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पत्नी के इलाज के लिए एक पांव से दौड़ते तपेश्वर

Updated at : 06 Jan 2019 7:04 AM (IST)
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पत्नी के इलाज के लिए एक पांव से दौड़ते तपेश्वर

हादसे में दोनों हाथ व एक पैर गंवाने के बाद 16 वर्षों से पत्नी बनी हुई है ‘बैसाखी’ पुष्यमित्र पटना : तपेश्वर यादव आइजीआइएमएस हॉस्पिटल में मिले. कुछ इस हाल में कि उन्हें देखकर ठहरना ही पड़ा. दोनों हाथ नहीं, एक पांव नहीं. लेकिन लकड़ी की बैसाखी लिये चले जा रहे हैं. जैसे यह बता […]

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हादसे में दोनों हाथ व एक पैर गंवाने के बाद 16 वर्षों से पत्नी बनी हुई है ‘बैसाखी’
पुष्यमित्र
पटना : तपेश्वर यादव आइजीआइएमएस हॉस्पिटल में मिले. कुछ इस हाल में कि उन्हें देखकर ठहरना ही पड़ा. दोनों हाथ नहीं, एक पांव नहीं. लेकिन लकड़ी की बैसाखी लिये चले जा रहे हैं. जैसे यह बता रहे हों कि जिंदगी है तो चलती ही रहनी चाहिए.
तपेश्वर नेपाल के रहने वाले हैं, अपनी पत्नी का इलाज कराने यहां आये हैं. डाॅक्टरों ने जांच कराने की सलाह दी है. पत्नी लैब में है और वे दवा दुकान की तरफ जा रहे हैं. यही पत्नी पिछले 16 साल से उनके जीवन का सहारा है. वह न सिर्फ बटाई की खेती करके घर चलाने लायक संसाधन जुटाती है और घर संभालती है, बल्कि तपेश्वर का देह भी संभालती है.
उनको खिलाना-पिलाना, नहलाना-धुलाना, शौच कराना, कपड़े पहनाना सबकुछ. 16 साल पहले एक दुर्घटना में उन्होंने अपने दोनों हाथ और एक पांव गंवा दिये थे, लुधियाना में. एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में ठेका मजदूर का काम करने वह नेपाल के सप्तरी जिले से लुधियाना गये थे. वहां काम करते वक़्त वह पास से गुजर रही हाइ टेंशन वायर की चपेट में आ गये. और एक पल में उनका जीवन बदल गया.
तब से अब तक 16 साल से वह अपनी पत्नी के सहारे जी रहे हैं. अब वही पत्नी बीमार हो गयी है. गैस और ब्लड प्रेशर की तकलीफ है. विराटनगर में इलाज कराया, मगर कोई लाभ नहीं हुआ तो पटना आ गये. जिस पत्नी ने इतना साथ दिया, उसे कैसे छोड़ दें. यहां वह खुद तन कर खड़े हो गये हैं और अस्पताल में इन्ही दो बैसाखियों के सहारे दौड़-भाग कर रहे हैं. चेहरे पर कोई शिकन नहीं है. न लुधियाना में हुए हादसे को लेकर, न ईश्वर के प्रति, न जीवन के प्रति. न किसी से कोई डिमांड है.
एक तरफ दुनिया ऐसे दौर में पहुंच गयी है, जहां रिश्ते-नाते बेमानी होते जा रहे हैं. लोग अपने मां-बाप को मरने के लिए छोड़ दे रहे है, जीवन संगिनी के बारे में सोचता कौन है? ऐसी स्थिति में हाथ-पांव गंवाकर भी तपेश्वर एक तटबंध की तरह खड़े दिखते हैं. प्यार और प्रतिबद्धता, मनुष्यता और जिजीविषा के अथाह सागर को वह मौजूदा दौर के क्षुद्रपन से बचा लेना चाहते हैं.
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