भभुआ सदर : जिले में चिकित्सा व्यवस्था का हाल बदतर हो चुका है. सरकार का दावा है कि वह आमलोगों को मुफ्त में चिकित्सीय सुविधा सहित दवाएं मुहैया कर रही है. लेकिन, उस चिकित्सीय सुविधा और दवाओं का क्या मतलब जब उसकी जांच करने और मर्ज की दवा लिखनेवालों सहित उस मर्ज की दवा ही न हो. कुछ ऐसा ही हाल सदर अस्पताल भभुआ का है. यहां शहर सहित पूरे जिले में चिकित्सकों व दवाओं की कमी के चलते मरीजों को काफी परेशानी झेलनी पड़ रही है. लोग अस्वस्थ होने के बाद उम्मीद से सरकारी अस्पताल आते हैं. लेकिन, यहां चिकित्सकों व दवा की कमी के चलते उनकी उम्मीद धरी की धरी रह जा रही है.
फिलहाल सदर अस्पताल में दवाओं की घोर किल्लत बनी हुई है. केवल ओपीडी की ही बात करें तो फिलहाल ओपीडी में 33 की जगह मात्र 16 प्रकार की दवाएं उपलब्ध हैं. उसमें भी जरूरी के खुजली के मलहम, कैल्शियम, कान-आंख के ड्रॉप, विटामिन, दर्द आदि की दवाएं कई हफ्तों से गायब है. अस्पताल में फिलहाल बुखार की दवा के अलावे, ओआरएस पाउडर, एंटीबायोटिक, फोलिक एसिड टेबलेट, पारासिटामोल, एमपीसीलिन, फ्लूकोनजोल, कफ सिरप आदि ही मुख्य रूप से मरीजों के लिए उपलब्ध है. अब जिस सरकारी अस्पताल में डॉक्टर व दवा की व्यवस्था नहीं होगी. वहां मरीजों का किस कदर इलाज किया जाता होगा. इसे समझा जा सकता है.
एक डॉक्टर के सहारे चल रहा ओपीडी : वैसे तो सदर अस्पताल सहित जिले में नियमित चिकित्सकों के 114 पद सृजित है. लेकिन, यहां मात्र 46 नियमित चिकित्सक कार्यरत हैं. जबकि, 70 पद अब भी रिक्त हैं. इसी प्रकार संविदा चिकित्सकों के 48 पद में 29 पर ही चिकित्सक कार्यरत हैं. जबकि, 19 पद रिक्त हैं. जिले में चिकित्सकों की कमी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सदर अस्पताल के ओपीडी में मंगलवार को आये सामान्य मरीजों का इलाज एकमात्र डॉक्टर द्वारा किया जा रहा था और उनके द्वारा दोपहर 10:40 बजे तक 200 से अधिक मरीजों का मर्ज जान उनको दवा लिख दी गयी थी. जबकि, मौसम की बेरुखी से बढ़े मरीज के बावजूद ओपीडी में तीन डॉक्टरों की जगह मात्र एक ही डॉक्टर इलाज करते रहे. अब हद यह है कि मंगलवार को जो डॉक्टर ओपीडी संभाल रहे थे, वह भी हड्डी के डॉक्टर हैं, जिनके द्वारा सर्दी जुकाम सहित अन्य रोगों का इलाज किया गया.
सदर अस्पताल का इलाज पड़ रहा मरीजों पर भारी
गौरतलब है कि सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए ग्रामीण तबके के गरीब लोगों सहित आर्थिक रूप से कमजोर लोग ही इलाज के लिए आते हैं और उन्हें मालूम नहीं रहता कि वह जिससे इलाज करा रहे हैं. वह किस मर्ज के डॉक्टर हैं और वैसे डॉक्टर की लिखी दवा से उसका मर्ज ठीक होगा भी या नहीं. वैसे भी अस्पताल इलाज के लिए आनेवाले मरीज गरीब व ग्रामीण इलाके के होते हैं, जिन्हें केवल मुफ्त की इलाज व दवा की जरूरत है. उन्हें इसका भान नहीं रहता कि सरकार की रहनुमाई करनेवाला अस्पताल प्रशासन उनको इलाज व दवा के नाम पर कैसी सुविधा प्रदान कर रहा है. वैसे भी भभुआ का सदर अस्पताल डॉक्टरों व दवाओं की कमी के चलते फिलहाल गंभीर मरीजों के लिए रेफर अस्पताल बना हुआ हैं.
शिकायत से होती हैं अधिकारियों को चिढ़
सदर अस्पताल में दवाओं का अक्सर टोटा बना रहता है. ऐसा नहीं है कि दवा नहीं रहती है. ओपीडी से 10 फर्लांग की दूरी पर ही ड्रग वेयर हाउस स्थापित है और वहां दवाएं भी सभी उपलब्ध है. बीएमसीआईएल से आयी दवाओं की नयी खेप का वेरिफिकेशन भी हो चुका है. इसके बावजूद दवाओं की किल्लत बनी हुई है. इस स्थिति से आजिज कुछ डॉक्टरों ने नाम नहीं छापने के शर्त पर बताया कि उनकी शिकायत से ऊपर के अधिकारियों को चीढ़ होती है. उनका कहना था कि शीर्ष अधिकारियों का स्पष्ट निर्देश है कि किसी भी डॉक्टर को बाहर की दवा नहीं लिखनी है. लेकिन, अस्पताल में दवा भी उपलब्ध नहीं है या दवा है भी तो दूसरे मर्ज से संबंधित है. अब इस आदेश की वजह से वे लोग भी उन्हीं सभी उपलब्ध दवाओं को लिख रहे हैं. अब इन दवाओं से मरीज का फायदा भले ही हो या ना हो. उनका स्पष्ट कहना था कि गंभीर मरीजों के परिजनों के ज्यादा दबाव बनाने पर बाहर की दवा लिख दी जाती है. अगर बाहर की दवा ना लिखा जाये, तो क्या मरीजों को मरने के लिए छोड़ दिया जाये.