सज्जाद हसनैन की कहानी : गोरेयाकोठी में घर पर ही पढ़ाई की, बापू से प्रभावित होकर आंदोलन किया, जहर देकर मारा गया

Updated:
विज्ञापन

सैयद सज्जाद हसनैन | Prabhat Khabar Network

गोरेयाकोठी के मुस्तफाबाद गांव के स्वतंत्रता सेनानी सैयद सज्जाद हसनैन ने महात्मा गांधी के आंदोलनों में अहम भूमिका निभाई. नमक सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के बाद उन्हें जेल में जहर देकर मार दिया गया.

विज्ञापन

Sajjad Hasnain Goraiyakothi : आजादी की लड़ाई केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं थी. देश के गांव-गांव से भी ऐसे वीर सपूत निकले, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद की और राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया. गोरेयाकोठी प्रखंड के मुस्तफाबाद गांव के स्वतंत्रता सेनानी सैयद सज्जाद हसनैन भी ऐसे ही सेनानियों में शामिल थे. परिवार के अनुसार उन्होंने महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी.

घर पर ही की पढ़ाई

28 सितंबर 1891 को मुस्तफाबाद में जन्मे सैयद सज्जाद हसनैन के पिता सैयद मोहम्मद जान क्षेत्र के प्रतिष्ठित जमींदार थे. उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के मकतब में हुई. आसपास उच्च शिक्षा की व्यवस्था नहीं होने के कारण परिवार की ओर से घर पर ही पढ़ाई की व्यवस्था की गई थी. उनके बड़े भाई सैयद जहीर हसनैन शिक्षक थे, जबकि दूसरे भाई सैयद जफर हसनैन स्वतंत्रता सेनानी और मुस्तफाबाद पंचायत के लंबे समय तक मुखिया रहे.

महात्मा गांधी से प्रभावित होकर आंदोलन में कूदे

परिजनों का कहना है कि अंग्रेजी शासन के खिलाफ विरोध की भावना सज्जाद हसनैन में बचपन से ही थी. महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर वे असहयोग आंदोलन में शामिल हुए. सारण क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन को गति देने वाले कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ उन्होंने काम किया. इनमें मौलाना मजहरूल हक, नारायण प्रसाद सिंह, बाबू कृष्णकांत सिंह, रामनगीना शर्मा, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, जगलाल चौधरी, शिवबचन भक्त और इंद्रदीप सिन्हा जैसे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों के नाम परिवार की ओर से बताए जाते हैं.

परिवार के अनुसार, 1927 में महात्मा गांधी के सारण आगमन के दौरान भी सैयद सज्जाद हसनैन की भूमिका रही थी. गांधी उनके कार्यों से प्रभावित हुए थे और क्षेत्र में लोगों को अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन में शामिल होने का आह्वान किया था. देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद से भी उनके आत्मीय संबंध बताए जाते हैं.

वर्ष 1930 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू हुए नमक सत्याग्रह में भी सैयद सज्जाद हसनैन की सक्रिय भागीदारी बताई जाती है. इसी दौरान उनकी मुलाकात श्रीकृष्ण सिंह से हुई थी, जो बाद में बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री बने.

गुलजारबाग जेल में जहर देने से हुई मौत

परिवार के अनुसार, धरसाना सत्याग्रह की तैयारी के दौरान मई 1930 में अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. इसके बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी उनकी सक्रियता जारी रही और उन्हें दोबारा गिरफ्तार कर गुलजारबाग जेल भेजे जाने की बात कही जाती है.

परिवार के अनुसार, 17 सितंबर 1936 को गुलजारबाग जेल में उन्हें जहर देकर मार दिया गया और वहीं सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया. स्वतंत्रता आंदोलन के साथ सामाजिक क्षेत्र में भी उनकी सक्रियता बताई जाती है. वर्ष 1924 में उन्होंने अंजुमन-ए-जाफरिया की स्थापना की थी. परिवार के अनुसार, यह संस्था आज भी संचालित है.

परिजनों को मिला था ताम्रपत्र

देश की आजादी के बाद 15 अगस्त 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा उनके परिजनों को ताम्रपत्र देकर सम्मानित किए जाने की जानकारी भी परिवार की ओर से दी गई है. आज भी सैयद सज्जाद हसनैन के परिवार के सदस्य मुस्तफाबाद में रहते हैं. उनके पौत्र इकबाल जाफरी उर्फ सोनू बाबू कहते हैं कि देश की आजादी के लिए उनके पूर्वज का संघर्ष और बलिदान पूरे जिले के लिए गर्व की बात है.


विज्ञापन
Vivek Kumar

लेखक के बारे में

By Vivek Kumar

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन