परमा एकादशी 2026 कथा: श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया व्रत का महत्व, जानें सुमेधा-पवित्रा और कुबेर की पौराणिक कथा
परमा एकादशी व्रत कथा
Parama Ekadashi 2026: परमा एकादशी 2026 अधिकमास में आने वाली अत्यंत पुण्यदायी एकादशी है. जानें इसकी तिथि, शुभ मुहूर्त, व्रत विधि, पारण समय और धार्मिक महत्व.
Parama Ekadashi 2026 Katha: आज, 11 जून 2026 को अधिकमास की पावन परमा एकादशी मनाई जा रही है. सनातन धर्म में इस एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है. मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की उपासना, व्रत और परमा एकादशी की कथा श्रवण करने से पापों का नाश होता है, दरिद्रता दूर होती है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है.
पद्मपुराण में वर्णित इस एकादशी को कमला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. यह एकादशी केवल अधिकमास में आती है, इसलिए इसे अत्यंत दुर्लभ और पुण्यदायी माना गया है.
युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा परमा एकादशी का महत्व
पौराणिक कथा के अनुसार, धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि अधिकमास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी कौन-सी है और इसका क्या फल प्राप्त होता है. उन्होंने यह भी जानना चाहा कि इस व्रत को किस प्रकार करना चाहिए जिससे मनुष्य पापों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त कर सके.
भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि शुक्ल या कृष्ण पक्ष में आने वाली किसी भी एकादशी का त्याग नहीं करना चाहिए, क्योंकि सभी एकादशियां मोक्ष प्रदान करने वाली होती हैं. उन्होंने बताया कि अधिकमास की दोनों एकादशियां—पद्मिनी एकादशी और परमा एकादशी—विशेष फलदायी हैं. पद्मपुराण में परमा एकादशी को कमला एकादशी कहा गया है.
कलियुग में एकादशी व्रत का विशेष महत्व
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया कि कलियुग में एकादशी व्रत ही ऐसा साधन है, जो मनुष्य को संसार के बंधनों से मुक्त कर सकता है. यह व्रत सभी पापों का नाश करने वाला और मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला माना गया है. उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति के साथ विधिपूर्वक एकादशी का व्रत करता है, वह भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त करता है. विष्णु भक्तों को किसी भी परिस्थिति में एकादशी व्रत का त्याग नहीं करना चाहिए.
ये भी पढ़ें: परमा एकादशी 2026: अधिकमास की दुर्लभ एकादशी का महत्व, शुभ मुहूर्त, व्रत विधि और आध्यात्मिक लाभ
निर्जल व्रत से प्राप्त होती है जीवन्मुक्ति
युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि मनुष्य जीवन्मुक्त और विष्णुरूप कैसे बन सकता है. इस पर श्रीकृष्ण ने कहा कि जो भक्त कलियुग में श्रद्धापूर्वक निर्जल रहकर एकादशी व्रत का पालन करते हैं, वे जीवन्मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं. उन्होंने बताया कि दशमी तिथि को एक समय भोजन, एकादशी को निर्जल उपवास तथा द्वादशी को विधिपूर्वक पारण करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समान पुण्य का भागी बनता है. यह व्रत इस लोक और परलोक दोनों में कल्याणकारी माना गया है.
परमा एकादशी व्रत के नियम
शास्त्रों के अनुसार व्रती को दशमी तिथि से ही संयम का पालन शुरू कर देना चाहिए.
दशमी तिथि में इन बातों का रखें ध्यान
- कांसे के बर्तनों का उपयोग न करें.
- उड़द, मसूर, चना, कोदो, साग और मधु का सेवन न करें.
- पराया अन्न और दिन में दो बार भोजन से बचें.
- ब्रह्मचर्य का पालन करें.
एकादशी के दिन इन कार्यों से बचें
- जुआ खेलना
- अधिक निद्रा
- पान का सेवन
- निंदा और चुगली करना
- चोरी और हिंसा
- क्रोध और असत्य भाषण
- दाम्पत्य संबंध
द्वादशी तिथि में भी संयमित आहार और आचरण का पालन करने का विशेष महत्व बताया गया है.
कौण्डिन्य ऋषि ने बताई सुमेधा और पवित्रा की कथा
पद्मपुराण के अनुसार, काम्पिल्य नगर में सुमेधा नामक ब्राह्मण अपनी पत्नी पवित्रा के साथ रहते थे. दोनों अत्यंत गरीब थे, लेकिन धर्म और अतिथि सेवा में कभी पीछे नहीं हटते थे. आर्थिक तंगी से परेशान होकर सुमेधा विदेश जाने का विचार करने लगे, लेकिन पवित्रा ने उन्हें धर्म के मार्ग पर अडिग रहने की सलाह दी. कुछ समय बाद उनके घर कौण्डिन्य ऋषि पधारे. दंपति ने श्रद्धापूर्वक उनकी सेवा की और अपनी गरीबी का कारण पूछा. तब ऋषि ने उन्हें अधिकमास के शुक्ल पक्ष की परमा एकादशी का व्रत करने की सलाह दी. उन्होंने बताया कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, दान, व्रत और रात्रि जागरण करने से दरिद्रता और दुख दूर हो जाते हैं. और पवित्रा ने पूर्ण श्रद्धा से व्रत किया, जिसके प्रभाव से उनके जीवन में सुख-समृद्धि आने लगी. अंततः उन्होंने आजीवन इस व्रत का पालन किया और मृत्यु के बाद श्रीहरि के धाम को प्राप्त हुए.
महादेव की कृपा से कुबेर बने धनाध्यक्ष
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यक्षराज कुबेर हमेशा से धनवान नहीं थे. एक समय वे भी आर्थिक संकट से जूझ रहे थे. तब उन्होंने भगवान शिव से अपनी दरिद्रता का कारण पूछा. महादेव ने उन्हें अधिकमास की एकादशी का व्रत करने की सलाह दी. शिवजी के निर्देशानुसार कुबेर ने पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा से व्रत एवं उपासना की. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें देवताओं का धनाध्यक्ष बना दिया. परमा एकादशी केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम और भगवान विष्णु की भक्ति का पावन अवसर है. मान्यता है कि इस व्रत की कथा सुनने, श्रद्धापूर्वक उपवास रखने और विधिपूर्वक पूजा करने से पापों का नाश होता है, दरिद्रता दूर होती है तथा जीवन में सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है.
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए