वट सावित्री को लेकर सजने लगीं दुकानें

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 02 Jun 2016 6:26 AM

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4 जून को नव विवाहिता और सुहागिनें रखेंगी व्रत मधुबनी : आगामी 4 जून को मिथिलांचल सहित देश विदेश के नव विवाहिता और सुहागिनों के सुहाग रक्षा का प्रमुख पर्व वट सावित्री है, जिसको लेकर शहर में इससे संबंधित पूजन सामग्री की दुकानें सजने लगी हैं. इस दिन मिथिलांचल सहित देश विदेश की नवविवाहिता एवं […]

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4 जून को नव विवाहिता और सुहागिनें रखेंगी व्रत

मधुबनी : आगामी 4 जून को मिथिलांचल सहित देश विदेश के नव विवाहिता और सुहागिनों के सुहाग रक्षा का प्रमुख पर्व वट सावित्री है, जिसको लेकर शहर में इससे संबंधित पूजन सामग्री की दुकानें सजने लगी हैं. इस दिन मिथिलांचल सहित देश विदेश की नवविवाहिता एवं सुहागन अपने सुहाग अर्थात पति की रक्षा और लंबी आयु की कामना करते हुए व्रत रखकर बरगद पेड़ की पूजा अर्चना करती है और कथा सुन प्रसाद चढ़ाती है. मिथिलांचल में यह प्रथा पौराणिक काल से जारी है. जिसमें हर जाति, वर्ग की महिलाएं सजधज कर लोक गीत गाते हुए बरगद पेड़ तक जाती हैं.
और इसपर जल, पुष्प, अक्षत अर्पित कर लाल, पीले धागे तीन बार लपेटकर गौड़ी पूजा इसी पेड़ के समीप करने के बाद इसकी कथा सुनने के पश्चात प्रसाद चढ़ाकर घर वापस आती है. इस पर्व में नवविवाहिताएं नये कपड़े में सजधज कर डाली में घड़ा जैसा मिट्टी के बोहनी में धान का लावा, उड़द के बेसन का बर माला, बांस के सजी (फूलडाली) में कपड़े का बना हुआ वर, कन्या, बांस के सात बेना, आम, लीची, केला सहित पांच पके मौसमी फल, फूल, अक्षत, लाल, पीला धागा, सिंदूर, चावल का पिठार, तेल,
अगरबत्ती, मिठाई, मिट्टी के ढ़क्कन सहित दीप जलाने हेतु पातिल, सात बांस के डाली, अंकुरित चना,मूंग आदि लेकर घर से झुंड में स्थानीय लोकगीत गाते हुए जाती है. इस पर्व को लेकर इसमें उपयोग होने वाली वस्तुओं अर्थात कपड़े, मिट्टी के बर्तन, बांस के बर्तन, फल आदि की दुकानें शहर सहित जिले भर के ग्रामीण एवं कस्बाई बाजारों में सजने व बिकने लगी है. एक सप्ताह पहले से ही नवविवाहिता के ससुराल पक्ष एवं सुहागीन के घर के लोग इन वस्तुओं की खरीददारी शुरू कर दी है. इस
पर्व में स्थानीय कला और सामाजिक संबंध को जोड़ने वाली अधिकतर वस्तुओं की ही जरूरत होती है. मुख्यत: इस पर्व में कपड़ों व फल के अलावा मल्लिक एंव कुंभकार के बनाये बर्तनों की ही आवश्यकता पड़ती है. लेकिन जब से बाजार में अधिकतर जाति, धर्म के लोग इन वस्तुओं की बिक्री करना शुरू कर दिये है. तब से पुश्तैनी धंधा करने वाले इन दोनों जातियों के सामने संकट के बादल मंडराने लगे है.
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