शिक्षा के प्रसार मेें कामेश्वर सिंह का योगदान सर्वोपरि
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :29 Nov 2016 4:22 AM (IST)
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जन्मोत्सव. कामेश्वर मेमोरियल लेक्चर में जुटे शहर के लोग कार्यक्रम में विचार रखते डॉ हरीश त्रिवेदी व उपस्थित अतिथि. दरभंगा : महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन की ओर से महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह की जयंती समारोह में व्याख्यान देते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो हरीश त्रिवेदी ने कहा कि बहुल संस्कृति वाले देशों में […]
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जन्मोत्सव. कामेश्वर मेमोरियल लेक्चर में जुटे शहर के लोग
कार्यक्रम में विचार रखते डॉ हरीश त्रिवेदी व उपस्थित अतिथि.
दरभंगा : महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन की ओर से महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह की जयंती समारोह में व्याख्यान देते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो हरीश त्रिवेदी ने कहा कि बहुल संस्कृति वाले देशों में बहुलतावाद को आसानी से समझा जा सकता है. उन्होंने इसे स्पष्ट करते हुए कहा कि प्रारंभ में एक ही था. एक से ही तेज या प्रकाश का जन्म हुआ और यहीं से अनेक या बहुलता का सूत्रपात हुआ. बहुलतावाद या बहुवाद दो अलग-अलग बातें हैं. भारत में विभिन्न धर्मों के लोगों को कनाडा में बसने के बाद अपनी मौलिक संस्कृति की पहचान बनाये रखने के लिए संघर्ष करना पड़ता है.
हावर्ड विश्वविद्यालय बहुलतावाद को स्थापित करने वाला पहला मान्य केंद्र है. कहा कि किसी व्यक्ति या समुदाय को बलात अपनी बात भौतिक रूप से मान लेने के लिए बाध्य किया जा सकता है लेकिन बात या धर्म को कोई अंतरात्मा से स्वीकार करें, इसके लिए तैयार नहीं किया जा सकता.
उन्होंने कहा कि विद्या के प्रसार में महाराजाधिराज का अवदान देश भर में सर्वोच्च है. उन्होंने अलीगढ़ विश्वविद्यालय की स्थापना में महत्ती भूमिका निभायी. उस समय देश के कई राजघराने थे, लेकिन उन सभी में इनका योगदान सबसे उपर नजर आता है. मैथिली भाषा पर बोलते हुए कहा कि इसकी पुनर स्थापना में जॉर्ज ग्रियर्सन के बाद प्रो जयकांत मिश्र का अवदान महत्वपूर्ण मिलता है.
महाराजाधिराज के चित्र पर पुष्पांजलि से आरंभ व्याख्यान में आगत अतिथियों का अभिनंदन प्रो हेतुकर झा ने करते हुए कहा कि 1996 में उन्होंने इसकी नींव डाली थी.लोगों के सहयोग व उत्साहवर्द्धन से अभी तक यह निर्वाध रूप से चला है. आगे भी चलता रहेगा, समारोह की अध्यक्षता करते हुए संस्कृत विवि के पूर्व कुलपति डॉ रामचंद्र झा ने कहा कि मिथिला विद्यामूलक प्रारंभ से ही रहा है. यहां विद्या धन को ही सर्वोपरि माना गया है. धन्यवाद ज्ञापन प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ मानस बिहारी वर्मा ने किया. इपद्मश्री डॉ मोहन मिश्र, संस्कृत विवि के पूर्व कुलपति डॉ देवनारायण झा, डॉ देवनारायण यादव, डॉ मित्रनाथ झा, पंडित कालीकांत मिश्र मौजूद थे.
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