शो पीस बन कर रह गया राजनगर खादी ग्रामोद्योग
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 12 May 2016 5:33 AM
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विभागीय उदासीनता के चलते दर्जन भर रह गये हैं प्रखंड में सूतकार बिना संशाधन के सूतकारों से लिया जा रहा है काम राजनगर : राजनगर स्थित खादी ग्रामोद्योग संघ विगत कई वर्षों से विभागीय उदासीनता का शिकार होने के कारण बदहाल हो चुका है. हालात यहां तक आ पहुंची है कि इन केंद्र पर न […]
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विभागीय उदासीनता के चलते दर्जन भर रह गये हैं प्रखंड में सूतकार
बिना संशाधन के सूतकारों से लिया जा रहा है काम
राजनगर : राजनगर स्थित खादी ग्रामोद्योग संघ विगत कई वर्षों से विभागीय उदासीनता का शिकार होने के कारण बदहाल हो चुका है. हालात यहां तक आ पहुंची है कि इन केंद्र पर न तो कोई कर्मचारी और न कोई सूतकार अपनी हिम्मत जुटा पाता है कि इन केंद्र को फिर से पुराने वाले स्थित में पहुंचा पाये.
जर्जर भवन, बिना सूतकार व खादी वस्त्रों से विहीन यह केंद्र मरधट बनने को मजबूर हो गया है. कहने को इस केंद्र के प्रबंधक सहित कुल 4 कर्मचारी कार्यरत हैं. पर दिनों दिन सूतकारों की संख्या घटने से कर्मचारियों के पास कोई काम बचा नही रह गया है. मौजूदा दौर में सूतकारों की संख्या घटकर दर्जन भर ही रह गयी है. जो इस केंद्र से पाक्षिक बिट पर आकर रुई लेकर सूत का निर्माण करते हैं. और इन सूतकारों को पारिश्रमिक के तौर पर महज प्रति किलो रुई के एवज में सौ रुपये मिलते हैं.
बद से बदतर स्थिति: केंद्र पर कार्यकर्ता पद पर कार्यरत गंगा साफी बताते हैं कि यहां खादी से बने वस्त्र की मांग रहने के बाबजूद कपड़ा उपलब्ध नहीं होने से ग्राहक यहां नहीं के बराबर आते हैं. श्री साफी बताते हैं कि मैनेजर के पद पर कार्यरत विजय कुमार यादव जयनगर में रहकर जयनगर, बाबूबरही, खजौली, राजनगर सहित कुल पांच केंद्रों के प्रभार रहने के कारण व्यस्त रहते हैं.
साथ ही सूतकारों को कोई नयी मशीन भी नहीं होने से यहां से निर्मित सूत की गुणवत्ता के पैमाने पर काफी कमजोर होता है. स्थानीय लोग बताते हैं कि केद्र को करीब दो बीघा जमीन उपलब्ध तो है. जिसका उपयोग निजी के तौर पर लिया जा रहा है. साथ ही केंद्र का परिचालन ठप के कगार पर आ गया है.
क्या कहते स्थानीय विधायक: इस बाबत स्थानीय विधायक सह शून्य कालीन सभापति रामप्रीत पासवान बताते है कि समय के साथ खादी वस्त्रों के प्रति लोगों में दिलचस्पी कम होती जा रही है. उपर से विभाग की उदासिनता से खादी भंडार की स्थिती दयनीय हो गयी. उन्होंने कहा कि राजनगर में खादी केंद्र को पूर्णजीवित करने का प्रयास अपने स्तर से करेंगे.
लोगों की मांग
ललन कुमार पासवान : आज खादी वस्तों के इस्तेमाल करने वालों की संख्या कम होने से खादी भंडार मरनासन होती जा रही है. सरकार को चाहिए की देसी कपड़ों को बढ़ावा देने के लिए खादी केंद्रों को पुनर्जिवित करने का काम किया जाय.
सीताराम मिश्र : खादी वस्त्रों की मांग दिनोदिन गिरने का कारण सरकार और लोगों की इस तरफ से झुकाव कम होना है. ऐसा नही है कि खादी कपड़े आधुनिक कपड़ों से कमतर है. आज भी अगर सरकार पहल करे तो गांधी जी की खादी वस्त्र एक बार फिर से अपने उत्कर्ष पर पहुंच सकता है.
विजय झा : समय के साथ ऐसा बदलाव आया कि आज खादी कपड़े पहनने वालों के पहुंच से दूर होती जा रही है. साथ ही खादी कपड़े की मूल्य बांकी कपड़ों से महंगे होने से भी इसकी मांग कम होती गई.
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