13 साल बाद भी शुरू नहीं हुआ एफसीआई गोदाम, पशु चारा रखने का बना अड्डा

Published by :Divyanshu Prashant
Published at :08 May 2026 11:25 AM (IST)
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13 साल बाद भी शुरू नहीं हुआ एफसीआई गोदाम, पशु चारा रखने का बना अड्डा

एफसीआई गोदाम

मुंगेर के टेटियाबंबर में 23 लाख की लागत से बना एफसीआई गोदाम 13 वर्षों से उद्घाटन के इंतजार में सफेद हाथी बना हुआ है. सरकारी उदासीनता के कारण अब इस भवन में अनाज की जगह मवेशियों का चारा रखा जा रहा है और डीलरों को राशन के लिए 12 किलोमीटर दूर खड़गपुर जाना पड़ता है.

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मुंगेर से राणा गौरी शंकर की रिपोर्ट: जिले के टेटियाबंबर प्रखंड में लाखों की लागत से निर्मित एफसीआई गोदाम सरकारी उदासीनता की भेंट चढ़ गया है. कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय के समीप स्थित यह गोदाम करीब 23 लाख रुपये की लागत से बनाया गया था, लेकिन 13 वर्ष बीत जाने के बाद भी इसे चालू नहीं किया जा सका है. विडंबना यह है कि जिस भवन का उद्घाटन स्वयं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया था, आज वहां खाद्यान्न की जगह स्थानीय लोग पशुओं का चारा (कुट्टी) रख रहे हैं.

डीलर परेशान: 12 किलोमीटर दूर खड़गपुर से लाना पड़ता है राशन

गोदाम चालू नहीं होने का सबसे बड़ा खमियाजा जन वितरण प्रणाली (PDS) के डीलरों को भुगतना पड़ रहा है. स्थानीय डीलरों को खाद्यान्न उठाव के लिए करीब 12 किलोमीटर दूर खड़गपुर अनुमंडल मुख्यालय जाना पड़ता है. संजीव कुमार, सौरभ प्रमोद मंडल, अजय दास और प्रेम शंकर सहित कई डीलरों ने बताया कि दूरी अधिक होने के कारण समय और पैसे की बर्बादी होती है. साथ ही लंबी दूरी के कारण रास्ते में अनाज की कालाबाजारी की आशंका भी बढ़ जाती है.

बहाना खत्म, फिर भी गोदाम बंद

स्थानीय डीलरों के अनुसार, पहले अधिकारी अप्रोच पथ (संपर्क मार्ग) में मिट्टी भराई न होने का बहाना बनाकर संचालन टालते रहे. लेकिन अब सड़क और अप्रोच पथ का निर्माण हुए भी लंबा समय बीत चुका है, फिर भी गोदाम के ताले नहीं खुले. हर बार अधिकारियों द्वारा “जल्द चालू होगा” का रटा-रटाया आश्वासन दिया जाता है, लेकिन धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है.

प्रखंड प्रमुख ने उठाई मांग

प्रखंड प्रमुख किरण देवी ने सरकार और प्रशासन से इस गोदाम को तत्काल प्रभाव से चालू कराने की मांग की है. उन्होंने कहा कि स्थानीय स्तर पर गोदाम शुरू होने से न केवल डीलरों की परेशानी खत्म होगी, बल्कि क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे. फिलहाल, करोड़ों की सरकारी संपत्ति का इस तरह बर्बाद होना व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है.

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