Guru Ravidas Jayanti 2026: संत रविदास हैं ज्ञान, प्रेम और समानता के प्रतीक
Published by : Shaurya Punj Updated At : 01 Feb 2026 1:33 PM
संत रविदास का जीवन परिचय
Guru Ravidas Jayanti 2026: संत रविदास का जीवन ज्ञान, भक्ति और समानता का प्रतीक रहा. उनके पदों में प्रेम, मन की पवित्रता और गुरु की महत्ता पर जोर मिलता है.
कृष्ण प्रसाद सिंह
(फैजाबाद, अयोध्या)
Guru Ravidas Jayanti 2026:संत रविदास को भले ही लोग रैदास, रोहिदास, रेमदास या रौदास के नाम से जानते हों, लेकिन उनके जीवन का मुख्य परिचय उनके संतत्व और भक्ति से जुड़ा है. वे भक्ति और ज्ञान के उस मार्ग के अग्रदूत थे, जो निराकार ईश्वर में विश्वास करता है, जाति और कर्मकांड को नकारता है और मन की पवित्रता, प्रेम और गुरु की महत्ता को सबसे ऊपर मानता है.
संत रविदास का जन्म और परिवार
संत रविदास का जन्म विक्रम संवत 1441 से 1455 के बीच किसी रविवार को हुआ माना जाता है. उनका जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में मंडेसर तालाब के पास मांडव ऋषि के आश्रम के पास मांडुर गांव में हुआ था. यह गांव अब मंडुआडीह के नाम से जाना जाता है.
उनके पिता को संतोषदास, रग्धू या राघव कहा जाता था, जबकि माता का नाम कलसां या करमा था. जीवनसंगिनी लोना थीं. रविदास के कई नाम प्रचलित हैं—रैदास, रविदास, रोहिदास, रडदास, रायादास, रेदास, रेमदास और रौदास. इन सभी नामों में उनका संत का परिचय सबसे ऊपर है, जिसे खुद संत कबीर ने मान्यता दी थी. कबीर ने उन्हें “संतन में अग्रणी” कहा और कुछ विद्वान उन्हें कबीर का आध्यात्मिक शिष्य भी मानते हैं.
गुरु और भक्ति का महत्व
रविदास का जीवन गुरु भक्ति और ईश्वर प्रेम से भरा रहा. वे मानते थे कि ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सही मार्ग गुरु के माध्यम से ही संभव है. उनके अनुसार, “परम परस गुरु भेटिए, पूरब लिखत लिलाट. उन मन मन मन ही मिले छुटकत बजर कपाट.” अर्थात गुरु ही हमारे लिए वज्र के दरवाजे खोल सकता है और उसके बिना ईश्वर से मिलना संभव नहीं.
संत रविदास का मानना था कि मन की पवित्रता सबसे जरूरी है. उन्होंने कहा, “मन चंगा तो कठौती में गंगा.” इसका मतलब यह है कि अगर मन शुद्ध है तो हर जगह ईश्वर का वास महसूस होता है.
प्रेम और निष्कपटता
रविदास के लिए प्रेम सर्वथा निःस्वार्थ और निर्मल होना चाहिए. उन्होंने इसे बड़े सरल शब्दों में समझाया:
“रैदास प्रेम नहिं छिप सकड़, लाख छिपाए कोय. प्रेम न मुख खोले कभऊं, नैन देत हैं रोय.”
इसका अर्थ है कि सच्चा प्रेम कभी छिपाया नहीं जा सकता और इसे दिल से महसूस किया जाता है.
उनके भजनों और दोहों में ज्ञान, प्रेम, सरलता और व्यावहारिकता सभी मौजूद हैं. उनके चालीस से अधिक पद सिखों के गुरु ग्रंथ साहिब में भी शामिल किए गए हैं.
रविदासिया धर्म और सिख धर्म से जुड़ाव
संत रविदास की शिक्षाओं से रविदासिया धर्म का विकास हुआ, जो अपनी एकेश्वरवादी, मानवतावादी और समतावादी सोच के लिए जाना जाता है. 2009 के बाद यह धर्म एक अलग पंथ के रूप में उभरा. रविदासिया अनुयायी अपनी मान्यताएं हिंदू और सिख धर्म दोनों से साझा करते हैं. वे अपने गुरु के रूप में रविदास को सर्वोच्च मानते हैं और उनकी शिक्षाओं को सर्वोपरि मानकर जीवन में अपनाते हैं. उनका विश्वास है कि सभी का ईश्वर एक है और मानवता में समानता सर्वोपरि है.
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ज्ञान और शिक्षा की भूमिका
संत रविदास का जीवन ज्ञानाश्रयी था. उनके पदों और भजनों में न केवल भक्ति और प्रेम है, बल्कि लोगों को जीवन में सही मार्ग अपनाने और समाज में सुधार करने की सीख भी मिलती है. उन्होंने जाति, कर्मकांड और मूर्तिपूजा का विरोध करते हुए सरल और व्यावहारिक जीवन जीने की प्रेरणा दी. उनकी शिक्षाओं का प्रभाव न केवल धर्म और भक्ति तक सीमित रहा, बल्कि सामाजिक समानता और मानवता के संदेश के रूप में भी फैला. उनके भजनों और दोहों ने लोगों को निष्कपट प्रेम, ज्ञान और आंतरिक शांति का मार्ग दिखाया.
संत रविदास का जीवन आज भी लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है. उन्होंने सिखाया कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए सच्चा गुरु, निर्मल मन और निष्कपट प्रेम जरूरी हैं. उनका संदेश जाति, धर्म या सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर समानता और मानवता को महत्व देता है. आज उनके अनुयायी उनके मार्ग का अनुसरण करते हैं, उनकी शिक्षाओं को फैलाते हैं और समाज में समानता, प्रेम और आध्यात्मिक चेतना का संदेश देते हैं. संत रविदास न केवल एक महान संत थे, बल्कि एक ऐसे समाजदर्शी भी थे, जिन्होंने भक्ति, ज्ञान और मानवता को जीवन का मूल आधार बनाया.
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By Shaurya Punj
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