डेनमार्क, ग्रीनलैंड और अमेरिका के प्रतिनिधियों के बीच हुई बातचीत में ग्रीनलैंड के भविष्य को लेकर बुनियादी असहमति सामने आई है. गुरुवार को व्हाइट हाउस ने डेनमार्क-ग्रीनलैंड के अधिकारियों के साथ होने वाली आगे की बातचीत को अधिग्रहण समझौते पर तकनीकी चर्चा करार दिया. यानी अमेरिका ग्रीनलैंड को हासिल करने की अपनी जिद पर अड़ा हुआ है. इस बात पर में डेनमार्क के समर्थन में कई यूरोपीय देशों के सैनिक आर्कटिक द्वीप ग्रीनलैंड पहुंचने लगे हैं. यह पूरा घटनाक्रम डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोके रासमुसेन के बयान से अलग है. उन्होंने इसे देशों के बीच मतभेद सुलझाने के तरीकों पर विचार करने वाला एक कार्य समूह बताया था.
बुधवार को वार्ता शुरू होने से पहले ही डेनमार्क ने ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की घोषणा कर दी थी. इसके बाद फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, नॉर्वे, स्वीडन और नीदरलैंड जैसे कई यूरोपीय साझेदार देशों ने प्रतीकात्मक रूप से सैनिक भेजना शुरू किया या निकट भविष्य में ऐसा करने का भरोसा दिलाया. डेनमार्क के विदेश मंत्री रासमुसेन ने ग्रीनलैंड की विदेश मंत्री विवियन मोट्सफेल्ट की मौजूदगी में कहा था कि अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे. डी. वेंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ व्हाइट हाउस में हुई बैठक के बावजूद ग्रीनलैंड को लेकर मौलिक असहमति (फंडामेंटल डिसएग्रीमेंट) बनी हुई है.
रासमुसेन ने प्रेस कांफ्रेंस में बताया था कि एक उच्चस्तरीय कार्य समूह बनाने पर सहमति हुई है, ताकि यह देखा जा सके कि आगे बढ़ने के लिए कोई साझा रास्ता निकल सकता है या नहीं. उन्होंने कहा था कि इस कार्य समूह की पहली बैठक कुछ ही हफ्तों में होगी. इसी बीच फ्रांस और जर्मनी ने भी ग्रीनलैंड में अपने सैनिक तैनात करने की घोषणा कर दी है. डेनमार्क के प्रसारक डीआर के मुताबिक, डेनमार्क के रक्षा मंत्री ट्रोएल्स लुंड पाउल्सेन ने कहा है कि कई नाटो देशों के सैनिक बारी-बारी से ग्रीनलैंड में तैनात रहेंगे.
कौन-कौन से देशों की सेना ग्रीनलैंड पहुंची?
बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, ग्रीनलैंड की राजधानी नूक में एक छोटे फ्रांसीसी सैन्य दस्ते की तैनाती की गई है. कई यूरोपीय देशों ने भी एक सीमित संख्या में सैनिकों को खुफिया और निगरानी मिशन के रूप में भेजा है. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि प्रारंभिक दस्ते को जल्द ही थल, वायु और समुद्री बलों के साथ मजबूत किया जाएगा. वरिष्ठ कूटनीतिज्ञ ओलिवियर पोइव्रे डी’आर्वोर ने इसे एक राजनीतिक संदेश के रूप में देख रहे हैं. उन्होंने कहा कि यह पहला अभ्यास है… हम अमेरिका को दिखाएंगे कि नाटो यहाँ मौजूद है. प्रारंभिक फ्रांसीसी तैनाती में 15 लोग शामिल हैं.
जर्मनी के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, डेनमार्क के निमंत्रण पर गुरुवार से ग्रीनलैंड की राजधानी नूक में 13 सदस्यों की बुंडेसवेहर (जर्मन सेना) की रिकॉन्सेनसेंस टीम तैनात की जाएगी. जर्मनी एक A400M परिवहन विमान के साथ इन सैनिकों को नूक भेज रहा है. फिनलैंड दो सैन्य लियाजों को भेज रहा है. स्वीडन, नॉर्वे, ब्रिटेन और नीदरलैंड के भी कुछ सैनिक तैनात किए गए हैं. डेनमार्क ने घोषणा की कि ग्रीनलैंड में सैन्य उपस्थिति बढ़ाई जाएगी ताकि नाटो का आर्कटिक में प्रभाव मजबूत हो और यूरोपीय और ट्रांस-अटलांटिक सुरक्षा सुनिश्चित हो. वहीं, पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड तुस्क ने कहा कि उनका देश तैनाती में शामिल नहीं होगा, लेकिन चेतावनी दी कि किसी भी अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप से “राजनीतिक संकट” पैदा होगा.
यूरोपीय देशों की एकजुटता ट्रंप को संदेश
हालांकि, यूरोपीय नाटो तैनाती में केवल कुछ दर्जन ही लोग शामिल हैं. यह डेनमार्क के नेतृत्व में चल रहे संयुक्त अभ्यास ‘ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस’ का हिस्सा है. यूरोपीय देशों की यह तैनाती एकजुटता का संदेश देने और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह दिखाने के लिए है कि ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जा आवश्यक नहीं है, क्योंकि नाटो मिलकर उस रणनीतिक आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा कर सकता है. वहीं, रूस के बेल्जियम स्थित दूतावास ने आर्कटिक में बढ़ती नाटो सैन्य उपस्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की. उसने आरोप लगाया कि यह मास्को और बीजिंग से बढ़ते खतरे के झूठे बहाने के तहत हो रहा है.
अमेरिका का हिस्सा नहीं बनना चाहता ग्रीनलैंड
ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नीलसन ने कहा कि ग्रीनलैंड अमेरिकी नियंत्रण में नहीं जाना चाहता और अगर जनता से पूछा गया तो वे डेनमार्क का विकल्प चुनेंगे. उन्होंने स्पष्ट कहा, “ग्रीनलैंड अमेरिका का हिस्सा नहीं बनना चाहता और न ही अमेरिका द्वारा शासित होना चाहता है.” यूरोपीय सैनिकों की तैनाती उस समय हो रही है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आर्कटिक द्वीप पर अपने अधिकार की मांग को लगातार बढ़ा रहे हैं, जो डेनमार्क का अर्ध-स्वायत्त हिस्सा है.
अमेरिका को नहीं पड़ रहा कोई फर्क
वहीं इस यूरोपीय एकजुटता से अमेरिका को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है. डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को अमेरिकी नियंत्रण में लाने की अपनी मांग पर जोर दिया. उन्होंने पत्रकारों से कहा कि हमें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड चाहिए. उन्होंने बल प्रयोग को पूरी तरह खारिज नहीं किया और कहा कि वे डेनमार्क के साथ किसी न किसी समझौते की संभावना तलाश सकते हैं.
ट्रंप ने कहा कि समस्या यह है कि अगर रूस या चीन ग्रीनलैंड पर कब्जा करना चाहे तो डेनमार्क के पास कुछ नहीं है, लेकिन हमारे पास सब कुछ है. आप सभी यह पिछले हफ्ते वेनेजुएला में देख चुके हैं. वहीं व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने गुरुवार को पत्रकारों से कहा कि यूरोपीय सैनिकों की तैनाती राष्ट्रपति के निर्णय या ग्रीनलैंड अधिग्रहण के लक्ष्य पर कोई असर नहीं डालेगी. उन्होंने स्पष्ट किया कि इससे राष्ट्रपति के ग्रीनलैंड अधिग्रहण के उद्देश्य पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
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