दशहरा: कठिन था लंका में प्रवेश करना, फिर श्री राम ने ऐसे की चढ़ाई, जानें उनके सहयोगियों के बारे में

Updated at : 23 Oct 2023 3:36 PM (IST)
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Dussehra-2024

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दशहरा के दिन ही प्रभु श्रीराम ने रावण का वध कर युद्ध में जीत हासिल की थी. कहते हैं कि रावण को हराने से पहले लंका में प्रवेश करना ही सबसे कठिन कार्य था.

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हिंदू धर्म में दशहरा यानी विजयादशमी का विशेष महत्व है. हर साल आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी को मनने वाला यह पर्व अधर्म पर धर्म की जीत और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है. दशहरा के दिन ही प्रभु श्रीराम ने रावण का वध कर युद्ध में जीत हासिल की थी. कहते हैं कि रावण को हराने से पहले लंका में प्रवेश करना ही सबसे कठिन कार्य था. बावजूद इसके प्रभु श्रीराम ने वानर सेना की मदद से लंका पर चढ़ाई की. कल दशहरा है. इस अवसर पर जानें प्रभु श्रीराम के प्रमुख सहयोगियों के बारे में …

हनुमान

प्रभु श्रीराम के परम भक्त हनुमान जी शिव जी के रुद्रावतार माने जाते हैं. मान्यता है कि हनुमान जी का जन्म प्रभु श्रीराम की सहायता के लिए हुआ था. प्रभु श्रीराम के सबसे बलशाली व परम भक्त हनुमान जी का वर्णन रामायण में स्पष्ट है. कहते हैं कि धरती पर अगर कोई ईश्वर है, तो वह केवल श्रीराम भक्त हनुमान. भगवान राम व हनुमान जी की वीरता की अनेक कथाएं प्रचलित हैं. एक कथा के अनुसार, प्रभु श्रीराम व हनुमान जी में सिर्फ भक्त का ही नहीं, बल्कि भाई का रिश्ता भी रहा है. हनुमान जी ने ही प्रभु श्रीराम की अंगूठी लेकर समुद्र को पार करने के बाद उसे माता सीता को दिया था. इन्होंने ही मेघनाथ के पुत्र अक्षय का वध कर लंका दहन किया. विभीषण व सुग्रीव को प्रभु श्रीराम से मिलवाया

संपाती और जटायु

रामायण के अनुसार, जब माता सीता का अपहरण कर रावण पुष्पक िवमान पर सवार होकर वन से गुजर रहा था, तो सीता जी की आवाज गिद्धराज जटायु के कानों में पड़ी. जटायु ने रावण को ललकारते हुए रास्ता रोक लिया. माता सीता को बचाने के लिए जटायु व रावण के बीच भयंकर संघर्ष हुआ, लेकिन रावण ने तलवार से जटायु के पंख काट दिये, जिससे वह मरणासन्न स्थिति में जमीन पर आ गिरे. उनको प्रभु श्रीराम की राह में शहीद होने वाला पहला सैनिक माना जाता है. जटायु ने भगवान राम को पूरी कहानी सुनायी और यह भी बताया कि रावण किस दिशा में गया है. वहीं, संपाती ने अंगद को रावण द्वारा सीताहरण की पुष्टि की थी. संपाती ने ही दूरदृष्टि से देख बताया था कि माता सीता अशोक वाटिका में सुरक्षित बैठी हैं.

सुग्रीव

सुग्रीव बाली के भाई थे और किष्किन्धा में रहते थे. वह प्रभु श्रीराम के परम मित्र थे. सीताहरण के बाद सीताजी को ढूंढते हुए जब प्रभु श्रीराम किष्किन्धा पहुंचे, तब हनुमान जी ने सुग्रीव की मित्रता प्रभु श्रीराम से करायी थी. रामायण के अनुसार, बाली ने सुग्रीव की पत्नी और उनकी संपत्ति हड़पकर उनको राज्य से बाहर कर दिया था. ऐसी स्थिति में बाली से युद्ध के लिए सुग्रीव को प्रभु श्रीराम की जरूरत थी और प्रभु श्रीराम को माता सीता की खोज के लिए वानर सेना की जरूरत थी. इस प्रकार दोनों ने मित्रता करके एक-दूसरे की मदद करने का संकल्प लिया. सुग्रीव के आग्रह पर प्रभु श्रीराम ने बाली का वध कर उन्हें किष्किंधा का राजा बनाया था. वहीं, रावण से युद्ध के लिए सुग्रीव ने ही वानर सेना गठित की थी.

अंगद

प्रभु श्रीराम की सेना में सुग्रीव के साथ वानर राज बाली के पुत्र अंगद भी शामिल थे. युद्ध के पूर्व भगवान श्रीराम ने हनुमान जी के बाद अंगद को ही अपना दूत बनाकर लंका भेजा था, ताकि सुलह हो और युद्ध टाला जा सके. लंका में उन्होंने अपना पैर जमाकर अपनी शक्ति का परिचय दिया था. अंगद ने वहां रावण को जो उपदेश दिया था, वह काफी अनूठा था. कहते हैं कि अंगद भी हनुमान जी की तरह पराक्रमी और बुद्धिमान थे. हनुमान जी और जामवंत की तरह ही वह भी प्राण विद्या में पारंगत थे. इस प्राण विद्या के बल पर वह कुछ भी कर सकते थे. प्रभु श्रीराम की सेना में अंगद ने काफी पराक्रम दिखाया था. माता सीता की खोज में वानर सेना का नेतृत्व अंगद ने ही किया था. युद्ध में इनकी अहम भूमिका थी.

जामवंत

रावण से युद्ध के समय ऋक्षराज जामवंत भगवान राम की सेना के सेनापति थे. उन्होंने बड़े-बड़े राक्षसों का वध भी किया. माता सीता की खोज के लिए इन्होंने ही समुद्र पार कर लंका जाने के लिए हनुमान जी को उनका बल याद दिलाया था, मगर बहुत कम ही लोग जानते हैं कि वे भगवान ब्रह्मा के अवतार हैं, जिन्हें पौराणिक कथाओं के अनुसार अमर होने का वरदान है. रामायण के अनुसार, प्रभु श्रीराम ने जामवंत को ही शिवलिंग स्थापना के समय रावण को आचार्यत्वव का निमंत्रण देने के लिए लंका भेजा था. साथ ही जामवंत प्रभु श्रीराम व रावण के युद्ध के समय योजना बनाने, कोई विपत्ति आने पर उसका हल निकलने जैसे कार्य किया करते थे. इनकी बुद्धिमता के कारण ही भगवान विष्णु के अवतार प्रभु श्रीराम को काफी मदद मिली.

लक्ष्मण :

प्रभु श्रीराम के अनुज लक्ष्मण शेषनाग के अवतार थे. वह अपनी पत्नी उर्मिला से 14 वर्ष तक दूर रहे. लक्ष्मण के बगैर प्रभु श्रीराम न तो सीता माता को ढूंढ पाते और न ही वे युद्ध की तैयारी कर पाते. लक्ष्मण एक श्रेष्ठ धनुर्धर थे और वे पाशुपताशस्त्र का संधान करना जानते थे. लक्ष्मण प्रभु श्रीराम के प्रिय भाई थे. जब प्रभु राम और माता सीता 14 वर्ष का वनवास के लिए गये, तब लक्ष्मण भी उनके साथ वनवास गये थे. दूसरे शब्दों में कहा जाए, तो लक्ष्मण जी ने अपने भाई प्रेम में अपने जीवन को त्याग दिया था. एक अन्य कथा के अनुसार, प्रभु श्रीराम और माता सीता की सेवा के लिए लक्ष्मण ने निद्रा देवी से वरदान मांगा कि पूरे वनवास के 14 वर्षों तक उन्हें नींद नहीं आये. नींद की देवी ने लक्ष्मण जी के सेवाभाव से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दे दिया, लेकिन एक शर्त भी रखी कि लक्ष्मण के बदले उनकी पत्नी उर्मिला को 14 वर्षों तक सोना होगा. इसी कारण लक्ष्मण जी के बदले उनकी पत्नी उर्मिला 14 वर्षों तक राजभवन में सोती रहींं. वहीं, भीषण युद्ध में लक्ष्मण जी ने ही अपने घातक बाण से मेघनाद का सिर उसके धड़ से अलग कर दिया था और उस सिर को प्रभु श्रीराम के चरणों में रख दिया था.

नल और नील

युद्ध के समय नल और नील ने ही समुद्र पर लंका तक सेतु बनाने में मदद की थी. यह पुल पांच दिनों में ही बनकर तैयार हो गया. कथाओं के अनुसार, नल व नील जब छोटे थे, तो ऋषि-मुनियों को बहुत परेशान करते थे. इन दोनों से परेशान ऋषि-मुनियों ने तंग आकर इन्हें शाप दिया था कि जो भी चीज यह पानी में फेकेंगे वह डूबेगी नहीं. आगे चलकर यही शाप इनके लिए वरदान साबित हुआ.

गरुड़

युद्ध में गरुड़ ने भी अहम भूमिका निभायी. जब मेघनाथ ने प्रभु श्रीराम से युद्ध करते हुए उन्हें नागपाश से बांध दिया, तब देवर्षि नारद के आग्रह पर गरुड़ ने नागपाश के समस्त नागों को खाकर भगवान राम को नागपाश के बंधन से मुक्त कराया था. हालांकि, प्रभु श्रीराम के इस तरह नागपाश में बंध जाने पर श्रीराम के भगवान होने पर गरुड़ को संदेह हो गया था. अंत में काकभुशुण्डिजी ने प्रभु राम की पवित्र कथा सुना कर गरुड़ के संदेह को दूर किया था.

सुषेण वैद्य

युद्ध के समय मेघनाथ के तीर से लक्ष्मण जी घायल होकर मूर्छित हो गये थे. लक्ष्मण जी की ऐसी दशा देख प्रभु श्रीराम विलाप करने लगे. तब सुषेण वैद्य को बुलाया गया. सुषेण प्रभु श्रीराम से बोले-लक्ष्मण जी के मुंह पर मृत्यु-चिह्न नहीं है, इसलिए निश्चिंत रहें. आप संजीवनी बूटी की व्यवस्था करें. तब हनुमान जी यह बूटी लेकर आये. यदि सुषेण वैद्य नहीं होते, तो लक्ष्मण जी जिंदा नहीं रहते और यदि उनका निधन हो जाता, तो संभवत: प्रभु श्रीराम यह युद्ध रोक कर पुन: लौट जाते.

विभीषण

प्रभु श्रीराम के एक और अनन्य भक्त थे विभीषण. वह रावण के भाई थे. रामायण के अनुसार,रावण के दस सिर थे. जिस सिर को राम अपने बाण से काट देते थे, पुन: उसके स्थान पर दूसरा सिर उभर आता था. प्रभु श्रीराम द्वारा तमाम कोशिश के बाद भी जब रावण नहीं मरा, तो वानर सेना में चिंता छा गयी. दरअसल, रावण ने अमरत्व प्राप्ति के उद्देश्य से ब्रह्मा जी की तपस्या कर वर मांगा, लेकिन उन्होंने उसके इस वरदान को न मानते हुए कहा था कि तुम्हारा जीवन नाभि में रहेगा. यही कारण था कि वानर सेना पर रावण भारी पड़ने लगा था. ऐसे में विभीषण ने प्रभु श्रीराम को यह राज बताया कि रावण का जीवन उसकी नाभि में है. तब प्रभु श्रीराम ने रावण की नाभि में तीर मारकर उसका वध किया.

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