धार्मिक मन की स्थिति

Published at :28 Nov 2016 7:01 AM (IST)
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धार्मिक मन की स्थिति

एक धार्मिक व्यक्ति वह व्यक्ति नहीं होता, जो भगवान को ढूंढ रहा है. धार्मिक आदमी समाज के रूपांतरण से संबद्ध है, जो कि वह स्वयं है. धार्मिक आदमी वह व्यक्ति नहीं, जो असंख्य रीति रिवाजों-परंपराओं को मानता/करता है. अतीत की संस्कृति, मुर्दा चीजों में जिंदा रहता है. धार्मिक आदमी वह व्यक्ति नहीं है, जो निर्बाध […]

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एक धार्मिक व्यक्ति वह व्यक्ति नहीं होता, जो भगवान को ढूंढ रहा है. धार्मिक आदमी समाज के रूपांतरण से संबद्ध है, जो कि वह स्वयं है. धार्मिक आदमी वह व्यक्ति नहीं, जो असंख्य रीति रिवाजों-परंपराओं को मानता/करता है. अतीत की संस्कृति, मुर्दा चीजों में जिंदा रहता है. धार्मिक आदमी वह व्यक्ति नहीं है, जो निर्बाध रूप से बिना किसी अंत के गीता या बाइबिल की व्याख्या में लगा हुआ है, या निर्बाध रूप से जप कर रहा है, संन्यास धारण कर रखा है. ये सारे लोग तथ्य से पलायन कर रहे हैं. धार्मिक आदमी का संबंध कुल जमा, संपूर्ण रूप से समाज को, जो कि वह स्वयं ही है, समझनेवाले व्यक्ति से है. वह समाज से अलग नहीं है.

खुद के पूरी तरह, संपूर्ण रूप से रूपांतरण अर्थात् लोभ-अभिलाषाओं, महत्वाकांक्षाओं के अवसान द्वारा रूपांतरण और इसलिए वह परिस्थितियों पर निर्भर नहीं, यद्यपि वह स्वयं परिस्थितियों का परिणाम है. अर्थात्, जो भोजन वह खाता है, जो किताबें वह पढ़ता है, जो फिल्में वह देखता है, जिन धार्मिक प्रपंचों, विश्वासों, रिवाजों और इस तरह के सभी गोरखधंधों में वह लगा है. वह जिम्मेवार है, इसलिए धार्मिक व्यक्ति स्वयं को अनिवार्यतः समझता है, कि वह समाज का उत्पाद है, जिस समाज को उसने स्वयं बनाया है. इसलिए अगर यथार्थ को खोजना है, तो उसे यहीं से शुरू करना होगा. किसी मंदिर में नहीं, किसी छवि से बंध कर नहीं. अन्यथा कैसे वह कुछ खोज सकता है, जो संूपर्णतः नया है. एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला में वास्तव में वैज्ञानिक होता है.

वह अपनी राष्ट्रीयता, अपने डर, अपनी उपलब्धियों से गर्वोन्नत, महत्वाकांक्षाओं और स्थानिक जरूरतों के कारण वैज्ञानिक नहीं होता. प्रयोगशाला में वह केवल खोज कर रहा होता है. पर प्रयोगशाला के बाहर वह एक सामान्य व्यक्ति की तरह ही होता है, अपनी पूर्वअवधारणाओं, महत्वाकांक्षाओं, राष्ट्रीयता, घमंड, और इसी तरह की अन्य बातों सहित. इस तरह के मन की पहुंच ‘धार्मिक मन’ तक कभी नहीं होती. धार्मिक मन किसी प्रभुत्व केंद्र से संचालित नहीं होता, चाहे उसने पारंपरिक रूप से ज्ञान संचित कर रखा हो, या वह अनुभव हो.

– जे कृष्णमूिर्त

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