कर्म की प्रधानता
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :23 Nov 2016 6:55 AM (IST)
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अपने कर्म से भागनेवाले मनुष्य कायर होते हैं. अर्जुन जब युद्ध से भागने लगा, तो श्रीकृष्ण ने उसे कायर तक कह डाला. कर्म महत्वपूर्ण है. गणिका वेश्या थी, सधना कसाई था, रविदास जूता बनाते थे, लेकिन वे सब संत हो गए. उन्हें स्वर्ग मिला. मगर मंदिर में बैठे पुजारी के विषय में कहना कठिन है […]
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अपने कर्म से भागनेवाले मनुष्य कायर होते हैं. अर्जुन जब युद्ध से भागने लगा, तो श्रीकृष्ण ने उसे कायर तक कह डाला. कर्म महत्वपूर्ण है. गणिका वेश्या थी, सधना कसाई था, रविदास जूता बनाते थे, लेकिन वे सब संत हो गए. उन्हें स्वर्ग मिला. मगर मंदिर में बैठे पुजारी के विषय में कहना कठिन है कि उसे स्वर्ग मिलेगा या नरक. हाथ का काम कर्म करना है.
इसी हाथ से किसी पीड़ित की सेवा कर सकते हो, इसी हाथ से किसी का गला दबा सकते हो. अपनी वाणी से किसी को शीतल बना सकते हो, तो किसी को दुखी बना सकते हो. हाथ एक ही है. मुंह भी एक ही है. लेकिन, कर्म का फल अलग-अलग है. तुम अपने शरीर से किसी की सेवा करो या किसी को सताओ, यहां शरीर प्रधान नहीं है. शरीर से जो कर्म हो रहा है, वह प्रधान है. शरीर से मंदिर जाकर भगवान की सेवा करो, संतों की चरण-वंदना करो या कहीं गलत जगह पर जाकर व्यभिचार या दुराचार करो. यहां शरीर तो एक ही है. कर्म अलग-अलग है. इस कर्म को करानेवाला मन सारा खेल खेल रहा है.
इसलिए जगद्गुरु शंकराचार्य कहते हैं तुम्हारा मन ही तुम्हारे बंधन का कारण है. मन से ही तुम बंधे हो. केवल मन ही बंधन का कारण है. इसलिए इस मन के जाल में मत फंसो. गीता में भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कहा कि मन बड़ा खुराफाती है. ‘हे अर्जुन इंद्रियों का राजा मन है. तुम्हारी दस इंद्रियों का मालिक तुम्हारा मन है. मन का आदेश पाकर ही तुम्हारी इंद्रियां अपराध करती हैं. इसलिए मन की बात मत मानना. तुम मन की बातों को पहले अपनी बुद्धि से पूछ लेना कि यह ठीक है कि नहीं. मन को बुद्धि से नियंत्रित करके कर्म करना. लेकिन, बुद्धि पर भी पूरा भरोसा मत करना. क्योंकि बुद्धि भी विध्वंस का मार्ग बताती है.
इसलिए हे अर्जुन! बुद्धि को अपने विवेक से नियंत्रित करना. विवेक से पूछ कर जो भी करोगे, उसका फल शुभ होगा. अपने सभी कर्मों को परमात्मा को साक्षी मान कर करनेवाले को पुण्य प्राप्त होता है.’ एक डॉक्टर ऑपरेशन करता है, यह सभी जानते हैं कि पेट में छुरा भोंकना अपराध है, उसे मृत्यु दंड मिल सकता है. परंतु डॉक्टर शरीर को पूरी तरह चीर-फाड़ कर देता है, इसके लिए उसे कोई दंड नहीं मिलता.
आचार्य सुदर्शन
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