निर्णय लेने की कठिनाई

Published at :17 Nov 2016 6:11 AM (IST)
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निर्णय लेने की कठिनाई

आपका कोई अस्तित्व नहीं था, फिर अचानक किसी और की वजह से आप अस्तित्व में आये और अब आप यहां मौजूद हैं. अस्तित्वहीनता की स्थिति में वापस जाना एक सरल निर्णय है. जीवन में कोई भी निर्णय कठिन नहीं होते. दरअसल, आप बहुत सारी चीजों से जुड़ाव रखे हुए हैं, इसलिए आपके लिए फैसला लेना […]

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आपका कोई अस्तित्व नहीं था, फिर अचानक किसी और की वजह से आप अस्तित्व में आये और अब आप यहां मौजूद हैं. अस्तित्वहीनता की स्थिति में वापस जाना एक सरल निर्णय है. जीवन में कोई भी निर्णय कठिन नहीं होते. दरअसल, आप बहुत सारी चीजों से जुड़ाव रखे हुए हैं, इसलिए आपके लिए फैसला लेना कठिन हो जाता है. अन्यथा तलाक हो या मौत, या फिर कोई दूसरा निर्णय; वह आपके लिए कठिन नहीं होना चाहिए. चाहे यह कितना भी मायने रखता हो, लेकिन यह बस जीवन का एक अगला चरण ही तो है, जो किसी न किसी रूप में अवश्य सामने आयेगा.

इससे पहले कि जीवन आपको उस काम को करने के लिए विवश करे, आप उसे सचेतन होकर पहले ही कर लें. निर्णय लेना इतना कठिन भी नहीं है. कठिनाई इसलिए आती है, क्योंकि आपकी अपने आसपास की वस्तुओं में बहुत गहरी आसक्ति है. पश्चिमी समाज में, लोगों को यह तय करने में बहुत परेशानी होती है कि विवाह करें या न करें. भले ही वे किसी के साथ वर्षों से रह रहे हों, लेकिन उसी के साथ विवाह करने की प्रतिबद्धता दिखाना, उनके लिए बड़ा संघर्ष बन जाता है.

क्योंकि उन्हें उन छोटी चीजों का साथ छोड़ना होगा, जिनके वे अभ्यस्त हो गये हैं. निर्णय कोई भी हो, आपको कोई न कोई त्याग तो करना ही होगा. जब तलाक की बात आती है, तो भी उनके लिए फैसला लेना कठिन हो जाता है, हालांकि यह समस्या इतनी बड़ी नहीं होती. भारत में विवाह करना सरल है, पर तलाक का निर्णय भारी लगता है. पश्चिम में विवाह कठिन, परंतु तलाक लेने का निर्णय सरल लगता है. दो भिन्न संस्कृतियां, परंतु दोनों की समस्या एक. दोनों ही तरह के लोगों को निर्णय लेने में कठिनाई हो रही है.

आप जो भी करते हैं, उससे दिल को ठेस लगती है, क्योंकि अपनी पहचान उन चीजों के रूप में बना ली है, जो आप नहीं हैं. मानो आप कंटीले तारों से घिरे हों, आप जिस भी दिशा में जायें, आपको चुभेगा. ये कांटे चारों दिशाओं में हैं, और आप यह नहीं जानते कि जैसे भी हालात हों, उनके साथ स्थिरता बनाये रखते हुए जीवन कैसे बितायें. आप हिलने-डुलने को मजबूर हो जाते हैं, चाहे आपको कष्ट ही क्यों

न हो.

– सद्गुरु जग्गी वासुदेव

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