गरीबी और गंदगी के बीच जीने को अभिशप्त हैं मछुआरे
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 14 Jun 2015 9:41 AM
विज्ञापन
मेदनीचौकी: प्रखंड के विभिन्न गांवों में रह रहे मछुआरों की आबादी गरीबी, गंदगी व अशिक्षा की जिंदगी जीने को अभिशप्त है. मिल्की मुस्तफापुर टोरलपुर, खांड़पर, जकड़पुरा, मानूचक, माणिकपुर, भवानीपुर आदि गांव में रह रही यह आबादी आजादी के 68 वर्ष बाद भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं. पुरानी बाजार निवासी चंदर सहनी ने कहा कि […]
विज्ञापन
मेदनीचौकी: प्रखंड के विभिन्न गांवों में रह रहे मछुआरों की आबादी गरीबी, गंदगी व अशिक्षा की जिंदगी जीने को अभिशप्त है. मिल्की मुस्तफापुर टोरलपुर, खांड़पर, जकड़पुरा, मानूचक, माणिकपुर, भवानीपुर आदि गांव में रह रही यह आबादी आजादी के 68 वर्ष बाद भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं. पुरानी बाजार निवासी चंदर सहनी ने कहा कि हमारे लिए अभी तक किसी ने कुछ भी नहीं किया है. पंचायत प्रतिनिधियों ने हमारी ओर झांका तक नहीं. हमारे दुख तकलीफ को सुनना विधायक ने भी मुनासिब नहीं समझा. लक्ष्मण सहनी ने कहाकि हमारा मुख्य धंधा मछली मारना है.
गरखै नदी पर गोंदरी पुल के समीप बांध बंध जाने से हमारा पेशा प्रभावित हुआ है. खांड़पर निवासी सुधीर सहनी ने कहा कि हमारी भूख, हमारे कुपोषण की ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया. समीप के गांव कोनीपार में गरीबी और रोग से हमारे एक मछुआरे भाई की मौत हो गयी. किसी ने पीड़ित परिवार के लिए कुछ भी नहीं किया. मिल्की निवासी संजय सहनी कहते हैं हम नाव लेकर नदी निकल पड़ते हैं. मछलियों की खोज में रात-रात भर जगते हैं. नोबेल पुरस्कार विजेता हेमिंग्वे के‘द ओल्ड मैन ऑफ द सी’ के नायक की तरह अक्सर खाली हाथ लौटते हैं.
आज पर है भरोसा
किसी तरह आज का गुजारा हो सके. यही मुख्य चिंता रहती है इसके लिए वे पानी में चारा डाल कर वंशी गिराते हैं. तब जाल डाल कर उसे समेट लेते हैं. उसकी आमदनी से घर का चूल्हा जलता है. महेंद्र सहनी कहते हैं कि हममें से अधिकतर लोग दारू पीते हैं कल की इन्हें चिंता नहीं. बस आज जो सामने हैं उसी पर भरोसा है.
मछुआरों के समक्ष पेयजल संकट
अधिकतर मछुआरों को आज भी पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है. खांड़पर गांव में इनके लिए चापाकल, इंदिरा आवास व शौचालय बनाये जाने की सूचना है. एक मछुआरा परिवार औसतन दो सौ रुपये तक कमा लेते हैं. बरसात के दिनों में आमदनी बढ़ जाती है जबकि गरमी में कभी-कभी दिन-रात की कड़ी मेहनत के बाद भी इनके हाथ एक दिहाड़ी भी नहीं आ पाती है तब वे कर्ज लेते हैं और कर्ज की गिरफत से तब ये कभी मुक्त नहीं होते. कुछ मछुआरे मछली पकड़ने के अपने पारंपरिक पेशे को छोड़ कर अन्य कामकाजों में लग गये हैं. बाप-दादों के मिट्टी फूस के बने घर कभी ईंट की शक्ल ले भी सकेंगे. इन्हें उम्मीद नहीं है. मछुआरों की औसत सिर पर टोकरी लेकर हल्दी, छोहाड़ा, किशमिश आदि गांव-गांव, घर-घर जाकर बेचते हैं. सूर्यगढ़ा, मेदनीचौकी, कजरा या पीरीबाजार में मछली मंडी नहीं है. सूर्यगढ़ा मत्स्यजीवी सहयोग समिति लिमिटेड द्वारा भी इन्हें इनका वाजिब हक नहीं मिल सका.
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
विज्ञापन
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए
विज्ञापन










