डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा सदर अस्पताल
Updated at : 07 Mar 2019 4:59 AM (IST)
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पूर्णिया : जिले के स्वास्थ्य विभाग में डॉक्टरों का टोटा है, लिहाजा स्वास्थ्य सुविधा का हाल बेहाल है. अब तो यह उम्मीद लगायी जा रही है कि मेडिकल कॉलेज शुरू होने तक यह समस्या बरकरार रहने वाली है. विशेषज्ञों के बारे में बात करें तो जिले में इसके सृजित पद 61 है जबकि यहां मात्र […]
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पूर्णिया : जिले के स्वास्थ्य विभाग में डॉक्टरों का टोटा है, लिहाजा स्वास्थ्य सुविधा का हाल बेहाल है. अब तो यह उम्मीद लगायी जा रही है कि मेडिकल कॉलेज शुरू होने तक यह समस्या बरकरार रहने वाली है. विशेषज्ञों के बारे में बात करें तो जिले में इसके सृजित पद 61 है जबकि यहां मात्र 28 डॉक्टर ही पदस्थापित है.
साधारण डॉक्टरों की सृजित पद 62 की तुलना में महज 29 डॉक्टर ही पदस्थापित है जहां डॉक्टरों के आधे से अधिक पद रिक्त हो वहां की स्वास्थ्य व्यवस्था बीमार नहीं तो क्या होगी. जहां डॉक्टरों का टोटा हो,वहां सबों को सेहतमंद बनाने की कवायद करना बेमानी नहीं होगा.
डॉक्टरों की कमी से जूझता अस्पताल: जिले के सदर अस्पताल सहित तमाम पीएचसी डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है.
सभी अस्पतालों में एक से दो डॉक्टरों की कमी देखने को मिल रही है. चिकित्सकों की कमी का सबसे अधिक खामियाजा ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को भुगतना पड़ता है.
चिकित्सक के मामले में सदर अस्पताल की स्थिति तो थोड़ी बेहतर भी है, लेकिन पीएचसी और एपीएचसी का हाल बेहाल है. पीएचसी के अलावा एपीएचसी और उप स्वास्थ्य केंद्र पर तो आयुष चिकित्सकों के भरोसे ही मरीजों का इलाज होता है.
जिले के तमाम एपीएचसी में सृजित पद 48की तुलना में मात्र 18 डॉक्टर ही कार्यरत है. स्याह सच यह है कि चिकित्सकों के अभाव में सभी पीएचसी रेफर सेंटर बन कर रह गया है. गंभीर मरीजों को तत्काल ही सदर अस्पताल रेफर कर दिया जाता है, क्योंकि पीएचसी में डॉक्टरों का टोटा है.
खुद के क्लिनिक को चमकाने के लिए आते हैं यहां : डॉक्टरों का मानना है कि डॉक्टरी शिक्षा में लागत व समय के अनुरूप मानदेय की व्यवस्था नहीं है. जो सरकारी सेवा को नीरस बनाती है. इसलिए निजी प्रैक्टिस की ओर चिकित्सक आकर्षित होते हैं.
वहीं कई चिकित्सक शुरुआती दौर में सरकारी सेवा में आ तो जाते हैं और जब ऐसे डॉक्टरों की गाड़ी चल निकलती है तो अपना निजी नर्सिंग होम व क्लिनिक का संचालन करने लगते हैं. इसके कई उदाहरण भी हैं. वहीं कई ऐसे चिकित्सक हैं, जो सरकारी सेवा का उपयोग अपनी पहचान स्थापित करने में करते हैं.
सदर अस्पताल में भी है डॉक्टरों का टोटा
सदर अस्पताल में सृजित पद 59 की तुलना में महज 33 डॉक्टर ही कार्यरत हैं. जिसमें एक सिविल सर्जन,एक जिला यक्ष्मा पदाधिकारी शामिल है.सृजित पद की तुलना में इस महत्वपूर्ण स्थान पर महज 50 फीसदी डॉक्टरों का पदस्थापित रहना पूरी व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल है.
गौरतलब है कि सदर अस्पताल में पूर्वोत्तर बिहार के कोसी,सीमांचल,पश्चिम बंगाल व बांग्लादेश के सीमावर्ती इलाके से लोग इलाज हेतु पहुंचते हैं. डॉक्टरों की कमी के कारण बीमार पड़े अस्पताल पहुंच कर लोग निराश हो कर वापस लौट जाते हैं.सदर अस्पताल में फिलहाल हर विभाग में डॉक्टरों का अभाव देखने को मिल रहा है. जाहिर है कि संसाधन के स्तर पर ही सदर अस्पताल फिसड्डी साबित हो रहा है.
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