हाल-ए-शहर. बदहाल और बंद पड़े हैं शहर के सार्वजनिक शौचालय
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :03 Mar 2016 1:36 AM (IST)
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शौचालय देखिये अौर लौट जाइये गांवों को खुले में शौच मुक्त बनाने की जद्दोजहद चल रही है, लेकिन शहरों में सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति बदतर है. यात्री व शहर के लोग खुले में शौच को विवश हैं. बांका : कहने को तो बांका जिला मुख्यालय शहर है. विभिन्न दफ्तरों और सरकारी संस्थानों या दूसरे कामकाज […]
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शौचालय देखिये अौर लौट जाइये
गांवों को खुले में शौच मुक्त बनाने की जद्दोजहद चल रही है, लेकिन शहरों में सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति बदतर है. यात्री व शहर के लोग खुले में शौच को विवश हैं.
बांका : कहने को तो बांका जिला मुख्यालय शहर है. विभिन्न दफ्तरों और सरकारी संस्थानों या दूसरे कामकाज के लिए जिले भर के और जिले के बाहर से भी रोजाना हजारों लोगों का यहां आना जाना लगा रहता है. 3-4 यात्री वाहन पड़ाव यहां हैं. शहर की भी आबादी दिनोंदिन बढ़ती ही चली जा रही है.
बाजार और व्यावसायिक कारोबार का दायरा भी बढ़ा है. इन सबके बीच यहां नागरिक सुविधाओं का अपेक्षित विस्तार नहीं हो पाया. जितना हुआ, वह भी उपेक्षा और लापरवाही की वजह से निर्माण के साथ ही दम तोड़ता चला गया. जो किसी तरह बच गये, वे भी आज किसी उपयोग लायक नहीं रह गये हैं. बात हम शहर के सार्वजनिक स्नानागारों एवं शौचालयों की कर रहे हैं.
एक दशक पूर्व बने थे शौचालय व स्नानागार
एक दशक पूर्व शहर के आधे दर्जन प्रमुख स्थानों पर सार्वजनिक शौचालय एवं स्नानागारों का निर्माण हुआ. इनमें निर्माण के समय टाइल्स और फव्वारे भी लगे. यहां के लोगों को लगा बांका सचमुच शहर बन गया है. लेकिन उन्हें यह विश्वास होते होते की बांका सचमुच का शहर बन गया है, उनके विश्वास का सबब ही ध्वस्त हो गया. ज्यादातर शौचालय और स्नानागार रखरखाव के अभाव में आवारा जानवरों का बसेरा बन गये.
जो नहीं बने वो गंदगी का पर्याय बन गये. इन्हें कोई देखने वाला नहीं रहा. जिन्हें इन्हें देखने की जिम्मेदारी थी, वे पल्ला झाड़ गये. बाद में कुछ स्थानीय श्रमिकों ने इनमें से दो एक का प्रबंधन अपने हाथ में लिया. मेहनत की और रखरखाव के बाद स्वरोजगार का इसे जरिया बनाया, तो ये किसी तरह बच गये. लेकिन उनकी ढहती ही दीवारों को वे बचा नहीं पाये. इन स्थितियों के बाद भी ठेका राज की बदौलत ऐसे शौचालय बनते रहे और बिगड़ते रहे. संबंधित विभाग भले ही आज खुले में शौच मुक्त गांव की बात कर रहा हो, सच यह है कि बांका शहर में समुचित बंदोबस्त नहीं होने की वजह से आज भी बड़े पैमाने पर लोग खुले में शौच त्यागने पर विवश हैं.
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