पटना : दवाओं का असर नहीं, एमडीआर टीबी का खतरा बढ़ा
Updated at : 09 Jul 2018 5:21 AM (IST)
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चार साल में अब तक 200 मरीजों पर टीबी की सामान्य दवाओं का नहीं हुआ असर प्राइवेट अस्पतालों में एमडीआर टीबी की जांच की सुविधा नहीं आनंद तिवारी पटना : टीबी की दवा मरीजों पर असर नहीं कर रही है. खास कर संक्रमित मरीजों पर मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस (एमडीआर) का शिकंजा कसता जा रहा है.हालत […]
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चार साल में अब तक 200 मरीजों पर टीबी की सामान्य दवाओं का नहीं हुआ असर
प्राइवेट अस्पतालों में एमडीआर टीबी की जांच की सुविधा नहीं
आनंद तिवारी
पटना : टीबी की दवा मरीजों पर असर नहीं कर रही है. खास कर संक्रमित मरीजों पर मल्टी ड्रग रेजिस्टेंस (एमडीआर) का शिकंजा कसता जा रहा है.हालत यह है कि पटना सहित पूरे बिहार में पिछले चार साल में 200 से अधिक टीबी के मरीजों पर दवा बेअसर साबित हुई है. पिछले एक साल में 65 मरीजों में एमडीआर की पुष्टि हुई है.
शहर के पीएमसीएच, आईजीआईएमएस आदि सरकारी लैब में जांच के बाद 65 एमडीआर के मरीज घोषित किये गये हैं. स्टेट टीबी सेंटर भी इस मामले की पुष्टि कर चुका है. इनमें सबसे अधिक पटना, मधुबनी, समस्तीपुर, भोजपुर, बेगूसराय, छपरा और पूर्णिया के मरीज पाये गये हैं.
बीच में छोड़ देते हैं इलाज : एमडीआर टीबी को लेकर लोगों में जागरूकता की कमी हैं. नतीजा वह नियमित इलाज नहीं कराते और उनको एमडीआर टीबी हो जाता है.
एमडीआर जांच की सुविधा प्राइवेट में उपलब्ध नहीं है. इलाज के दौरान कई लोगों को भ्रम होता है कि वे ठीक हो गये हैं, इसलिए वे इलाज बीच में छोड़ देते हैं और एमडीआर के शिकार हो जाते हैं. टीबी या एमडीआर टीबी से बचने के लिए समय पर जांच भी करानी जरूरी है.
पूरे प्रदेश में 2.5 लाख मरीज हैं टीबी केपूरे बिहार में टीबी के 2.5 लाख मरीज हैं. इन मरीजों पर दवाओं का असर नहीं होने के चलते इनको एमडीआर व एक्सट्रीम ड्रग रेजिस्टेंस (एक्सडीआर) जैसी भयानक बीमारी का सामना करना पड़ रहा है. विशेषज्ञ डॉक्टरों की मानें, तो ये दोनों बीमारियां टीबी का भयानक रूप हैं.
अगर मरीजों का इलाज समय पर सही तरीके से नहीं किया गया, तो मौत हो जाती है. दरअसल इलाज के दौरान बीच में टीबी की दवा छोड़ देने के चलते, टीबी का बैक्टीरिया इन दवाओं के प्रति रेजिस्टेंट हो जाता है. मरीजों पर दवाओं का असर नहीं होता और उनको एमडीआर व एक्सडीआर का सामना करना पड़ता है. जबकि छह माह तक दवाओं का कोर्स जरूरी होता है.
प्राइवेट अस्पताल और डॉक्टर कर रहे एमडीआर का इलाज : डॉट सेंटर में इलाज कर रहे डॉक्टरों की मानें, तो कई मरीज प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराते हैं. प्राइवेट अस्पतालों में एमडीआर टीबी की जांच की सुविधा नहीं है. बावजूद वहां के डॉक्टर एमडीआर का इलाज करते हैं. वहीं जो मरीज प्राइवेट में इलाज कराने के दौरान इलाज बीच में छोड़ देते हैं, वे एमडीआर की जांच भी नहीं करा पाते हैं. नतीजा बाद में जब टीबी फिर से परेशान करता है.
एमडीआर टीबी के मरीज पर सामान्य दवा का असर इसलिए नहीं होता है. क्योंकि, टीबी के कीटाणु उस दवा के अभ्यस्त हो जाते हैं और अपने आपको उसके अनुरूप ढाल लेते हैं. कीटाणु में यह क्षमता तब विकसित होती है, जब मरीज नियमित दवा नहीं लेता. ऐसे में टीबी मरीजों को चाहिए कि वह दवाओं का पूरा कोर्स करे और समय-समय पर टीबी डॉट सेंटर में जाकर अपने बलगम की जांच कराएं.
डॉ सुभाष चंद्र झा, चेस्ट एवं टीबी रोग विशेषज्ञ पीएमसीएच
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