बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा गजरही डेरा

बच्चे स्कूल के बजाय खेल कर गुजारते हैं समय शिक्षा के अभाव में जगह-जगह दिखता जुआड़ियों का झुंड सिर्फ चुनाव के समय ही सुध लेने आते हैं जनप्रतिनिधि व नेता बक्सर : इटाढ़ी प्रखंड का गजरही डेरा गांव बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है. प्रखंड मुख्यालय से आठ किलोमीटर दूर स्थित यह गांव 1050 […]
बच्चे स्कूल के बजाय खेल कर गुजारते हैं समय
शिक्षा के अभाव में जगह-जगह दिखता जुआड़ियों का झुंड
सिर्फ चुनाव के समय ही सुध लेने आते हैं जनप्रतिनिधि व नेता
बक्सर : इटाढ़ी प्रखंड का गजरही डेरा गांव बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है. प्रखंड मुख्यालय से आठ किलोमीटर दूर स्थित यह गांव 1050 जनसंख्यावाला गांव है और आजादी के बाद से अब तक यहां विकास की किरण नहीं पहुंची है. न तो यहां पढ़ने के लिए पाठशाला है और न ही चलने के लिए सड़क.
यहां अगर है, तो देसी शराब की शराब भट्ठी, जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों को नशे की लत लगा रही है. शिक्षा के अभाव में और कामकाज न मिलने से लोग ताश खेल कर समय गुजारते हैं और जगह-जगह जुआड़ियों का झुंड भी गांव में बैठे मिलता है.
पढ़ने के लिए नहीं हैं स्कूल : शिक्षा का हालत इस गांव में सबसे बुरा है. यहां के लोगों को पढ़ने की सुविधा नहीं है और न अभिभावकों को बच्चों की पढ़ाने की चिंता रहती है. आंकड़े देखें, तो मैट्रिक पास लोगों की संख्या दर्जन से अधिक नहीं होगी. बरसात के दिनों में यहां के लोगों को नारकीय जीवन जीने के लिए विवश होना पड़ता है. यहां से दो किलोमीटर दूर एक प्राथमिक विद्यालय बसांव खुर्द गांव में स्थापित है, जहां जाकर बच्चे पढ़ते हैं. स्कूल की दूरी ज्यादा रहने के कारण अधिकतर बच्चे गांव में ही खेलकूद कर बड़े हो जाते हैं और अनपढ़ रह जाते हैं.
हाल में खुला है आंगनबाड़ी केंद्र : हाल ही में इस गांव में एक आंगनबाड़ी केंद्र खुला है, मगर अब तक उस आंगनबाड़ी केंद्र के लिए कोई स्थायी जगह नहीं मिल सकी है. आंगनबाड़ी केंद्र भी यहां ठीक से नहीं चलता, लेकिन छोटे-छोटे बच्चों को शिक्षा की ओर ले जाने में उसकी भूमिका सकारात्मक नजर आ रही है. महात्मा गांधी रोजगार योजना के अंतर्गत यहां के लोगों को कुछ रोजगार मिला है, मगर गांव के अन्य लोगों को रोजगार न मिलने से तंगहाली में जीना पड़ रहा है.
जनप्रतिनिधि पूरी तरह हैं उदासीन
जनप्रतिनिधि भी इस गांव के प्रति पूरी तरह उदासीन हैं. इस गांव की सुविधाओं को लेकर कभी ध्यान नहीं देते न ही प्रखंड के कोई अधिकारी या कर्मचारी ही गांव में कभी दर्शन देते हैं. चुनाव का मौसम आता है, तो नेताओं की यहां धमा चौकड़ी होने लगती है, मगर कोई भी सकारात्मक पहल नहीं होती.
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