प्रकृति के सुकाेमल कवि थे सुमित्रानंदन पंत
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :21 May 2018 6:18 AM (IST)
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गया : माड़नपुर स्थित महाबाेधि विद्यालय में साहित्य महापरिषद की आेर से कविवर सुमित्रानंदन पंत की जयंती व कवि गाेष्ठी मनायी गयी. कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ राम सिंहासन सिंह ने की. महापरिषद के सदस्याें ने पंत जी के तस्वीर पर माल्यार्पण किया. अध्यक्षीय भाषण में डॉ राम सिंहासन सिंह ने कहा कि पंतजी प्रकृति के […]
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गया : माड़नपुर स्थित महाबाेधि विद्यालय में साहित्य महापरिषद की आेर से कविवर सुमित्रानंदन पंत की जयंती व कवि गाेष्ठी मनायी गयी. कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ राम सिंहासन सिंह ने की. महापरिषद के सदस्याें ने पंत जी के तस्वीर पर माल्यार्पण किया. अध्यक्षीय भाषण में डॉ राम सिंहासन सिंह ने कहा कि पंतजी प्रकृति के सुकाेमल कवि थे.
उनका जन्म 20 मई 1900 काे अल्माेड़ा के निकट काैसानी गांव में हुआ था. वह छायावाद के प्रमुख स्तंभाें में एक थे. पंतजी की पहली रचनाएं ‘कागज कुसुम’ व ‘सिगरेट का धुआं’ हैं. इसके बाद ‘वीणा, ग्रंथी, पल्लव, गुंजन, युगांत, युगवाणी, ग्राम्या, स्वर्ण किरण आदि काव्य रचनाएं हैं. उन्हाेंने परी व क्रीड़ा नामक नाटक भी लिखे. परिषद के महामंत्री डॉ सच्चिदानंद प्रेमी ने कहा कि अपनी काव्य यात्रा में कविवर पंत महर्षि अरविंद के दर्शन से प्रभावित प्रतीत हाेते हैं. उनकी विचारधारा में परिवर्तन हाेता है. ‘सुख-दुख’ कविता उनकी इन्हीं विचाराें की आेर इंगित करती है.
दूसरे सत्र में कवि सम्मेलन का आयाेजन किया गया. गजेंद्र लाल अधीर ने पेश किया- ‘प्रीत की रीत सिखा दाे, अनजान नगर अनजान डगर, ताे पहचान करा दाे…’, संजय सहियावी ने पेश किया- ‘आह मन के सुना रहलअ हे काेई, सुन के एकरा ठठा रहल हे काेई…’, सच्चिदानंद प्रेमी ने पढ़ा- ‘ संसद का यह समाजवाद है, बाहर-अंदर सबकुछ सुंदर, घायल केवल जग संवाद है…’ इनके अलावा कुमार कांत, पीयूष राज प्रकाश, डॉ अब्दुल मन्नान, सुरेंद्र पांडेय साैरभ सहित अन्य ने भी अपनी रचनाएं पढ़ीं. धन्यवाद ज्ञापन गजेंद्र लाल अधीर ने किया.
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