बंधुआ मजदूरों जैसी हालत!

आरा : भारतीय रेलवे को जितनी आमदनी मालों की ढुलाई से होती है, उतनी यात्रियों के टिकट से नहीं. यह सर्वविदित सच है़ लेकिन, मालगाड़ियों से माल की लोडिंग एवं अनलोडिंग करनेवाले पलदार मजदूरों की स्थिति बंधुआ मजदूर से भी बदतर है़ आये दिन राजनीतिक पार्टियां अपने घोषणा पत्रों में सबसे पहले मजदूर एवं किसानों […]
आरा : भारतीय रेलवे को जितनी आमदनी मालों की ढुलाई से होती है, उतनी यात्रियों के टिकट से नहीं. यह सर्वविदित सच है़ लेकिन, मालगाड़ियों से माल की लोडिंग एवं अनलोडिंग करनेवाले पलदार मजदूरों की स्थिति बंधुआ मजदूर से भी बदतर है़ आये दिन राजनीतिक पार्टियां अपने घोषणा पत्रों में सबसे पहले मजदूर एवं किसानों के विकास करने के वादे करते हैं.
बावजूद इन पलदार मजदूरों को आज तक किसी राजनीतिक दलों ने इनकी सुध नहीं ली है़ आरा रेलवे माल गोदाम में लगभग 400 पलदार मजदूर हैं, उनमें आधे से अधिक मजदूर सांस व खांसी की बीमारी से ग्रसित हैं. कई मजदूरों की टीबी जैसी घातक बीमारी से मौत हो चुकी है़ जबकि दो दर्जन मजदूरों की उम्र 60 वर्ष से ऊपर है, किंतु ये केंद्र या राज्य सरकार की किसी भी मजदूर हित की योजनाओं से लाखों कोस दूर हैं. इन्हें यह भी पता नहीं है कि श्रम विभाग क्या बला है़ मजदूरों को किसी प्रकार की सुरक्षा के उपकरण अथवा स्वास्थ्य संबंधी जानकारियां नहीं दी जाती है़ं
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