आंबेडकर मार्केट: सुनहरे इतिहास के पन्ने पर जर्जरता व लाचारी की इबारत
Updated at : 04 Dec 2019 9:02 AM (IST)
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पूर्णिया : करीब 30 साल पूर्व वर्ष 1989 में शहर के मुहाने पर बस स्टैंड और आरएनसाह चौक के बीच बसे बहुचर्चित आंबेडकर मार्केट आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. न जलनिकासी की व्यवस्था और न शुद्ध पेयजल. सफाई तो कभी नहीं दिखती. लघुशंका के लिए यूरिनल नहीं होने के कारण लोग आज […]
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पूर्णिया : करीब 30 साल पूर्व वर्ष 1989 में शहर के मुहाने पर बस स्टैंड और आरएनसाह चौक के बीच बसे बहुचर्चित आंबेडकर मार्केट आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. न जलनिकासी की व्यवस्था और न शुद्ध पेयजल. सफाई तो कभी नहीं दिखती. लघुशंका के लिए यूरिनल नहीं होने के कारण लोग आज भी या तो दीवार की ओट का सहारा लेते हैं अथवा आसपास कहीं झाड़ी खोजते हैं. यही है आंबेडकर मार्केट की वर्तमान छिछली तासीर.
दरअसल पूर्णिया के विकास की कड़ी में जैसे ही बस स्टैंड से पश्चिम विकास बाजार की स्थापना हुई वैसे ही लगने लगा कि अब पूर्णिया की सूरत खिल जायेगी. सचमुच ऐसा ही हुआ. विकास बाजार के बाद आंबेडकर मार्केट बने.
उधर जिला परिषद ने भी अपना बस स्टैंड बनाया. वहां भी मार्केट बने. ये सारे बाजार उस समय स्थापित किया गया जब पूर्णिया विकास के पायदान पर काफी पीछे था. उस समय के तत्कालीन डीएम राम सेवक शर्मा की सोच थी कि पहले विकास बाजार बना और इसके बाद आंबेडकर मार्केट की परिकल्पना कर इसे अमलीजामा पहनाया गया. इसके साथ ही आंबेडकर बाजार की भी स्थापना की गयी.
शहर की खाली पड़ी जमीन पर कई मार्केट नगर निगम और जिला परिषद के जमीन पर भी बने. बिहार के सबसे निचले पायदान पर गिने जाने वाले पूर्णिया शहर मार्केट बनने के साथ ही उस जमाने का काफी रमणीक स्थान बन गया था. इन दुकानों में व्यवसाय करने वाले अपने को काफी गौरवान्वित महसूस करते थे.
आज उसी बाजार में बदहाली का आलम है. पीने के पानी से लेकर शौचालय तक की यहां कोई व्यवस्था नहीं है. साफ-सफाई का वर्षों से टोटा है. आंबेडकर मार्केट सीधे जिला प्रशासन का है. यहां का राजस्व सीधे राजस्व विभाग को जाता है.
लेकिन इसकी सूरत और सीरत में सुधार के लिए कोई पहल नहीं हो रही है. दीवारों की ओट बना यूरिनलआंबेडकर मार्केट में कहीं भी यूरिनल नहीं है. दीवारों की ओट ही यूरिनल बना हुआ है. मजबूरी में लोग एसपी आफिस के पीछे जाने वाली गली में बड़ी ही चालाकी से मूत्र त्याग कर देते हैं. आंबेडकर बाजार में आने वाले सभी ग्राहकों को भी इस परेशानियों का सामना करना पड़ता है. खासकर महिलाओं को काफी परेशानी हो रही है.
बरसात में बाजार हो जाता है नरक
बरसात के दिनों विकास बाजार नरक में तब्दील हो जाती है. वहां के व्यवसायी बताते हैं कि पूरे बाजार में डेढ़ सौ से अधिक दुकानें हैं. बरसात के दिनों जर्जर छत से पानी रिसने लगता है. दीवार भी टूट रही है. यहां के लोग बता रहे हैं कि राजस्व तो प्रतिमाह जमा करते हैं मगर रिपेयरिंग नहीं होती.
समस्याओं को लेकर जिला प्रशासन का ध्यान आकृष्ट कराकर होगा समाधान
इस संबंध में विचार विमर्श किया जा रहा है. समस्याओं के मुतल्लिक जिला प्रशासन का ध्यान आकृष्ट कराकर शीघ्र ही समस्या का समाधान करवाया जायेगा. आंबेडकर बाजार में सबसे पहले शौचालय व यूरिनल की व्यवस्था करवायी जायेगी. सौंदर्यीकरण के लिए भी योजना बनायी जायेगी.
संतोष कुशवाहा, सांसद, पूर्णिया लोकसभा
कई वर्षों से एग्रीमेंट रिनुअल नहीं होने से व्यवसायियों को हो रही है परेशानी
करीब 30 साल पहले दुकानों के लिए दुकानदारों को दुकानों का लीज एग्रीमेंट दी गयी. उसकी अवधि 15 साल रखी गयी थी. समय पूरा हो गया. आज तक दुबारा रिनुअल नहीं हुआ. जो अब किसी काम का नहीं रहा. अधिकांश एग्रीमेंट होल्डर अब जीवित भी नहीं हैं. उनके वारिसान अथवा परिजन दुकान चला रहे हैं. नया एग्रीमेंट नहीं होने के कारण इन्हें न तो मुद्रा लोन मिल रहा है और न ही अन्य व्यावसायिक लोन. इससे भी यहां के व्यवसायियों की परेशानी बढ़ी है.
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