आस्था का केंद्र है पारसधाम मंदिर

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 05 Aug 2013 2:17 AM

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कजरा : कजरा थाना अंतर्गत श्रीकिशुन पंचायत के श्रीघना गांव में बिंदेश्वरी प्रसाद गुप्ता के पुत्र पारस गुप्ता के द्वारा निर्मित पारसधाम शिव मंदिर आस्था का जीता जागता उदाहरण है. इस मंदिर के निर्माण की कहानी बयां करते पंचायत के मुखिया श्याम सुंदर पांडेय ने बताया कि पूर्णिमा देवी के चार पुत्रों में एक पुत्र […]

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कजरा : कजरा थाना अंतर्गत श्रीकिशुन पंचायत के श्रीघना गांव में बिंदेश्वरी प्रसाद गुप्ता के पुत्र पारस गुप्ता के द्वारा निर्मित पारसधाम शिव मंदिर आस्था का जीता जागता उदाहरण है.

इस मंदिर के निर्माण की कहानी बयां करते पंचायत के मुखिया श्याम सुंदर पांडेय ने बताया कि पूर्णिमा देवी के चार पुत्रों में एक पुत्र बिंदेश्वरी प्रसाद गुप्ता को छह पुत्री के जन्म के बाद पुत्र प्राप्ति की चिंता सताने लगी. इसे लेकर पूर्णिमा देवी ने भगवान शिव से मन्नत मांगते हुए कहा था कि पुत्र रत्न की प्राप्ति के उपरांत उसी पुत्र की कमाई से भगवान शिव का मंदिर बनवाउंगी.

कालांतर में भगवान ने उनकी प्रार्थना सुन ली और उसी पुत्र पारस गुप्ता द्वारा मंदिर बनाया गया. इसका नाम पारसधाम रखा गया. फरवरी 2007 में निर्मित मंदिर में प्रत्येक साल शिवरात्रि अन्य आयोजनों में मंदिर परिसर को सजा कर धूमधाम से पूजाअर्चना की जाती है. पारस गुप्ता के पिता बिंदेश्वरी प्रसाद गुप्ता ने नौ ग्रहों की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा, मां पार्वती के मंदिर का निर्माण कराया.

इसी साल शिवरात्रि में हनुमान जी की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गयी. बिंदेश्वरी गुप्ता ने बताया कि पारसधाम मंदिर में प्रत्येक साल गरीबों की बेटियों की शादी भोज की व्यवस्था वे पारसधाम मंदिर के तत्वावधान में स्वयं करेंगे. गौ पालन तथा दुध के साथ गाय के मलमूत्र से खाद दवाईयों का निर्माण, गायत्री परिवार की सहायता से कराया जायेगा. वहीं मुखिया ने बताया कि इस धाम को ट्रस्ट में देने का भी प्रयास किया जा रहा है.

* राजा दशरथ ने रानियों के साथ की थी पूजा

लखीसराय : जिले के सूर्यगढ़ा क्षेत्र का धार्मिक ऐतिहासिक सूर्य मंदिर पोखरामा श्रद्धा आस्था का प्रतीक बन गया है. इस मंदिर में प्रतिदिन सैंकड़ों श्रद्धालु शिव गंग में स्नान कर पूजाअर्चना करते है. कहते हैं इससे उनके मन की इच्छा पूर्ति भी होती है. मंदिर की देश राज्यों में विशिष्ट है. मंदिर में पूजाअर्चना करने से विशेष कर पुत्र रत्न स्वास्थ्य की प्राप्ति है.

इस मंदिर में जो भी पुरानी मूर्तियां थीं, सभी चोरी हो गयी हैं. इस मंदिर को पर्यटन स्थल से जोड़े जाने की मांग लखीसराय के निवासी अनिल कुमार सिंह विजुलिया, सूर्य मंदिर सेवा समिति अध्यक्ष राम किशोर सिंह, सचिव उमाशंकर सिंह ने बिहार के पयर्टन मंत्री से की है. कहा जाता है कि बाल्मीकि रामायण के अनुसार अयोध्या के सूर्यवंशी राजा दशरथ थे. उस समय अंग देश के राजा रोम पद अपने रानियों के साथ जा रहे थे.

इसी पोखरामा गांव स्थित जो तालाब में स्नान कर उन्होंने सूर्य की उपासना की थी. वशिष्ठ जी के परामर्श पर राजा दशरथ अपनी रानियों के साथ अंग देश आये.

उन्होंने पूरे परिवार के साथ इसी जगह तालाब में स्नान कर सूर्य मंदिर में पूजाअर्चना कर पुत्र रत्न प्राप्ति की मांग की थी. उसके बाद ऋंगि ऋषि आश्रम गये थे, जो आज भी पहाड़ की तराई में स्थित है. वहीं पोखरामा के आसपास में कई अर्ध निर्मित तालाब सरोवर हैं. इसकी चर्चा कवि चंद्र वरदाई ने अपनी रचना पृथ्वीराज रासो में की है.

इस सरोवर में चार ऋतुओं में चार तरह के कमल खिलते थे. पोखरामा के आसपास जब खुदाई की गयी, तो कई तालाब के शेष भाग मिले. इसकी रामायण में चर्चा भी है. उसी जगह ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर का निर्माण किया गया.

* पंचायतन सूर्य मंदिर : लगता है श्रद्धालुओं का तांता

सूर्यगढ़ा (लखीसराय) : प्रखंड के पोखरामा गांव स्थित पंचायतन सूर्य मंदिर लोक आस्था के केंद्र के रूप में प्रसिद्ध हैं. छठ पूजा के अवसर पर यहां आयोजित होने वाले मेले में दूर दराज के लोग भगवान भाष्कर को अघ्र्य अर्पित करते हैं. बिहार में अपने तरह का यह पहला सूर्य मंदिर है जिसका मुख्य द्वार पूरब की ओर है. यहां पांचों देव एक साथ विराजमान हैं. किऊल जमालपुर रेलखंड के पांच किलोमीटर उत्तर पश्चिम तथा प्रखंड मुख्यालय से दस किमी की दूरी पर स्थित यह मंदिर लोक आस्था का मुख्य केंद्र रहा है. इस मंदिर की स्थापना स्वपA के अधार पर हुई.

मंदिर के गर्भ गृह में भगवान सूर्य नारायण, ईशान कोण में भगवान शंकर, आग्‍नेय कोण में भगवान गणोश, नैत्रक्य कोण में भगवान विष्णु एवं वायव्य कोण में मां दुर्गा विराजमान हैं. यहां भगवान सूर्य के रथ का वजन सात सौ किलोग्राम है. कहा जाता है कि सूर्यगढ़ा में कभी सूर्यवंशी लोंगों का शासन हुआ करता था. यहां सूर्योपासना का विशेष महत्व था. यहां निवास करने वाले सूर्या संप्रदाय के लोग प्रति दिन स्नान कर भगवान सूर्य को जल अर्पित किया करते थे. वर्तमान में भी यहां के लोग स्नान के बाद भगवान सूर्य को जल अर्पित करते हैं.

दूध की पहली धार सूर्य को चढ़ाने का चलन है. प्रत्येक माह शुक्ल पक्ष सष्ठी एवं रविवार को सूर्योपासना का विशेष महत्व है. स्थानीय लोक गीतों में भी पोखरामा गांव के सूर्य मंदिर का वर्णन मिलता है. वर्तमान में 1200 वर्गफीट में बने मंदिर की नींव दो अप्रैल 2000 को पोखराम गांव के राम किशोर सिंह ने रखी. 11 मई 2006 को प्राण प्रतिष्ठा की गयी.

ग्रामीण अनंत सिंह, शंभुनाथ पांडे इत्यादि के मुताबिक छठ के मौके पर यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है. श्रद्धापूर्वक भगवान सूर्य की पूजा से दैहिक एवं भौतिक तापों से मुक्ति मिलती है तथा सर्व कामना की सिद्धि होती है.

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