ज्योतिष शास्त्र: कुण्डली में छिपे हैं धनवान बनने के राज, जानें आपकी किस्मत में राजयोग है या दरिद्र योग?

Published by :Radheshyam Kushwaha
Published at :04 Feb 2026 10:10 PM (IST)
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Astrology

राजयोग

जन्म कुंडली में ग्रहों की विशेष चाल ही यह तय करती है कि व्यक्ति राजा जैसा जीवन जिएगा या संघर्षपूर्ण. आइए जानते हैं कुंडली के उन गुप्त राजयोग और धन योग के बारे में, जो रंक को भी राजा बनाने की शक्ति रखते हैं.

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ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, व्यक्ति की आर्थिक स्थिति और सामाजिक मान-प्रतिष्ठा उसकी जन्म कुंडली में मौजूद ग्रहों की युति पर निर्भर करती है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, व्यक्ति की कुंडली में राजयोग होने पर जातक को जीवन में सत्ता, सम्मान और सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त होती हैं. यदि जन्म कुंडली में 4 या उससे अधिक ग्रह अपनी उच्च राशि में होते हैं, तो वैसे लोग राजा के समान सुख भोगता है.

जब 10वें भाव का स्वामी चौथे भाव में और चौथे भाव का स्वामी 10वें भाव में बैठकर एक-दूसरे से जगह बदल लें, और उन पर 5वें या 9वें भाव के स्वामियों की नजर हो, तो यह एक शक्तिशाली राजयोग बनाता है.

जब कुंडली के केंद्र भाव 1, 4, 7, 10 में शुभ ग्रह विराजमान हों और 3, 6, 11वें भाव में क्रूर या अशुभ ग्रह स्थित हों, तो यह एक उत्तम राजयोग का निर्माण होता है, जो जातक को शत्रुओं पर विजय और अपार सफलता दिलाता है.

कुंडली के पांचवें भाव का स्वामी जब पहले, चौथे या दसवें भाव में स्थित हो और वहां वह लग्नेश या भाग्येश के साथ युति बनाए, तो अत्यंत शुभ राजयोग का निर्माण होता है.

कुंडली में धन योग

कुंडली में लग्नेश (मंगल), कर्मेश (शनि) और भाग्येश (गुरु) पंचम भाव में हों, तो वह व्यक्ति महाधनी होता है.

ग्रहों का राजा सूर्य पंचम भाव में और देवगुरु-चंद्र एकादश (11वें) भाव में हों, तो उस व्यक्ति को प्रचुर धन संपत्ति प्राप्त होती है.

जब कुंडली के दूसरे भाव (धन भाव का स्वामी) और लाभेश (11वें भाव का स्वामी) आपस में स्थान परिवर्तन करते हैं, तो यह महाधन योग कहलाता है.

एकादश भाव के स्वामी का संबंध 4, 5, 7, 9 या 10वें भाव के स्वामियों से हो, तो वह व्यक्ति अपनी मेहनत से अपार धन कमाता है.

कुंडली का दूसरा भाव का संबंध यदि 4, 5, 7, 9 या 10वें भाव के स्वामियों से हो, तो उस व्यक्ति को पैतृक संपत्ति का बड़ा लाभ मिलता है.

कुंडली में दरिद्र योग

कुंडली के कुछ अशुभ योग व्यक्ति को दरिद्रता और संघर्ष की ओर ले जाते हैं.

जब लग्नेश 6, 8, या 12वें भाव में होकर मारक ग्रहों के प्रभाव में हो, तो दरिद्र योग का निर्माण ह

धन भाव का स्वामी कुंडली के 12वें भाव में चला जाए और वहां वह बुरे या शत्रु ग्रहों के प्रभाव में हो, तो यह धन दोष बनाता है.

जब बुद्धि और भाग्य के स्वामी ग्रह कुंडली के खराब घरों यानी 6वें, 8वें या 12वें भाव में बैठ जाते हैं और उन पर अशुभ ग्रहों की नजर होती है, तो व्यक्ति का भाग्य उसका साथ नहीं देता है.

जब दूसरे, चौथे और ग्यारहवें भाव पर शनि, मंगल या राहु जैसे क्रूर ग्रहों की दृष्टि पड़ती है, तो संचित धन का नाश होता है.

ज्योतिषाचार्य चंद्रशेखर सहस्त्रबाहु:
ज्योतिष एवं हस्त रेखा विशेषज्ञ | 12 साल का अनुभव
Mo- +91 8620920581

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Radheshyam Kushwaha

लेखक के बारे में

By Radheshyam Kushwaha

पत्रकारिता की क्षेत्र में 13 साल का अनुभव है. इस सफर की शुरुआत राज एक्सप्रेस न्यूज पेपर भोपाल से की. यहां से आगे बढ़ते हुए समय जगत, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान न्यूज पेपर के बाद वर्तमान में प्रभात खबर के डिजिटल विभाग में धर्म अध्यात्म एवं राशिफल डेस्क पर कार्यरत हैं. ज्योतिष शास्त्र, व्रत त्योहार, राशिफल के आलावा राजनीति, अपराध और पॉजिटिव खबरों को लिखने में रुचि हैं.

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