बिहार के इस जिले में एयरपोर्ट बनने के बाद उठी AIIMS की मांग, आंदोलन करने को तैयार लोग, 9 जिलों को होगा फायदा

Published by : Paritosh Shahi Updated At : 13 Apr 2025 9:13 PM

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सांकेतिक तस्वीर

Purnia AIIMS: साल दर साल बीत गये पर पूर्णिया में एम्स की मांग अब तक पूरी नहीं हो सकी. यही वजह है कि एम्स की मांग को लेकर लोग सोशल मीडिया के माध्यम से भी सरकार तक अपनी आवाज पहुंचा रहे हैं, जबकि पटना और दिल्ली के सदन में भी आवाज उठायी जा रही है.

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Purnia AIIMS, अखिलेश चंद्रा, पूर्णिया: भारत-नेपाल और बिहार-बंगाल की अलग-अलग सीमाओं से जुड़े जिलों का पूर्णिया प्रमंडलीय मुख्यालय है, जहां बंगाल और कोसी प्रमंडल के जिलों से भी गंभीर रोगी इलाज के लिए पहुंचते हैं. प्रबुद्ध नागरिक मानते हैं कि इस लिहाज से यहां एम्स जैसा अति आधुनिक अस्पताल खुल जाने से बड़ी संख्या में आम लोगों को भला होगा और उन्हें बेहतर इलाज भी मिल पाएगा. चूंकि इस इलाके में बड़ी संख्या गरीबों की आबादी है इसलिए इस तबके को इलाज में काफी फायदा होगा. अभी इस इलाके में बेहतर इलाज की व्यवस्था का सर्वथा अभाव बना हुआ है.

बाहर जाकर सब इलाज करा सके, यह संभव नहीं

पटना और दिल्ली जाकर इलाज कराना गरीबों के लिए संभव नहीं है और यही कारण है कि रेफर किये जाने के बावजूद इस तबके के लोग बाहर नहीं जाते और बीमार माता-पिता या रिश्तेदारों को भगवान भरोसे छोड़ देते हैं. इससे समय से पहले वे काल का ग्रास बन जाते हैं.

सरकार की खामोशी से मिल रही आंदोलन को हवा

सही मायने में एम्स पूर्णिया की जरूरत है और इसकी स्थापना के लिए सरकार को शीघ्र पहल करनी चाहिए. पूर्णिया के नागरिकों का मानना है कि इस मामले में सरकार की उदासीनता एक बार फिर आंदोलन को हवा दे रही है. एम्स मामले में सरकार की खामोशी के कारण युवा गोलबंद भी होने लगे हैं. इस गोलबंदी में युवा अपने साथ डाक्टर, प्राध्यापक, अधिवक्ता, शिक्षक और रिटायर्ड पदाधिकारियों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.

युवाओं का कहना है कि जब दिल्ली और पटना के सदन में उठी आवाज भी नहीं सुनी जाए तो आम आदमी सड़क पर आने के लिए विवश हो जाता है और यही स्थिति बन रही है. दरअसल, पूर्णिया के तमाम जनप्रतिनिधि भी एम्स के पक्षधर हैं जो समय-समय पर अपने स्तर से सदन में मांग भी उठाते रहे हैं. नागरिकों का कहना है कि एम्स की स्थापना के लिए सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए.

इस मामले को तूल दे रहे युवाओं का कहना है कि युवाओं ने कहा कि सीमांचल का यह इलाका बिहार का पिछड़ा क्षेत्र है. यहां एम्स ही नहीं, विकास के कई काम किए जाने की आवश्यकता है. यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि पूर्णिया पूर्वोत्तर के राज्यों का सेन्टर प्वाइंट है. बेहतर इलाज के लिए यहां से तीन सौ किमी. दूर पटना जाने की जरूरत पड़ती है. एक तो गरीब और मध्यम परिवारों के लोग हिम्मत नहीं जुटा पाते और कभी किसी जुगाड़ से निकल भी गये तो जुगत जुटाने के चक्कर में पटना पहुंचने से पहले जान चली जाती है.

बंगाल समेत सीमांचल के नौ जिलों को मिलेगा लाभ

पूर्णिया जिला नेपाल व पश्चिम बंगाल की सीमा पर बसा हुआ है. कोसी प्रमंडल के जिले में भी इससे सटकर बसे हुए हैं. झारखंड अलग होने के बाद बिहार में दूसरा सुपर स्पेशलिस्ट अस्पताल नहीं है. पूर्णिया और कोसी प्रमंडल राज्य की बड़ी आबादी को कवर करता है. पूर्णिया इन सभी जिलों का केंद्र है और इस दृष्टि से भी एम्स के लिए पूर्णिया पूरी तरह से उपयुक्त है. नागरिकों का कहना है कि पूर्णिया में एम्स जैसा सुपर स्पेशलिस्ट अस्पताल खुलने से कोशी और पूर्णिया के नौ जिलों के अलावा पड़ोसी राज्य बंगाल के अलावा पड़ोसी देश नेपाल के नागरिकों को भी बेहतर इलाज की सुविधा मिल सकेगी.

पूर्णिया के बुद्धिजीवियों का कहना है कि बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव के कारण सीमांचल में फैलती महामारी, कैंसर और अन्य सघन रोगों के मकड़जाल ने कोसी वासियों का सामान्य जीवन बुरी तरह प्रभावित कर दिया है. इस क्षेत्र में एम्स स्तर का अस्पताल नहीं होने से गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए लोगों को या तो पटना या सिलिगुडी जाना पड़ता है. इस क्षेत्र के बहुत सारे लोग कैंसर समेत कई अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं. आमलोग को बेहतर इलाज के लिए इस क्षेत्र में एम्स स्तर के अस्पताल की सख्त आवश्यकता है और यही वजह है कि पूर्णिया में एम्स निर्माण की मांग जोर पकड़ रही है.

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तीन दशकों से उठ रही एम्स की मांग

पूर्णिया में नब्बे के दशक से एम्स जैसे सुपर स्पेशलिस्ट अस्पताल खोले जाने की मांग उठती रही है. उस समय तत्कालीन सांसद ने कई-कई बार संसद में इसकी मांग रखी. 1989 में केंद्रीय मंत्री तस्लीमुद्दीन ने न केवल मांग उठायी थी, बल्कि प्रधानमंत्री को इस बाबत स्मार पत्र भी दिया था. बाद के दिनों में भी संसद में इस मांग को मुखर रुप से उठाया गया पर, पूर्णिया की इस जरूरत को बहुत तवज्जो नहीं दिया गया. इस बीच सीमांचल संघर्ष मोर्चा ने अलग-अलग कई दफे सरकार का ध्यान एम्स निर्माण की ओर खींचा जबकि हालिया सालों में प्रबुद्ध नागरिकों ने अलग-अलग मंच से पूर्णिया में एम्स के निर्माण की मांग उठायी. इस बीच युवाओं ने एम्स निर्माण के सवाल पर गोलबंदी का अभियान शुरू कर दिया है.

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क्या कहते हैं आंकड़े

10 हजार मरीजों का जमावड़ा रोजाना पूरे सीमांचल से पूर्णिया आते हैं.
1000 से अधिक रोगी पूर्णिया मेडिकल कॉलेज अस्पताल में दिखाने आते हैं.
400 के करीब मरीज प्रत्येक दिन इमरजेंसी सेवा के लिए आते हैं.
300 से अधिक मरीजों के परिजन अस्पताल पहुंचते हैं.
103 बेड मात्र मेल व फिमेल वार्ड में उपलब्ध हैं.

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Paritosh Shahi

लेखक के बारे में

By Paritosh Shahi

परितोष शाही पिछले 4 वर्षों से डिजिटल मीडिया और पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका से की और वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल की बिहार टीम का हिस्सा हैं. राजनीति, सिनेमा और खेल, विशेषकर क्रिकेट में उनकी गहरी रुचि है. जटिल खबरों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाना और बदलते न्यूज माहौल में तेजी से काम करना उनकी विशेषता है. परितोष शाही ने पत्रकारिता की पढ़ाई बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) से की. पढ़ाई के दौरान ही पत्रकारिता की बारीकियों को समझना शुरू कर दिया था. खबरों को देखने, समझने और लोगों तक सही तरीके से पहुंचाने की सोच ने शुरुआत से ही इस क्षेत्र की ओर आकर्षित किया. पत्रकारिता में करियर की पहली बड़ी शुरुआत बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के दौरान हुई, जब उन्होंने जन की बात के साथ इंटर्नशिप की. इस दौरान बिहार के 26 जिलों में जाकर सर्वे किया. यह अनुभव काफी खास रहा, क्योंकि यहां जमीनी स्तर पर राजनीति, जनता के मुद्दों और चुनावी माहौल को बहुत करीब से समझा. इसी अनुभव ने राजनीतिक समझ को और मजबूत बनाया. इसके बाद राजस्थान पत्रिका में 3 महीने की इंटर्नशिप की. यहां खबर लिखने की असली दुनिया को करीब से जाना. महज एक महीने के अंदर ही रियल टाइम न्यूज लिखने लगे. इस दौरान सीखा कि तेजी के साथ-साथ खबर की सटीकता कितनी जरूरी होती है. राजस्थान पत्रिका ने उनके अंदर एक मजबूत डिजिटल पत्रकार की नींव रखी. पत्रकारिता के सफर में आगे बढ़ते हुए पटना के जनता जंक्शन न्यूज पोर्टल में वीडियो प्रोड्यूसर के रूप में भी काम किया. यहां कैमरे के सामने बोलना, प्रेजेंटेशन देना और वीडियो कंटेंट की बारीकियां सीखीं. करीब 6 महीने के इस अनुभव ने कैमरा फ्रेंडली बनाया और ऑन-स्क्रीन प्रेजेंस को मजबूत किया. 1 अप्रैल 2023 को राजस्थान पत्रिका को प्रोफेशनल तौर पर ज्वाइन किया. यहां 17 महीने में कई बड़े चुनावी कवरेज में अहम भूमिका निभाई. लोकसभा चुनाव 2024 में नेशनल टीम के साथ जिम्मेदारी संभालने का मौका मिला. इसके अलावा मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के दौरान भी स्टेट टीम के साथ मिलकर काम किया. इस दौरान चुनावी रणनीति, राजनीतिक घटनाक्रम और बड़े मुद्दों पर काम करने का व्यापक अनुभव मिला. फिलहाल परितोष शाही प्रभात खबर डिजिटल बिहार टीम के साथ जुड़े हुए हैं. यहां बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान कई बड़ी खबरों को रियल टाइम में ब्रेक किया, ग्राउंड से जुड़े मुद्दों पर खबरें लिखीं और वीडियो भी बनाए. बिहार चुनाव के दौरान कई जिलों में गांव- गांव घूम कर लोगों की समस्या को जाना-समझा और उनके मुद्दे को जन प्रतिनिधियों तक पहुंचाया. उनकी कोशिश हमेशा यही रहती है कि पाठकों और दर्शकों तक सबसे पहले, सही और असरदार खबर पहुंचे. पत्रकारिता में लक्ष्य लगातार सीखते रहना, खुद को बेहतर बनाना और भरोसेमंद पत्रकार के रूप में अपनी पहचान मजबूत करना है.

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