नेताओं का. किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, पर सरकार बनने के समय ही प्रभात खबर ने बार-बार यह सैद्धांतिक-व्यवहारिक सवाल खड़ा किया कि इस सरकार पर किसका अंकुश होगा? कांग्रेस या राजद क्यों नहीं सरकार में शामिल होते?
पर अभी चर्चा विनोद सिन्हा की ही. जो इच्छुक लोग देखना चाहते हैं कि गैर जिम्मेदार मंत्रियों और अन्य लोगों पर प्रभात खबर में झारखंड बनने के बाद से कोड़ाजी के मुख्यमंत्री बनने तक क्या चीजें छपी. उनका स्वागत है. पर यह लंबा प्रकरण है. मुख्यमंत्री पद पर कोड़ाजी के पदारूढ़ होते ही विनोद सिन्हा, चाईबासा और रांची के ‘कलाकार’ से बढ़ कर रातोंरात देश स्तर के हुनरमंद हो गये. फिर प्रभात खबर ने उनके इस ‘सक्सेस स्टोरी’ को उजागर किया 2007 में.
– ‘कौन है विनोद सिन्हा’ (20 अगस्त 2007, संल: 19). यह पहली रिपोर्ट थी.
– ‘लौह अयस्क खदान और कोयला खदान – आवंटन प्रक्रिया में छुपे हैं ,कई राज’ . (21 अगस्त 07, संल:20)
– ‘सिर्फ और सिर्फ एक जांच से तथ्य सामने होंगे और वे तथ्य छिपे हैं, इन मोबाइलों में’ . (22 अगस्त 07, संल:21)
– ‘विवादों – आरोपों से घिरे हैं विनोद के आर्थिक उत्थान के शुरूआती दिन’ . (23 अगस्त 07, संल:22)
– ‘भूखंड, फ्लैट, मंहगी गाड़ियां व फैक्टरी’ . (24 अगस्त 07, संल : 23)
– ‘दोषी व्यवस्था है!’ (25 अगस्त 07, संल : 24). कांग्रेस सांसद बागुन सुंब्रुई का पत्र इसमें छपा है, जो उन्होंने छह जुलाई 2007 को विनोद सिन्हा की करतूतों के बारे में वहां के उपायुक्त को लिखा.
गौर करिए. इन रिपोर्टों में कहीं भी विनोद सिन्हा के विदेशी कारोबार, धंधे का उल्लेख नहीं था. कैसे वह चाईबासा से दूध बेचते-बेचते, देश के एक बड़े व्यवसायी हो गये, इसका उल्लेख था. पहले दिन की रिपोर्टिंग (20 अगस्त 2007) पढ़ें. झारखंड के एक अधिकारी ने ई-मेल भेज कर प्रभात खबर से विनोद सिन्हा की पड़ताल का अनुरोध किया. उस ई-मेल के अंश भी उसी दिन के प्रभात खबर की पहली रपट में हैं.
दो तथ्यात्मक चीजें. सुना है, कोई प्रतिनिधि कह रहे हैं कि विनोद सिन्हा पर सिर्फ दो ही रिपोर्ट प्रभात खबर में छपीं, फिर बंद हो गयीं. 20 अगस्त, 21 अगस्त, 22 अगस्त, 23 अगस्त, 24 अगस्त और 25 अगस्त 2007 को लगातार छपी छह बड़ी रपटों को कोई दो ही रिपोर्ट कहे, तो इसका क्या उत्तर है! ये सभी खबरें पहले पेज पर छपी हैं. सिर्फ 25 अगस्त 2007 की रिपोर्ट अंदर है और ब़ड़ी है. अब ऐसे सवाल उठाने वालों को क्या जवाब दिया जाये?
यह स्वत: स्पष्ट है. दूसरा यह भी प्रचार किया जा रहा है कि यह रपट लिखने वाले एक संवाददाता इस रिपार्ट श्रृंखला लिखने के बाद प्रभात खबर से जुड़े नहीं रहे. तथ्य यह है कि वह संवाददाता अगस्त 2007 से नवंबर 2008 तक लगातार प्रभात खबर से जुड़े हुए थे. अपने पारिवारिक काम के कारण, कुछ समय के लिए इस पेशे से ही वह अलग हैं. पर अब भी जुड़े हैं. हालांकि किसी विषय पर एक ही संवाददाता काम नहीं करता, अनेक करते हैं. इस तरह प्रभात खबर में अगस्त’ 07 में छह रिपोर्ट छपीं.
उसमें कई संवाददाताओं का भी सहयोग था. फिर 25 अगस्त 2007 से 17 सितंबर 2008 के बीच लगातार इन लोगों के कारनामों पर कुछेक चीजें प्रभात खबर में छपीं. ये सभी चीजें उन्हीं संवाददाता ने लिखी, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि दो रिपोर्ट लिखने के बाद वह प्रभात खबर में नहीं रहे. शुरू की छह बड़ी रपटों को छोड़ दें, तो उसके बाद एक और बड़ी रपट छपी कि विनोद सिन्हा व संजय चौधरी ने कुल कितनी कंपनियां बना ली हैं? इन दो वर्षों में.
लीड स्टोरी थी. साथ में इनके कार्यों पर छोटी-छोटी रपटें, लगातार छपीं. ये सभी खबरें सत्ता गलियारे में विनोद सिन्हा-संजय चौधरी के बढ़ते हस्तक्षेप से जुड़ी थी. यानी 2007 से 2009 तक लगातार सामग्री छपती रही है. हां, दो वर्षों में रोज-रोज यही विषय तो नहीं हो सकता. न विषय से जुड़ी इतनी खबरें रोज निकलती हैं कि वे रोज छापी जायें. पर जब भी कोई पुख्ता सूचना मिली, प्रभात खबर में छपीं. यह कोई आ कर चेक करना चाहे, तो उसका स्वागत है.
एक महत्वपूर्ण तथ्य यहां स्मरण कराना चाहेंगे. प्रभात खबर में 2008 सितंबर तक विनोद सिन्हा प्रकरण से जुड़ी चीजें छपती रहीं. पर तब तक विनोद सिन्हा का साम्राज्य बड़ा नहीं हुआ था . हिंदुस्तान टाइम्स के आंकड़े को मानें, तो अगस्त 07 तब (जब तक प्रभात खबर में विनोद सिन्हा से जुड़ी रपटें छपीं) यह घोटाला 5-7 सौ करोड़ का भी नहीं हुआ होगा.
प्रभात खबर का यकीन है कि अगर हमारी व्यवस्था कारगर होती, सभी मीडिया मिलकर सामूहिक व सही चौकीदारी करते, तो अगस्त 07 में प्रभात खबर में छपी छह बड़ी रपटों पर कार्रवाई हो गयी होती. और आज झारखंड के 4000 करोड़ नहीं लुटे होते! यह सिस्टम नहीं ढहा होता? कोड़ाजी के दुर्दिन नहीं आये होते?
किसी भी संवेदनशील और जागरूक समाज में सवाल तो यह होना चाहिए कि इन छह बड़ी रपटों के छपने के बाद क्या कार्रवाई हुई ? प्रभात खबर में इन रपटों के छपने के बाद ही महाघोटाले हुए . विदेशों में माइंस को खरीदने से लेकर और न जाने क्या-क्या? यहां यह सवाल उठेगा ही कि व्यवस्था कारगर नहीं हुई , कानून ने अपना काम नहीं किया. फलस्वरूप मामूली ‘डीलर’ भी बेधड़क, बेडर ‘महाखिलाड़ी’ हो गये? कैसे यह कमजोर व्यवस्था या कानून के क्रियान्वयन के लिए बनी सुस्त, पस्त संस्थाएं छोटे अपराधियों को बड़ा अपराधी बना देती हैं?
कोड़ाजी, विनोद सिन्हा एंड मित्र मंडली इसलिए इस स्तर तक पहुं चे , क्योंकि उन्हें कानून का भय नहीं रहा. इसलिए दूसरा कोड़ा या विनोद सिन्हा या नया संजय चौधरी न हों, इसके लिए व्यवस्था को ठीक करना होगा, चौकस, ईमानदार, काबिल और इफीशियंट बन कर. इसमें क्या-क्या खेल हुए हैं, यह पूरा प्रकरण तो जांच से ही स्पष्ट होगा?
2007 अगस्त में ये रपटें छपीं. फिर छोटी-बड़ी खबरें इनसे जुड़ी छपती रहीं. इन खबरों पर कोई कार्रवाई न होते देख, उनका मनोबल बड़ा. धड़ल्ले से इनका कारोबार फैलने लगा. पर 2007 से 2008 सितंबर के बीच इन लोगों के अंतरराष्ट्रीय फलक पर छा जाने की गंध किसी को नहीं मिली. इन्होंने खुद दी. अपने अंतरराष्ट्रीय कारोबार को सार्वजनिक बनाया. कैसे?
विनोद सिन्हा, संजय चौधरी और कोड़ा राष्ट्रीय सुर्खियों में कैसे और कब आये? विदेशों में इनकी जड़ें कहां तक फैली हैं, यह पहली बार कैसे सार्वजनिक हुआ? जिसका श्रेय प्रभात खबर को दिया जा रहा है या तोहमत कि प्रभात खबर ने सबसे पहले इनके विदेशी निवेशों को श्रृंखलाबद्ध कर छापा और मामले को उजागर किया. इसका सच क्या है? फिर दोहरा दें. हम सिर्फ तथ्य बता रहे हैं. गासिप के आधार पर कुछ भी नहीं या पूर्वाग्रह से कोई बात नहीं.
17 सितंबर 2008 का दिन था. अखबारों में विश्वकर्मा पूजा की छु˜ट्टी थी. उसी दिन संजय चौधरी को भारी मात्रा में अवैध विदेशी करेंसी दुबई ले जाने के क्रम में मुंबई कस्टम ने इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर डिटेन किया. यह खबर आग की तरह सभी राष्ट्रीय व क्षेत्रीय चैनलों पर चली. उस दिन के सभी बड़े चैनलों की सुर्खियां और हेडिंग देखें. संजय चौधरी, विनोद सिन्हा और कोड़ाजी के बारे में क्या-क्या चीजें दिखाई गयीं? क्या कहा गया? हां, वे खबरें अनुमान या सूत्रों के आधार पर दिखायी या बतायी गयीं. अगले दिन अखबार बंद थे.
अखबार 19 सितंबर 2008 को निकले. कोड़ा एंड कंपनी के विदेशी निवेश की सबसे पहली खबर और भंडाफोड़ किसी ने किया, तो वह ई-टीवी था. 19, 20,21,22,23,24 सितंबर 2008 के ई-टीवी के पुराने कार्यक्रमों को गौर करें. इस प्रसंग से जुड़ी खबरों को स्मरण करें. कहीं मिलें, तो फिर देखें. विनोद सिन्हा, संजय चौधरी के विदेशी कारोबार से जुड़े अनेक दस्तावेज सबसे पहले ई-टीवी पर दिखाये गये. सबसे पहले किसी अखबार में इंडोनेशिया में माइंस लेने की खबर छपी, तो वह रांची का दैनिक जागरण था.
– ‘इंडोनेशिया में माइंस ले रखी है संजय चौधरी ने’ (20 सितंबर 08, दैनिक जागरण, संल:25).
इस विदेशी संपत्ति का भंडाफोड़ फिर 23 सितंबर 2008 के अंक में हुआ.
– ‘दुबई के बैंकों से करोड़ो की राशि ट्रांसफर’ (देखें 23 सितंबर 08, दैनिक जागरण, संलग्न: 26).
फिर 24 सितंबर 2008 को इसी अखबार में छपा कि सीएम के पीएस ने कैसे एक संदिग्ध को पत्र लिखा .
– ‘बैंकॉक में भी खोली कंपनी’ (देखें 25 सितंबर 08, दैनिक जागरण, संलग्न: 28). इस तरह कोड़ा एंड कंपनी के विदेशी निवेश के भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ सबसे पहले ई-टीवी चैनल और 20 सितंबर से 25 सितंबर 2008 तक दैनिक जागरण की रपटों से हुआ.
इस दौरान 19 सितंबर से 23 सितंबर 2008 के बीच प्रभात खबर में क्या चीजें छपीं? 19 सितंबर 2008 की रिपोर्ट देखें. यह महज सूचनात्मक रिपोर्ट थी.
– ‘भारी मात्रा में अवैध करंसी ढोकर दुबई ले जा रहा था- मुंबई कस्टम ने संजय चौधरी को रोका’ (संलग्न:29).
– 20 सितंबर 2008 को ‘कोड़ाजी! आपके रेफरेंस से संजय चौधरी का पासपोर्ट बना’ (संल : 30).
– 21 सितंबर को एक पुरानी रपट ही पुन: प्रभात खबर में छपी ‘कोड़ा ने संजय चौधरी के साथ थाइलैंड की यात्रा की थी’ (संलग्न: 31).
– 22 सितंबर 2008 को भी प्रभात खबर में एक पुरानी रिपोर्ट छपी, ‘कोड़ा के कार्यकाल में किसके आदेश पर विनोद सिन्हा व संजय चौधरी को सरकारी सुरक्षा मिली’ (संलग्न: 32).
इन गुजरे तीन-चार दिनों में कोड़ाजी की मित्रमंडली के विदेशी कारोबार के बारे में चार-पांच रपटें दैनिक जागरण छाप चुका था. ई-टीवी दिखा चुका था. इनके विदेशी कारोबार के बारे में. तब प्रभात खबर ने एक चैनल से संपर्क कर, उन्हें मिले दस्तावेजों की प्रति मांगी. 23 सितंबर 2008 के अखबार में फिर प्रभात खबर ने छापा ‘स्तब्ध करनेवाले लूट के नये दस्तावेज’ (संलग्न: 33). यह दस्तावेज भी ई-टीवी में दिखाया जा चुका था. यह भी बासी और पुरानी सामग्री थी.
24 सितंबर 2008 को प्रभात खबर ने बाजी मारी. जब उसने चाईबासा में विनोद सिन्हा के भाई सुनील सिन्हा द्वारा खरीदी जमीन घोटाले की खबर छापी. कई किस्तों में. यह भूमि मूलत: आदिवासियों की थी, जो अहस्तांतरणीय है. कई प्लाटों पर यह सब हुआ. पर यह सब असंभव काम चाईबासा के तत्कालीन उपायुक्त की मदद से संभव हो रहा था.
25 सितंबर को प्रभात खबर ने पुन: पहले अन्यत्र छप चुकी और टीवी पर दिखाई जा चुकी एक तस्वीर को छापा, जो थाइलैंड के एक लाइमस्टोन फैक्ट्री की है. उस दिन प्रभात खबर ने मुख्यमंत्री कोड़ा जी के पीए, श्रीवास्तव का वह पत्र भी छापा, जो एक अखबार में पहले ही छप चुका था.
लगभग सप्ताह भर ईटीवी और अन्य जगहों पर कोड़ा जी एवं उनकी मित्र मंडली के विदेशी कारोबार की छपी खबरें व दस्तावेज देखकर प्रभात खबर को लगा कि यह मामला अत्यंत गंभीर है. एक टीवी चैनल व एक अखबार से इस मुद्दे पर पिछड़ जाने के बाद प्रभात खबर ने डॉक्यूमेंट पाने का स्रोत तलाशना शुरू किया. अंतत: एक चैनल के सहयोग व माध्यम से प्रभात खबर को भी दस्तावेज मिलने लगे.
इन तथ्यों से यह धारणा स्पष्ट होनी चाहिए कि कोड़ा जी एवं उनके मित्रों के विदेशी कारोबार से जुड़े दस्तावेज सबसे पहले कहां छपे और कहां दिखाये गये. उन दिनों के अखबार भी संलग्न हैं, जो स्वत: इन तथ्यों के प्रमाण हैं.
यह दस्तावेज देनेवाला कौन था? पर इससे भी पहले यह जान लें कि चाईबासा में जो जमीन घोटाला हुआ, उसके कागजात प्रभात खबर तक कैसे पहुं चे? देश के अंदर विनोद सिन्हा एंड कंपनी के कामकाज से जुड़ी रपटें-दस्तावेज पहले प्रभात खबर में छपे. पर विदेशी कारोबार की खबरें पहले अन्य जगहों पर आयीं.
चाईबासा जमीन घोटाले के मामले में सबसे पहले प्रभात खबर ने ही रिपोर्ट की थी. सिंहभूम के ही एक ‘हो ’लड़ाकू नौजवान ने प्रभात खबर का नंबर लेकर संपर्क किया. कहा कि हम आदिवासियों की जमीन कैसे और कौन लोग छीन रहे हैं, इसके दस्तावेज हम आपको दें, तो क्या आप छापेंगे? वह युवा अपने खर्च से बस में बैठकर शायद पहली या दूसरी बार रांची आया था.
उसने सारे दस्तावेज सौंपे. इससे अधिक उस युवक के बारे में जानने के बदले हम यह पता करें कि वे दस्तावेज सही थे या गलत? ये सारे दस्तावेज सही थे और छपते ही वहां हड़कंप मच गया. चूंकि 2007 में प्रभात खबर ने विनोद सिन्हा के उभरते कामकाज, फैलते भारतीय कारोबार पर रिपोर्ट छापी थी. इसलिए उस ‘हो’ युवा को लगा कि यहां रिपोर्ट छप सकती है. इस जमीन गड़बड़ी की रिपोर्ट छपी.
प्रभात खबर के पास कैसे पहुं चे विदेशी कारोबार के दस्तावेज?
इस संबध में ऊपर तीन खबरों का उल्लेख है. 1. हिंदुस्तान टाइम्स (18 नवंबर, 2009), 2. राष्ट्रीय सहारा (11 नवंबर, 2009), 3. आउटलुक पत्रिका (23 नवंबर, 2009). शुरु में ही जान लें कि राष्ट्रीय सहारा में छपी रपट तथ्यों के सबसे करीब है.
शुरू के लगभग सप्ताह भर तक कोड़ा जी एवं मित्रों के विदेशी कारोबार की खबरें देने में प्रभात खबर पिछड़ा. प्रभात खबर को जब लगा कि ये अत्यंत महत्व के दस्तावेज हैं, फिर प्रभात खबर दस्तावेजों तक पहुं चा. लगातार इनके महत्व और गंभीरता को समझते हुए , इसे उठाता रहा. हालांकि बीच-बीच में एक अन्य, दैनिक में भी इस विदेशी कारोबार से जुड़ी चीजें छपीं. पर प्रभात खबर ने एक सप्ताह पिछड़ने के बाद फिर लगातार इन्हें छापा.
कैसे मिले दस्तावेज?
प्रभात खबर ने डाक्यूमेंट पाने की पुरजोर कोशिश की. जिस चैनल के पास इंटरनेट पर सबसे पहले खबरें पहुं चीं, दस्तावेज भेजे गये, उसी चैनल को डाक्यूमेंट देनेवाला बीच-बीच में फोन करता था. किसी नंबर से. उनसे आग्रह किया गया कि यह दस्तावेज वह प्रभात खबर को भी भेजें.
लगभग एक सप्ताह बाद, 23 या 24 सितंबर 2008 से लिफाफे में डालकर प्रभात खबर के पास दस्तावेज पहुं चने लगे. फिर उधर से दस्तावेज मिलने, न मिलने के फोन भी कभी-कभार आने लगे. आरंभ में वे दस्तावेज समझ के बाहर थे.
अत: फोन करनेवाले व्यक्ति से प्रभात खबर ने साफ-साफ कहा. ये दस्तावेज हमारे समझ के परे हैं. जब तक इन दस्तावेजों से संबंधित तथ्य, साथ नहीं होंगे, हम इन आंकड़ों से कोई अर्थ नहीं निकाल सकते. फिर डाक्यूमेंट भेजने के साथ-साथ उस व्यक्ति के फोन भी आने लगे. डाक्यूमेंट समझाने के लिए.
इसी बीच झारखंड हाईकोर्ट में मंत्रियों के भ्रष्टाचार के खिलाफ पीआइएल हो चुका था. किसी दुर्गा उरांव की याचिका थी. अखबारों में छपे दस्तावेजों को देख कर. याचिका दायर करनेवाले कुछेक लोग आये. उन्होंने डाक्यूमेंट मांगे. प्रभात खबर ने कहा, जो डाक्यूमेंट छपे हैं, वहीं हैं. पर हमारा काम खबरों को छापने तक है. डाक्यूमेंट देना नहीं. पर डाक्यूमेंट बांटनेवाले तब तक हर जगह पहुं च चुके थे.
इसलिए डाक्यूमेंट कैसे और कहां से मिले, यह सार्वजनिक है. जिस चैनल ने सबसे पहले दिखाया. उसके बाद, एक दूसरे अखबार में आरंभिक कुछ दिनों (सितंबर 08) तक सबसे पहले विदेशी कारोबार से जुड़ी खबरें छपीं. कोर्ट तक कागजात पहुं चे. सरकारी विभागों के पास भी कागजात थे. इस खबर भंडाफोड़ प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है कि जो लोग डाक्यूमेंट देनेवाले थे, उन्हें मधु कोड़ा, विनोद सिन्हा और संजय चौधरी वगैरह बेहतर तरीके से जानते होंगे. थाइलैंड से लेकर अन्य जगहों पर इनकी एक साथ हुई विदेश यात्राओं के गहरे राज हैं.
चर्चा है कि अभी भी ये राज खुलने शेष हैं. इस तरह यह खबर, कोड़ाजी की मित्र मंडली के बीच से लीक हुई है. न किसी ने दस्तावेज हैक किया. और न किसी ने भाड़े पर किसी जासूस को ढ़ूंढ़ा या काम सौंपा. यह तो हुई खबर लीक होने की चर्चा. पर खबर भंडाफोड़ से आहत लोग इस बुनियादी तथ्य की जांच करते-कराते कि वो खबरें गलत हैं या सही?
अगर खबरें सही हैं, तो एक दिन में ये घटनाएं नहीं हुई होंगी. वर्षों-वर्षों यह सब चला होगा. तब दो-एक जगह छोड़ कर बाकी लोग क्यों नहीं ये सवाल उठा रहे थे? उन दिनों रांची या झारखंड में सरेआम इन घोटालों की चर्चा थी कि कौन क्या कर रहा है? कैसे कुछेक लोग सत्ता के अवैध केंद्र बन गये हैं? कैसे रोज देर रात वे मुख्यमंत्री आवास आते-जाते हैं? खास महंगी गाड़ियों में कैसे उनके इशारे पर कुछेक महत्वपूर्ण विभागों की फाइलों की डीलिंग होती है? यह खुला सच सब जानते थे. फिर कोड़ा जी एवं मित्र मंडली की खबरों को लेकर चुप्पी क्यों रही?
दूसरा खुला सच था, जिसे झारखंड का समाज जान व सुन रहा था. इस प्रकरण से जुड़े लोगों की संपत्ति में गुणात्मक छलांग. कैसे हो रही थी? इनके आयकर रिटर्न देखिए. 1999 में कोड़ाजी पहली बार चुनाव लड़े थे. फिर 2004 और 2009 के चुनावों के आय विवरण देखें.
संपत्ति में किस दर से इजाफा हो रहा था? कोई दूध बेच रहा था, तो कोई खैनी. वहां से अरबों-अरबों का वारा-न्यारा, कुछेक वर्षों में? कैसे संपत्ति बढ़ी इन लोगों की? यह चर्चा का विषय था, क्योंकि इनके पास कोई कल-कारखाना नहीं था, न उद्योग था. न उत्पादन करने का अतीत. बगैर उत्पादन, पूंजी निर्माण (कैपिटल फारमेशन) की फैक्टरी इन्होंने कैसे खड़ी कर दी?
भुरकुंडा में एक असाही ग्लास फैक्टरी थी. जापानी तकनीक से संचालित. बिना विज्ञापन, बिना किसी टेंडर के वह फैक्टरी अचानक विनोद सिन्हा एंड कंपनी के हाथ कैसे आ गयी? इसी तरह खलारी सीमेंट प्लांट का स्वामित्व रातोंरात कैसे बदला? क्यों खलारी सीमेंट से उत्पादित सीमेंट को अचानक झारखंड सरकार ने इस्तेमाल के लिए मस्ट कर दिया? कैसे चाईबासा के तत्कालीन डीसी, विनोद सिन्हा एंड कंपनी की सेवा में लगे रहते थे और जमीन घोटाला कर रहे थे? सरकारी योजनाओं में बंदरबांट कर रहे थे. कैसे चाईबासा में इंजीनियरों के एक समूह ने करोड़ों-करोड़ का अग्रिम वर्षों से ले रखा था? कुल मिलाकर बहुत बड़ी राशि. उसकी जांच मुख्य सचिव के स्तर के अधिकारी ने की.
पर उस जांच पर किसने कार्रवाई नहीं होने दी? कोड़ाजी शुरू से कहते थे कि संजय चौधरी-विनोद सिन्हा से उनका कोई रिश्ता नहीं है. तब कोड़ाजी के मुख्यमंत्री बनते ही कैसे संजय चौधरी एंड विनोद सिन्हा को अचानक भारी सुरक्षा देने का आदेश हुआ? किसकी पहल पर? ये किस तरह महत्वपूर्ण थे कि इन्हें रातोंरात सुरक्षा दी गयी? इन्हीं के साथ, बिना भारत सरकार को जानकारी या सूचना दिये कोड़ाजी विदेश गये.
नियम यह है कि कोई भी मंत्री विदेश जायेगा, तो भारत सरकार की अनुमति लेगा. उन्हें जानकारी देगा.17 चार्टेड प्लेनों से कोड़ा कार्यकाल में लोग उड़े हैं. इनमें कौन-कौन सवार हुए थे? इसी तरह कोड़ा कार्यकाल के 200 हेलिकाप्टर उड़ानों की स्पष्टता नहीं है कि इनमें कौन उड़ा, कहां गया? सूचना है कि इनमें से 100 हेलिकॉप्टर उड़ानों में यात्री सूची या तो ब्लैंक है या अस्पष्ट.
झारखंड बनने के बाद से ही कैसे हेलिकॉप्टरों का दुरूपयोग हुआ, इसकी लगातार खबरें प्रभात खबर में छपीं. फिलहाल एक युवा इस मामले को हाईकोर्ट में ले गया है. अदालत इस मामले में काफी गंभीर है. इन सब चीजों में गहरे राज छिपे हैं. ऐसी असंख्य खबरें हैं, जो कोड़ा कार्यकाल में प्रभात खबर में छपीं. इन खबरों को गिनाना हमारा मकसद नहीं है.
यह सवाल उठाना मकसद है कि क्या ये सवाल हैं या नहीं? खबरें हैं या नहीं? अगर हैं, तो चुप्पी क्यों थी? ये सारी खबरें चोरी छुपे नहीं हो रही थीं. न एक्सक्लूसिव थी. यह सब खुलेआम हो रहा था. डंके की चोट पर हो रहा था. पर इन्हें सवाल के रूप में उठानेवाले या खबरें बनाने वाले कहां थे? मीडिया से सरोकार रखनेवालों को यह सवाल चिंतित नहीं करता.
यह भी सही है कि इन दिनों कोड़ा प्रकरण में अनेक गलत खबरें आयीं हैं. नितांत तथ्यहीन. आधारहीन, बतकही और अफवाह के आधार पर. बड़े-बड़े चैनलों में. अखबारों में. भेंडचाल से. यह हमारे गुलाम मानस का परिचायक है. जब व्यक्ति सत्ता में हो, तो पूजो. सत्ता से बाहर जाये, तो कुछ भी करो. आज भी प्रभात खबर कोड़ा प्रसंग में बिना पुष्टि के खबर छापने से बचता है. और कोड़ा के सारे कार्यक्रमों की, जिसमें प्रभात खबर की आलोचना भी शामिल है, प्रमुखता से छापता है क्योंकि प्रभात खबर का किसी से निजी रागद्वेष है ही नहीं.
कोड़ाजी एवं मित्र मंडली के भ्रष्टाचार के सवाल मीडिया में कम उठे. कांग्रेस ने अधिक उठाया. वह कांग्रेस जिसके समर्थन से कोड़ाजी सरकार में टिके थे. अजय माकन के नेतृत्व में. अजय माकन 24 सितंबर 07 से 19 फरवरी 08 तक झारखंड कांग्रेस के प्रभारी थे. केंद्र में नगर विकास के राज्य मंत्री भी. उनके नेतृत्व में कोड़ा सरकार पर लगाये कुछ प्रमुख आरोपों के शीर्षक पढ़ लें, जो प्रभात खबर में छपें –
1)15 के बाद कभी भी समर्थन वापस (12 जनवरी 2008)
2) कोड़ा सरकार का काम ठीक नहीं, (16 जनवरी 2008)
3) मंत्रियों से नहीं मिले माकन (15 जनवरी 2008)
(अजय माकन उस समय केंद्र में नगर विकास मंत्री थे, वे झारखंड के मंत्रियों से भी नहीं मिलते थे, उनके भ्रष्टाचार के कारण)
4) झारखंड में सिर्फ भ्रष्टाचार बढ़ा (28 जनवरी 2008)- अजय माकन (यह आरोप किसी विपक्षी नेता का नहीं है. केंद्र के तत्कालीन मंत्री और कांग्रेस प्रभारी का है. आज जब झारखंड के एक-एक पूर्व मंत्री जेल जा रहे हैं या पूछताछ के दायरे में आ रहे हैं, तब तत्कालीन कांग्रेस प्रभारी का बयान समझ में आ रहा है)
5) सरकार का प्रमुख घटक दल कांग्रेस प्रभारी अजय माकन ने सिमरिया उपचुनाव में (जनवरी 08 में) सार्वजनिक रूप से कहा ‘ मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मुख्यमंत्री मधु कोड़ा और सरकार के अन्य मंत्री कांग्रेस के पक्ष में चुनाव प्रचार करने सिमरिया नहीं जायें. कांग्रेस को उनकी मदद नहीं चाहिए.’
6) नहीं चाहिए कोड़ा और उनके मंत्री (20 जनवरी 2008)- अजय माकन
7) सरकार को अब ज्यादा वक्त नहीं दे सकती कांग्रेस (19 अक्टूबर 07) – अजय माकन
8) जानते हैं निर्णय नहीं हुआ,तो झारखंड की जनता हमें माफ नहीं करेगी (22 फरवरी 2008)-अजय माकन
नियेल तिर्की कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक थे. वह कोड़ा सरकार के एक मंत्री के भ्रष्टाचार से इतने त्रस्त थे कि अनशन पर बैठे. दिल्ली से कांग्रेस प्रभारी व मंत्री अजय माकन रांची आये. उन्हें जूस पिलाया. वह रो पड़े. कहा, अगर कोड़ा से मुक्ति नहीं मिल रही है, तो कम से कम भ्रष्ट मंत्रियों से तो मुक्ति दिलाइए.
9) 10 दिन और (21 जनवरी 2008)- अजय माकन
ये रिपोर्ट बानगी के तौर पर हैं. अजय माकन के नेतृत्व में कांग्रेस लगातार कोड़ा सरकार के कामकाज पर प्रहार करती रही. कांग्रेस ने अजय माकन , सुबोधकांत, कांग्रेस के सभी सांसदों-विधायकों के नेतृत्व में राजभवन से सीएम आफिस तक पैदल मार्च किया. सरकार की विफलताओं-भ्रष्टाचार के खिलाफ. कांग्रेस ने महज दो महीने का समय सरकार को दिया. कांग्रेस समर्थन वापस करने ही वाली थी कि यूपीए के कई महत्वपूर्ण नेताओं ने कोड़ा को बचा लिया.
जिस सरकार को यूपीए चला रही थी. उसी यूपीए के प्रमुख घटक दल, कांग्रेस लगातार सरकार के भ्रष्टाचार को उजागर कर रही थी. प्रभात खबर की पत्रकारिता से बेचैन लोग यह देखें और जांचे कि कांग्रेस के इन महत्वपूर्ण आरोपों को मीडिया में कितनी जगह मिल रही थी? इन परिस्थितियों में मीडिया का दायित्व था कि वह कांग्रेस के आरोपों की गहराई से छानबीन करे. अगर मीडिया ने यह काम तब किया होता, तो ये घोटाले न जाने कब के सामने आ गये होते.
घोटालों की जानकारी ऊपर तक कैसे पहुं ची?
मधु कोड़ा सरकार बनते ही माइंस आवंटन में अनियमितता और तेज हो गयी. हालांकि यह खेल झारखंड बनने के बाद से ही चल रहा था. पर कोड़ा कार्यकाल में होड़ मच गयी. तब अनेक महत्वपूर्ण लोगों ने, कई गंभीर अनियमितताओं को एकत्र कर भारत सरकार, प्रधानमंत्री कार्यालय और केंद्रीय सतर्कता आयोग को पत्र लिखे. 2007 अंत से ही. उनमें प्रमुख थे, भाजपा विधायक सरयू राय.
श्री राय ने ही 1980 के आसपाल बिहार में बिस्कोमान खाद्य घोटाला को उजागर किया था. तत्कालीन ताकतवर कांग्रेसी नेता तपेश्वर सिंह के साम्राज्य का सच सामने लाया था. इसके बाद पशुपालन घोटाला उजागर करने में भी वह आगे रहे. झारखंड में विधायक के रूप में लगातार वह विधानसभा के अंदर और बाहर इन सवालों को उठाते रहे. वह भी बिहार आंदोलन के सजग और प्रतिभावान लोगों में से हैं. इस तरह केंद्र सरकार और उसकी सभी एजेंसियां इन तथ्यों से वाकिफ थीं. इसलिए यह मानना कि ये छापे या सरकारी कार्रवाई अचानक हुए , गलत है.
झारखंड इतना अशासित और अनियंत्रित राज्य बन गया था कि यहां के मंत्री, केंद्र सरकार के विभागों-उपक्रमों से ही खुलेआम घूस-फेवर मांग रहे थे. यह सूचना दिल्ली में सर्वोच्च पदों पर बैठे लोगों तक पहुं ची. बाद में केंद्र से दो-दो बार कैबिनेट सचिव के नेतृत्व में भारत सरकार के सचिवों की टॉप टीम आयी. रांची. सामान्यतया शायद ही किसी अन्य राज्य में ऐसा हुआ हो. भारत सरकार के बड़े अधिकारियों ने झारखंड का राजकाज नजदीक से देखा. सरकार के कामकाज का एक-एक तथ्य इन सबको मालूम हुआ.
देश चलानेवाले लोगों ने जब अनियमितता और खुलेआम भ्रष्टाचार का यह रूप देखा, तो आयकर से लेकर प्रवर्तन निदेशालय वगैरह की कार्रवाई होनी ही थी. दूसरी ओर हाईकोर्ट में कई लोगों ने मंत्रियों के भ्रष्टाचार के खिलाफ याचिकाएं दायर कर रखी थी. जिस पर लगातार कोर्ट मानिटरिग कर रहा था. आयकर व सरकार से इसकी पड़ताल के बारे में पूछ रहा था.
इस तरह आयकर, निगरानी या प्रवर्तन निदेशालय की यह कार्रवाई हुई. स्वाभाविक रास्ते. आज भी केंद्र सरकार के महकमों यानी आयकर, प्रवर्तन निदेशालय या राज्य सरकार के निगरानी वगैरह में ईमानदार अफसरों की बड़ी जमात है, जिसने हाईकोर्ट के कहने पर जब मामले की जांच की, तो अनेक दूसरे गंभीर तथ्य भी पता चले. इस तरह यह कार्रवाई आगे बढ़ी.
पिछले दिनों इंडियन एक्सप्रेस में (छापे के बाद) एक खबर छपी है. महत्वपूर्ण खबर है. दुनिया के एक बड़े उद्योगपति हैं, भारतीय मूल के. वह झारखंड में बड़ा उद्योग लगाना चाहते थे. दिल्ली में सर्वोच्च राजनीतिक पदों पर बैठे लोगों से उनका सीधे परिचय है. सूचना है कि उस कंपनी के एक प्रमुख अधिकारी तत्कालीन मुख्यमंत्री से मिले. निवेश प्रस्ताव लेकर.
दिल्ली से भी सर्वोच्च पदों पर बैठे लोगों ने शायद संकेत दिया था कि प्रोजेक्ट अनुकूल लगे, तो काम आगे ब़ढ़ाया जाये. पर राज्य के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति ने उस कंपनी के लोगों से कहा ‘फलां व्यक्ति’ से मिल लें. उस फलां व्यक्ति ने उस बड़ी कंपनी के सीइओ से कहा, दो सौ करोड़ रूपये हमें सीधे दें. फिर सब काम हो जायेगा. वह व्यक्ति हतप्रभ. यह बात ऊपर तक पहुं ची. यह था झारखंड का माहौल!
प्रभात खबर पर कोड़ाजी एंड कंपनी का यह आरोप कि उषा मार्टिन कंपनी का कोई काम कोड़ा सरकार के पास पेंडिंग था. वह काम कोड़ाजी ने रिजेक्ट कर दिया, इसलिए प्रभात खबर ने मामला उछाला? मामला कैसे उछला, यह तो आपने पढ़ा. पर पुन: प्रभात खबर और उक्त कंपनी का रिश्ता जान लीजिए.
उस कंपनी और प्रभात खबर के बीच कोई फंक्शनल रिश्ता नहीं है.न सीधा रिश्ता, रिश्ता है कि उषा मार्टिन के प्रमोटरों का प्रभात खबर पर स्वामित्व है. पर शुरू से ही प्रभात खबर स्वायत्त संस्था की तरह चल रहा है, लेकिन इस पर चर्चा बाद में.
पहले उस कंपनी के उस काम की चर्चा, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि उसके रिजेक्ट होने पर प्रभात खबर ने धारावाहिक रपटें छापीं. झारखंड सरकार के निगरानी छापे के बाद कोड़ाजी का भड़ास प्रभात खबर पर निकला. तब प्रभात खबर ने उस कंपनी से पूरा मामला पता किया कि कौन से काम थे और क्या पेंडिंग थे? जो सूचना मिली वह जानिए.
जिस काम के बारे में कहा जा रहा है कि वह काम रिजेक्ट होने पर अभियान चला. यह सरासर झूठ है. हां, उक्त कंपनी समूह का एक प्रस्ताव संयुक्त कंपनी बनाने का था, गद्दी छोड़ने के एक माह पहले, यानी 01.07.2008 को कोड़ाजी ने उस पर रिजेक्सन नोट लिखा. याद करिए प्रभात खबर में विनोद सिन्हा, कोड़ा एंड कंपनी के बारे में कब-कब खबरें छपीं है?
जब निर्दलियों की सरकार बन रही थी, तो प्रभात खबर ने छह किश्तों में बताया कि भविष्य के आगाज क्या हैं? क्योंकि इन मंत्रियों के एक-एक कामकाज से यहां लोग वाकिफ थे. कोड़ा कार्यकाल की जिन प्रमुख गड़बि़ड़यों का उल्लेख ऊपर किया गया है, वे लगातार प्रभात खबर में छपीं. फिर विनोद सिन्हा के बढ़ते साम्राज्य पर कोड़ाजी के मुख्यमंत्री बनने के बाद छह रिपोर्ट छपीं. एक-एक बारीक जानकारी के साथ. उन रपटों में कहीं कोड़ाजी का जिक्र नहीं था.
पर बेचैनी कोड़ाजी को हो गयी, क्योंकि उस आग की लपटें कोड़ाजी तक पहुं च रही थी. फिर प्रभात खबर में विनोद सिन्हा वगैरह के विदेशी धन, कारोबार और व्यापार के विवरण सितंबर 2008 से छपने शुरू हुए , जब मुंबई एयरपोर्ट पर संजय चौधरी को डिटेन किये गये.
संजय चौधरी मुंबई में कस्टम द्वारा डिटेन किये जाने की खबर को उस दिन देश के सभी चैनलों ने उछाला. कोड़ाजी से नाम जोड़कर. तब शुरूआती दिनों में ई-टीवी ने अधिसंख्य दस्तावेज दिखाये. विदेशी कारोबार के. फिर ये दस्तावेज पहले एक अन्य समाचार पत्र में छपा. ये सारी चीजें रिकार्ड पर हैं. इसके बाद प्रभात खबर ने पहल कर दस्तावेज जुटाया और लगातार छापा. मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए . बेहतर तरीके से छापा.
वे दस्तावेज अकाट्य हैं. अब वे लोग बतायें, जो यह प्रचारित कर रहे हैं कि मुख्यमंत्री ने कंपनी का एक प्रस्ताव रद्द किया, उसके बाद प्रभात खबर ने कोड़ाजी के खिलाफ रिपोर्टें शुरू की. प्रभात खबर में विनोद सिन्हा से जुड़ी पहली रपट तीन वर्षों से भी पहले छपी थी.
अब इस तरह के आरोप लगानेवाले कोई नया तर्क ढ़ूंढ़ लेंगे, क्योंकि उनका मकसद तथ्यों के संदर्भ में बात करना नहीं है. तथ्यों को देखते हुए स्पष्ट है कि कंपनी के काम से प्रभात खबर की भूमिका जुड़ी होती, तो प्रभात खबर ये चीजें छापता या रोकता? कोई भी कंपनी जिसका कहीं काम होगा, वह तो यही चाहेगी कि जिसके पास काम पेंडिंग है, उसके खिलाफ कुछ न हो.
पर प्रभात खबर कोड़ा सरकार के जन्म के समय से ही, कोड़ा सरकार के बारे में रोज ही लिख और छाप रहा था. विनोद सिन्हा के बारे में सबसे पहले प्रभात खबर ने 2006 में छापा, जब वह (चाईबासा) जिला स्तर के उभरते आपरेटर थे और राज्य की राजधानी रांची के सत्ता गलियारे में उनकी धमक सुनायी दे रही थी.
प्रभात खबर के संचालकों के संबंध में पुन: एक बार सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट करना चाहेंगे कि उनका अखबार चलाने का जो कमिटमेंट है, ‘नान इंटरफरेंस’ (अहस्तक्षेप), उस पर वे शुरू से टिके रहे हैं. इसलिए प्रभात खबर अपने बुनियादी वसूलों पर चल रहा है. यह सिर्फ कोड़ाजी के कार्यकाल में नहीं है. बहुत पीछे लौटे बगैर झारखंड बनने के बाद से ही कुछ और चीजों को जान लें, तो प्रभात खबर के कामकाज का तरीका पुन: साफ हो जायेगा.
बाबूलाल मरांडी राज्य के मुख्यमंत्री बने. भ्रष्टाचार की बुनियाद उनके कार्यकाल में पड़ी. अनेक मंत्री बेलगाम थे. वे लालूजी की फिलासफी पर अमल करते थे कि राजा के शब्द ही कानून हैं. खुद लालूजी व्यवहार में इस सिद्धांत पर बहुत नहीं चले. पर झारखंड के मंत्रियों का अघोषित सिद्धांत यही था.
किसी मंत्री ने पुरी में रिसार्ट खरीदा, तो कोई नक्सली पृष्ठभूमि से आकर अथाह संपत्ति जमा करने की होड़ में लग गया. खुद बाबूलाल जी के ईद-गिर्द अनेक ऐसे पात्र जमा हो गये, जो भ्रष्टाचार के पर्याय थे. प्रभात खबर ने इन सबके खिलाफ छापा. खुद मुख्यमंत्री बाबूलाल के खिलाफ अनेक चीजें उठायीं. कुछेक मुद्दे याद हैं, जिन्हें प्रभात खबर ने उठाया. विधानसभा से लेकर सड़कों तक इन मुद्दों पर चर्चा हुई .
– 25 करोड़ गरीबों पर सालाना 35000 करोड़ खर्च, नतीजा सिफर – (24 नवंबर 01)
– कोदाईबांक बांध निर्माण में घपले की जानकारी सरकार को पहले से थी, फिर भी केसरी और दो करोड़ दिलाने पर अड़े थे ( 7 जुलाई 2002)
– इच्छानुसार काम नहीं होने से नाराज हैं कुछ मंत्री – (7 मार्च 2001)
– केंद्र ने झारखंड का दो सौ करोड़ रोका – (2 जुलाई 2002)
– कानून तोड़ते हैं मंत्री, आलोचना करते हैं अफसरों की – (12 नवंबर 2001)
– भ्रष्टाचार के कारण रात को नींद नहीं आती – मरांडी, (13 नवंबर 2001)
– कभी भी इस्तीफा दे सकते हैं झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री – (8 अगस्त 01)
– मंत्रियों का जवाब और व्यवहार शर्मनाक – (7 मार्च 02)
– झारखंड में अराजक स्थिति – हाईकोर्ट, (10 जुलाई 01)
– भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी है झारखंड की सरकार – (14 जून 2001)
– झारखंड में बतौर कमीशन 336 करोड़ की वसूली – (2002)
– 10 करोड़ के खर्च में ढ़ाई करोड़ कमीशन – (24 दिसंबर 2002)
– नगर विकास मंत्री बच्चा सिंह को गिरफ्तार करने का आदेश – (27 मार्च 2002)
ये महज बानगी हैं, ऐसी खबरें लगातार छपती रहीं. झारखंड जन्म के साथ ही.
ऐसी खबरों को छापने का परिणाम बाबूलालजी के कार्यकाल में प्रभात खबर के विज्ञापन बंद किये गये, सरकार की ओर से. ये भी आन रिकार्ड है. प्रभात खबर ने लिखकर विरोध दर्ज कराया. (पत्र, संल: 34)
फिर अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बने. उनके कार्यकाल में भी भूख से लेकर भ्रष्टाचार के जो सवाल प्रभात खबर में उठे, उनसे सरकार मुश्किल में पड़ी. खासतौर से स्मरण करना चाहेंगे, सीपीआइ-एमएल के विधायक महेंद्र सिंह को. विधानसभा में और विधानसभा के बाहर अकेले उनकी कारगर भूमिका यादगार है.
बाबूलाल मरांडी ने भी अपने कार्यकाल में कई अफसरों को निर्देश दे रखा था कि वे महेंद्र सिंह तक सूचनाएं न पहुं चने दें या जो महेंद्र सिंह से मिलते थे, उनसे वे खफा हो जाते थे. डर से कोई अफसर उनसे मिलता नहीं था. पर वह लगातार प्रभात खबर में लिख कर मुद्दों को उठाते थे और विधानसभा में भी.
क्या पत्रकारिता की चिंता करनेवाले लोगों ने तब देखा कि महेंद्र सिंह के उठाये मुद्दे या सवाल कहां छपते थे? फिर झारखंड में पहला चुनाव हुआ. 2004 के आरंभ में. जिन मंत्रियों – विधायकों के खिलाफ गंभीर आरोप सामने आये थे, प्रभात खबर ने फिर इन्हें चुनाव मुद्दा बनाया. तब लगभग सभी ऐसे मंत्री चुनाव भी हारे.
फिर चुनाव बाद 2004 में शिबू सोरेन के नेतृत्व में तत्कालीन गवर्नर ने सरकार बनवा दी. पर बहुमत उनके साथ नहीं था. प्रभात खबर ने अकेले यह मुद्दा उठाया. अंतत: वह सरकार नहीं टिक सकी. विधानसभा में गिर गयी. दूसरी सरकार बनी. अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में. पर मुंडा का दूसरा कार्यकाल और फिसलन भरा रहा.
खुद उन पर आरोप लगे. अपनी पत्नी के नाम एक एजेंसी लेने का. बाबूलाल जब मुख्यमंत्री थे. तब उनके निजी संबंधों को लेकर खबरें आयीं. वे खबरें प्रभात खबर में ही छपीं. और अर्जुन मुंडा कार्यकाल की गलत चीजें भी प्रभात खबर की सुर्खियां बनीं.
– योजना खर्च के दावे व कोषागार के ब्योरे में 200 करोड़ का अंतर – 6 अप्रैल 05
– गांव में बिजली के नाम पर ठेकेदार आपस में 67 करोड़ बांटेंगे – 31 अगस्त 04
– मंत्री नहीं बना सके, तो संसदीय सचिव बना दिया, संवैधानिक नियमावली के विरुद्ध है यह फैसला, (लोकनाथ महतो, नीलकंठ सिंह मुंडा, अशोक भगत व उपेंद्र दास.) – 30 जुलाई 05
– सूखा पीड़ितों को अनाज का एक दाना नहीं मिला – 06 मार्च 06
– 14 वीआइपी की सुरक्षा में 650 जवान, एक लाख लोगों की सुरक्षा सौ जवानों पर, आम लोगों की सुरक्षा होमगार्ड के हवाले, नेताओं की सुरक्षा में एसटीएफ – 11 मई 05
– 41 करोड़ के चावल के आपूर्ति आदेश में हेराफेरी – 11 मई 05
– चार साल में पांच हजार कुआं नहीं बनवा सकी सरकार, 2001 की सूखा राहत योजना का हाल – 28 मई 05
– झारखंड का दूसरा सरप्लस बजट भी घाटेवाला था – 22 नवंबर 04
– झारखंड देश का सातवां सबसे भ्रष्ट राज्य, ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट का खुलासा, झारखंड के 24 लाख परिवार हर साल देते हैं घूस- 29 सितंबर 05
– खुलने थे 74, खुले सिर्फ तीन स्कूल, केंद्र ने चेताया – 29 सितंबर 05
– चार माह में 483 करोड़ कमाने की योजना बनी, ऊर्जा के क्षेत्र में काम के नाम पर कमाई की योजना – 30 अगस्त 04
– एचबी लाल न 73 के, न 78 के, 79 साल के हैं – 30 अगस्त 04
– ‘लूटने’ के लिए नामी कंपनियों ने गंठबंधन किया, गंठबंधन का परिणाम – 30 अगस्त 04
कंपनी पूर्व दर वर्तमान दर
एटलस 1620 रुपये 1995 रुपये
सफारी 1590 रुपये 1995 रुपये
हीरो 1547 रुपये 1995 रुपये
एवन 1614 रुपये 1995 रुपये
– कानून के दो रूप : लालबत्ती हर कानून से मुक्त, झारखंड हाइकोर्ट के निर्देश पर रांची पुलिस ने अच्छा अभियान चलाया है.
आम लोगों के वाहनों की जांच की जा रही है. वाहनों को जब्त भी किया जा रहा है. इस अभियान से रांची में ट्रैफिक नियंत्रित है. पर लालबत्तीवाली गाड़ियों के लिए कोई कानून नहीं है. इन्हें कोई पूछता भी नहीं. 28 अगस्त को दिन के 12.30 बजे से पांच बजे के बीच मेन रोड पर हमारे छायाकार माणिक बोस ने जहां-तहां नो पार्किंग में खड़ी गाड़ियों की तसवीरें लीं. – 29 अगस्त 04
अधिकारी दायित्व नहीं निभा रहे हैं : राज्यपाल (वेद मारवाह) – 31 दिसंबर 03
– एक साल में 26728 करोड़ खा गये भ्रष्टाचारी, रिकवरी सिर्फ 0.13 फीसदी – 12 जून 05
– राशि खर्च नहीं करने पर झारखंड को फटकार – 31 मई 03
– ज्योति कंस्ट्रकशन को ठेका देने में बड़ा घोटाला – 28 जनवरी 04
– सड़क निर्माण में चल रहा है 27 फीसदी कमीशन – 4 जुलाई 05
– झगड़े की जड़ में 350 करोड़ रूपये का खेल – 28 जून 04
– विधानसभा में हो रहा दो नंबर का काम, स्पीकर ने रोका – 19 अक्टूबर 05
– झारखंड में अपराधिक जांच मशीनरी फेल – 11 दिसंबर 03
– जिम्मेवारी नहीं निभा रही है झारखंड सरकार – 14 अप्रैल 05
– चार हजार पद नहीं भरे – 18 दिसंबर 03
– बिना टेंडर के ठेका देकर तीन करोड़ का लाभ पहुं चाया – 11 नवंबर 2003
– 331 करोड़ के टेंडर में 16.25 करोड़ कमीशन की तैयारी? – 14 जुलाई 2003
– 32 करोड़ के दवा घोटाले में प्राथमिकी दर्ज – 22 जून 03
– राशि की गड़बड़ी, एजी ने आपत्ति की – 8 नवंबर 03
– डीएसपी निलंबित, सीएम के ही आप्त सचिव पर आरोप लगे – 28 अप्रैल 03
– 400 करोड़ का भूमि घोटाला, अफसरों पर मुकदमा नहीं चलेगा – 28 जुलाई 03
– भ्रष्टाचार बना सबसे बड़ा उद्योग – 15 नवंबर 03
– भ्रष्टाचार में कैद भविष्य – 15 नवंबर 04 (कुल 14 पेजों का सप्लीमेंट)
– झारखंड में बतौर कमीशन 336 करोड़ की वसूली – 23 दिसंबर 03
– झारखंड राज्य विद्युत बोर्ड के पुनर्गठन के मामले में हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा, दागी अफसरों को कैसे सदस्य बनाया गया – 19 जुलाई 03
– ग्रामीण विद्युतीकरण के ठेके में कमीशन दर पांच नहीं, छह फीसदी – 27 जुलाई 03
– मुख्यमंत्री के गांव में बना डैम बह गया – जुलाई 03
– झारखंड के मंत्रियों का एक बंगला बने न्यारा – अगस्त 03
– दागदार हैं पर झारखंड में महत्वपूर्ण पदों पर हैं – अगस्त 03
– विधायकों को जमीन, कानून बदलने की तैयारी, अपनी गलती से 48 करोड़ की चपत – 6 अक्टूबर 03
अर्जुन मुंडा के दूसरे कार्यकाल में ही निर्दलीय मंत्रियों का असली रूप सामने आया. वह स्तब्ध करनेवाला था. उनके कारनामें, व्यवहार, कहीं किसी को डरा देना-धमका देना. खुलेआम मीडिया से कहना, यस, आइ एम करप्ट, सो वाटस् द बिग डील (हिंदुस्तान टाइम्स, दिनांक : 10 जुलाई 2008, संल: 35). यह झारखंड की स्थिति थी. प्रभात खबर में सिर्फ मंत्रियों के गलत कामों की खबरें ही नहीं छप रही थी. वर्ष 2002 में पलामू में भूख का सवाल प्रभात खबर ने उठाया. सरकार के तत्कालीन कैबिनेट सचिव ने लिखित रूप से चेताया. (नरेंद्र भगत का पत्र-संल). इस सवाल को वर्षों प्रभात खबर उठाता रहा, जब अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बन गये, तब भी.
इस अभियान के कारण ही सुप्रीम कोर्ट ने भूख के सवाल पर एक जांच कमेटी बनायी. एनसी सक्सेना के नेतृत्व में. उस कमेटी के दौरे और भूख की अन्य खबरों को उठाने से अर्जुन मुंडा सरकार नाराज हुई . मंत्री अपने कारनामें छपने से नाराज थे ही. इस तरह अर्जुन मुंडा कार्यकाल में फिर प्रभात खबर का विज्ञापन बंद हुआ (पत्र संल : 36). इस मुद्दे को भी प्रभात खबर ने उठाया.
इससे पहले भी जाकर देख सकते हैं, 1990 से प्रभात खबर नये स्वरूप में निकलना शुरू हुआ. उसने कैसे और किन मुद्दों को उठाया? पुराने अखबारों को पलट कर यह भी देखा जा सकता है.
यह बताने का अर्थ एक ही है, प्रभात खबर की पत्रकारिता मुद्दों से जुड़ी है, व्यक्ति से नहीं. जो भी व्यक्ति सत्ता में आता है, उससे जो संवैधानिक-राजनीतिक अपेक्षाएं हैं, अगर वह सही काम नहीं करता, तो प्रभात खबर उन मुद्दों को उठाता है.
इसी तरह विनोद सिन्हा सामने आये. जब वह झारखंड स्तर के खिलाड़ी बन रहे थे, तब प्रभात खबर ने छापा. उन दिनों कोड़ा जी राज्य में मंत्री थे. बाद में कोड़ाजी मुख्यमंत्री हुए , तो विनोद सिन्हा राष्ट्रीय खिलाड़ी हो गये. वह भी प्रभात खबर ने उठाया. विनोद सिन्हा पर छपी रपटें गलत होतीं, तब कोई सवाल कर सकता था कि प्रभात खबर उन्हें बेवजह घसीट रहा है. पर विनोद सिन्हा पर छापने पर मधु कोड़ा पर क्या आंच आ रही थी?
जिस दिन संजय चौधरी मुंबई एयरपोर्ट पर पकड़े गये (सितंबर 08), उस दिन पता चला कि संजय चौधरी और विनोद सिन्हा अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बन चुके हैं. उसी दिन से मधु कोड़ा के नाम की चर्चा ने जोर पकड़ा. फिर पूरा प्रकरण सामने आया.
झारखंड विजिलेंस ने जब कोड़ा जी वगैरह के यहां छापे डाले (जुलाई 09), तो कोड़ाजी प्रभात खबर पर नाराज हुए . उनके द्वारा लगाये गये पूरे आरोपों को प्रभात खबर ने छापा. उनके घर से बरामद चीजों की जो सूची थी, वह प्रभात खबर में छपी थी. कमोबेश हर अखबार में वही चीजें थीं. पर नाराज वह सिर्फ प्रभात खबर से हुए . इसका कारण है कि उनके कार्यकाल की सभी गलत चीजें प्रभात खबर में छपीं थीं, जिन्हें लेकर अदालतों में कई याचिकाएं दायर हुई थीं. प्रभात खबर से उनकी नाराजगी के पीछे यह मूल बात है.
उस दौरान कोड़ाजी ने घोषणा की, मुझे साजिश कर फंसाया जा रहा है. फिर लगभग महीने-डेढ़ महीने बाद तथ्यों के आधार पर भारत सरकार के प्रवर्तन निदेशालय ने उनके खिलाफ मामला दर्ज किया (9 अक्टूबर 09 को प्रिवेनसन आफ मनी लांडरिग एक्ट के तहत), तो उन्होंने दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस कर कहा, अखबारी कतरनों के आधार पर मेरे खिलाफ मामला दर्ज हुआ है (10 अक्टूबर 09). इसके लगभग एक माह बाद आयकर और इडी के देशव्यापी छापे पड़े, तो अनेक तथ्य सामने आये (31 अक्टूबर 09). अगर ये सभी छापे गलत थे, उन्हें फंसाने के लिए थे और कोड़ाजी और उनकी टीम निर्दोष थी, तो गांव स्तर के दूध और खैनी बेचने वाले, कैसे अरबपति हो गये? विदेश के प्रवासी हो गये, महज दो-चार वर्षों में? क्या जादू या चमत्कार से धन पैदा होता है?
एक और जानकारी, उन लोगों के लिए जो प्रभात खबर और उषा मार्टिन के रिश्तों के बारे में जानने को इच्छुक हैं. प्रभात खबर, एक बीमार और बंद प्राय अखबार था. 1990 के अंतिम दौर में. इसे एक नयी कंपनी ने खरीदा. न्यूट्रल पब्लिशिंग हाउस ने. इसके संघर्ष का लंबा ब्योरा है. पर संक्षेप में जान लीजिए. झारखंड में देश के दो बड़े अखबार घराने आये.
लगभग 10 वर्षों पहले. बड़ी पूंजी वाले. देश के सबसे बड़े अखबार घराने. प्रभात खबर अपने बल चल रहा था या रेंग रहा था. उसमें कहीं से कोई बाहरी पूंजी नहीं लगी. प्रभात खबर ने अपने प्रबंधन से यह प्रस्ताव रखा कि कठिन स्पर्धा और चुनौती है. भविष्य की रणनीति-रास्ता तय करना चाहिए. फिर अनेक जानेमाने कंसलटेंटस् के परामर्श के बाद पता चला कि इसके फैलाव (एक्सपैनशन) की जरूरत है. यह वर्ष 2006 के अंत की बात है.
प्रबंधन का कहना था, यह हमारा कोर बिजनेस नहीं है, इसलिए हम इसका फैलाव नहीं चाहते. जो जेनुइन सवाल था. तब प्रभात खबर के बिकने की बात तय हो गयी थी. पर प्रभात खबर के पत्रकारों ने प्रबंधन से अनुरोध किया, हम कोशिश कर इसे चलाना चाहते हैं, प्रबंधन सहमत हुआ और इस तरह प्रभात खबर अपने द्वारा तय आचारसंहिता से चलता है. स्वायत्त ढंग से. क्योंकि किसी बाहरी हस्तक्षेप पर यह पत्रकारिता हो ही नहीं सकती, जो प्रभात खबर कर रहा है.
(मिंट-02.02.07, संल : 37)
15 नवंबर 2000 को झारखंड बना. तब से अब तक प्रभात खबर कैसे वाचडाग की भूमिका में रहा, पहरेदार का काम करता रहा, यह रहा इसका संक्षिप्त ब्योरा-विवरण. बाबूलाल मरांडी पहले मुख्यमंत्री थे. फिर अर्जुन मुंडा, मधु कोड़ा और फिर शिबू सोरेन. इनके राजकाज और कार्यकाल की अप्रिय चीजें छपीं. इनके जीवन से जुड़े वे विवरण भी छपे, जिनका सामाजिक सरोकार था. राष्ट्रपति शासन के दौरान एक राज्यपाल पर लगे आरोप भी प्रभात खबर में ही छपे.
इसी क्षेत्र में जब यह बिहार का हिस्सा था, पशुपालन घोटाला हुआ. वह भी प्रभात खबर में उजागर हुआ. ऐसा भी नहीं था कि ये सारे मामले कोई लुक-छिप कर हो रहे थे. सभी जानते थे. पशुपालन घोटाले में भी पत्रकार किसलय सारे तथ्यों को ढ़ूंढ़ लाये थे. यह अलग बात है कि किसलय जैसे पत्रकार अब दुर्लभ होते जा रहे हैं.
प्रभात खबर ने ऐसे लोगों को क्यों प्रमुखता दी? लगातार उठाये और दशकों से उठाता रहा. लगातार नुकसान झेल कर. क्योंकि प्रभात खबर पत्रकारिता के क्षेत्र में एक अलग प्रयोग कर रहा था. जब पत्रकारिता की मुख्यधारा, पेज थ्री की फिलासफी से चल रही थी यानी मनोरंजन, सूचना, फैशन और सनसनीखेज व बाजार की बातें, तब इसके समानांतर क्या सामाजिक सवालों पर पत्रकारिता का कोई स्कोप बचा था? प्रभात खबर ने अपने नये स्वरूप में ‘ 91 के बाद यही धरातल तलाशा. तब लोग प्रभात खबर को चलने का दो माह का भी समय नहीं देते थे.
आज 20 वर्ष हो गये. सामाजिक सवालों पर पत्रकारिता ने जगह बनायी. सबसे बड़ी पूंजी वाले दो-दो घरानों के आने के बाद भी प्रभात खबर के पाठकों की संख्या लगातार बढ़ रही है. इसका अर्थ साफ है- समाज के मूल सवालों से कट कर कोई पत्रकारिता नहीं चल सकती. मधु कोड़ा का सवाल भी समाज और व्यवस्था के ज्वलंत सवालों में से एक है.
यह सही है कि प्रभात खबर की पत्रकारिता का यही पक्ष चर्चा में है. पत्रकारिता में अनेक नये प्रयोग प्रभात खबर ने किये हैं. गांव-गांव, डगर-डगर जाकर पत्रकारिता के फोकस को बदलने के लिए. खबर का केंद्र नेता और बड़े लोग न बनें, कामन मैन, स्कूल के बच्चे और आम लोग, जो जीवन संघर्ष के केंद्र में हैं, वे खबरों की धुरी बनें, यह कोशिश की. दुनिया में जो कुछ सकारात्मक हो रहा है, बड़े परिवर्तन हो रहे हैं, उस पर भी प्रभात खबर ने बड़ा काम किया. उसका यह पक्ष और यह पहलू शायद सबसे अधिक है. प्रभात खबर ने जब नये स्वरूप में पत्रकारिता शुरू की, तो इन्हीं मूल विषयों को फोकस किया.
लगा गवर्नेस, कुशासन, भ्रष्टाचार वगैरह के सवाल महत्वपूर्ण हैं. इस पर भी उसने लगातार काम किया. इस तरह इन सभी मुद्दों पर प्रभात खबर सवाल उठाता रहा, क्योंकि प्रभात खबर को पत्रकारिता में एक नये धरातल की तलाश थी, धरातल पेज थ्री के पत्रकारिता के दर्शन के विकल्प में. 20 वर्षों का यह प्रयोग सामने है. सार्थक है या असार्थक, यह तो पाठकों का संसार तय करेगा.
प्रभात खबर, अब्राहम लिंकन के इस कथन पर यकीन करता है कि जीवन के अंत में, यह प्रासंगिक नहीं होता कि आपका जीवन कितना लंबा रहा, या कितने वर्ष आप जीये. महत्वपूर्ण है कि जीवन कैसे जीया?
Prabhat Khabar Digital Desk
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यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

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