कैंपस-संविधान की समीक्षा जरूरी : पांडेय

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 26 Nov 2015 8:26 PM

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कैंपस-संविधान की समीक्षा जरूरी : पांडेय संस्कृत विवि में संविधान दिवस पर समारोह आयोजितफोटो- 6 व 7परिचय-कासिंदसं विवि के दरबार हॉल में संविधान दिवस पर मंचासीन कासिंदसं विवि के कुलपति व अन्य एवं उपस्थित शिक्षकगण व कार्यालय कर्मी व छात्र-छात्राएं.दरभंगा. कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के दरबार हाल में गुरुवार को विवि प्रशासन की ओर […]

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कैंपस-संविधान की समीक्षा जरूरी : पांडेय संस्कृत विवि में संविधान दिवस पर समारोह आयोजितफोटो- 6 व 7परिचय-कासिंदसं विवि के दरबार हॉल में संविधान दिवस पर मंचासीन कासिंदसं विवि के कुलपति व अन्य एवं उपस्थित शिक्षकगण व कार्यालय कर्मी व छात्र-छात्राएं.दरभंगा. कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के दरबार हाल में गुरुवार को विवि प्रशासन की ओर से यूजीसी के निर्देश के आलोक में संविधान दिवस समारोह आयोजित किया गया. समारोह का आयोजन भारतीय संविधान एवं भारतीय संस्कृति और संस्कृत भाषा विषय पर किया गया. अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना नई दिल्ली के राष्ट्रीय संगठन सचिव डा. बालमुकुंद पांडेय ने बतौर मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए कहा कि संविधान की समीक्षा होनी चाहिए. संविधान कोई वेद या पुराण नहीं है. भारतीय संविधान के निर्माण में 107 विदेशों के संविधान का कटपेस्ट किया गया है. इसमें भारतीय जन जीवन, संस्कृति एवं संस्कृत की उपेक्षा की गयी है. उन्होंने कहा कि यह कितने दुख की बात है कि भारतीय संविधान का अक्षर किसी भारतीय भाषा में नहीं लिया गया. डा. पांडेय ने कहा कि इन्हीं कारणों को देखते हुए स्वयं डा. भीमराव अम्बेदकर ने कहा था कि इसे असुरों ने हड़प लिया है. भारतीय संस्कृति एवं संस्कृत भाषा पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने जो हमें सौंपी है उसे आगे बढ़ाना हम लोगों की जिम्मेवारी है. संस्कृत विद्या एवं मंत्र का कोई विकल्प नहीं है. हमारे गणित में एक पर सोलह शून्यों की गणना लीलावती ग्रंथ में समझी जा सकती है. पहले लिखने का प्रचलन नहीं था अत: बहुत सी चीजे हमें परंपरा से मिलती है. बतौर विशिष्ट अतिथि लनामिवि के कुलपति प्रो. साकेत कुशवाहा ने कहा कि धरती पर सबों को एक सूत्र में पिरोने के लिए एक व्यवस्था की आवश्यकता है. जो व्यवस्था बगैर संविधान के संभव नहीं है. किसी समाज का विकास संविधान के तहत ही संभव है. संविधान के लिखित पंक्तियों के नेपथ्य में जो भाव व परिस्थितियां हैं वो शब्द की मार्यादा में शामिल नहीं हो सका. इसके गौरवशाली इतिहास की अनुभूति कर आगे बढ़ने की प्रेरणा लेने की जरूरत है. कासिंदसं विवि के प्रोवीसी डा. नीलिमा सिंहा ने संविधान दिवस मनाने की दृष्टि की सराहना करते हुए इसे आमजनों के लिए लाभकारी बताया. जाले के भाजपा विधायक जीवेश कुमार ने कहा कि संस्कृत के सहारे ही राष्ट्र की एकता और अखंडता संभव है. उन्होंने कहा कि संस्कृत, संस्कृति एवं संस्कार तीनों एक चक्र में घुमती है. संस्कृत से ही संस्कृति है तथा संस्कृति से ही संस्कार आता है. यदि संस्कृत को मजबूत किया जाये तो हम स्वत: मजबूत हो जायेंगे. अध्यक्षीय भाषण करते हुए आयोजक कासिंदसं विवि के कुलपति डा. देवनारायण झा ने कहा कि वसुधैव कुटुम्बकम की उद्घोषणा करनेवाली धरती भारत सबों को जोड़ने का काम करती है. यहां की संस्कृति बहुजन सुखा बहुजन हिताय की है. हम सभी भारतीय इसी पृथ्वी के सन्तान हैं. उन्होंने कहा कि भारत की प्रतिष्ठा संस्कृत और संस्कृति में है. वहीं राष्ट्र जीवित माना जाता है .जहां उसकी अपनी संस्कृति प्रस्तुत होती रहे. भारतीय वैदिक संस्कृति ही ऐसी है जिसमें विश्व को एक बनाने की क्षमता है. समारोह को वित्तीय परामर्शी राकेश कु मार मेहता, कुलानुशासक डा. चौठी सदाय, लनामिवि प्राचीन इतिहास विभागाध्यक्ष डा. मदन मोहन मिश्र, अपने विश्वविद्यालय के मदन प्रसाद, बबिता कुमारी आदि ने संबोधित किया. कार्यक्रम का संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन कुलसचिव डा. सुरेश्वर झा ने सफलतापूर्वक आयोजन में सहयोग करने वालों में डा. श्रीपति त्रिपाठी, डा. विद्येश्वर झा,डा. शशिनाथ झा, डा. विनय कुमार, डा. शिवकांत झा, डा. सत्यवान, डा. लक्ष्मी नाथ झाके अलावा गोपाल उपाध्याय, डा. रीता सिंह आदि शामिल थे.

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