जो छूट रहे हैं, उन्हें बचाने का संकल्प है छठ

Updated at : 11 Nov 2018 7:00 AM (IST)
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जो छूट रहे हैं, उन्हें बचाने का संकल्प है छठ

उषाकिरण खान मेरी दृष्टि में शरद पूर्णिमा के बाद से भारतीय किसान अपनी किसानी की तैयारी में लग जाते हैं. कृषि प्रधान देश का रूप बदल गया है, अब हम गांव में भी काम के बदले अनाज नहीं देते, खनखनाते द्रव्य, खरखराते नोट देते हैं. नोट जिन पर संपूर्ण गांधी नहीं हैं. परंतु सबकुछ बदल […]

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उषाकिरण खान

मेरी दृष्टि में शरद पूर्णिमा के बाद से भारतीय किसान अपनी किसानी की तैयारी में लग जाते हैं. कृषि प्रधान देश का रूप बदल गया है, अब हम गांव में भी काम के बदले अनाज नहीं देते, खनखनाते द्रव्य, खरखराते नोट देते हैं. नोट जिन पर संपूर्ण गांधी नहीं हैं.

परंतु सबकुछ बदल जाने के बाद भी उत्सवधर्मिता नहीं बदली है. बिहारी भाई-बहन बहुत सारे विकीरण(प्रदूषण) लेकर बिहार लौटते हैं, स्पेशल ट्रेनों में लदकर, इस फसली त्योहार को मनाने के लिये. बिहार के लोग अपने झोपड़ों को ऐसे साफ करते हैं, जैसे चंदनवन हो, साबूदाना का बाग हो, जैसे धनुषभंग का मड़वा हो. समुद्रमंथन के फलस्वरूप प्राप्त धन्वन्तरी, लक्ष्मी यहां खेतों-जंगलों में नृत्य करती-सी आती है, ऐरावत और अमृत चालाक प्रदेश ले जाते हैं.

दीपावली एक सा ही बीतता है हर स्थान पर, सुखरात्रि और पखेब गाय की पूजा, बैलों को जड़ी-बूटी का अर्क पिलाकर सुपुष्ट करते हैं. दीपावली की सारी तैयारी एक प्रकार से खरीफ फसल की आगवानी का होता है, बैलों को पुष्ट करने का लक्ष्य है रबी की बुवाई. द्वितीया के दिन भाई अपनी बहन का कुशल क्षेम पूछने निकलता है, क्योंकि उसके बाद वह निकल नहीं पायेगा. माताजी, भाभीजी छठ करेंगी. बड़ी तैयारी करनी होगी. घर का काम माताएं करेंगी, घाट की सजावट भाई लोग देखेंगे.

अब आयें छठ व्रत पर, यह सूर्य की उपासना का व्रत है. सूर्य यानी आदिदेव सूर्य की अभी धरती के सकल प्राणी को अत्यंत आवश्यकता है. धरती सूखे, वातावरण उष्मा से भरा हो, प्रकाशित हो अग-जग. सूर्य जीवन है, सूर्य ही जल के स्त्रोत को राह देता है. सूर्य की यह पूजा बिहार में तय है. पांच दिनों का व्रत नहाय-खाय के दिन से ही हविष्य भोजन शुरू हो जाता है. दूसरे दिन खरना होता है. नये चावल और गुड़ से खीर बनता है.

व्रती दिन भर के उपवास के बाद रात में वही प्रसाद लेती है. उसके बाद शुरू होता है फिर छत्तीस घंटे का निर्जला व्रत. प्रसाद जिस टोकरे, डलिया, सूप, डगरे में चढ़ता है वह बांस का होता है. प्रसाद में गेहूं और गुड़ के ठकुए के अलावा सारे मौसमी कंद-मूल-फल होते हैं. यथा चकोतरा, केला, नारियल जरूरी होता है. पानी फल सिंघाड़ा, सारुख, घेंचुल इत्यादि पानी के फल, अल्हुआ, सुथनी, मूली तथा कमरख, अमरूद इत्यादि पेड़ के फल. ईख जरूरी होता है. बांस के अलावा मिट्टी के सकोरे छोटे-बड़े होते हैं. अर्थात सारे प्राकृतिक सामान.

स्त्रियोचित सारे श्रृंगार छठ में मान्य हैं. पटना में गंगा घाट पर स्त्रियां टीका नथिया तक पहन कर छठ करती देखी गयी हैं. सुहागिन स्त्रियां सिंदूर नाक तक लगाती हैं. सभी गांवों और शहरों में किशोर और युवाओं की टोली सड़कों को साफ, सुरक्षित औऱ व्यवस्थित रखने का बीड़ा उठाते हैं.

चंचलता भूल भक्तिमय हो उठते हैं. बदले में उन्हें कुछ नहीं मात्र प्रसाद और आशीर्वाद चाहिए होता है. काश! कि यह सद्बुद्धि सालो भर रहे. बड़े-बड़े ग्रंथ लिखे गये हैं, बड़ी-बड़ी स्थापनाएं हैं कि छठ पूजा कब, क्यों शुरू हुई. सूर्य की पूजा तो है ही यह छठी माई की पूजा भी है. सिंदूर का प्रतीक उन्हीं का है. जल की पूजा भी है, क्योंकि छठ के बाद व्रती घाट पूजकर निकलते हैं. अग्नि की पूजा भी है, क्योंकि खरना अग्निदेव की आराधना ही है. अर्थात हम पंचतत्व की पूजा करते हैं. अड़तालीस घंटे के व्रत से अपनी ऊर्जा परीक्षा लेते हैं.

परंतु संकल्प लेना सही होगा कि हम विलुप्त होती उद्भिज फल, फूल, मूल, कंद को प्रयोग में लाने के लिए उसका संरक्षण करें. अपनी मांग से नाक तक रासायनिक प्रयोगशाला में निर्मित सिंदूर न लगाकर सिंदूर के पौधे लगाएं. क्योंकि वह विलुप्त हो गया है. किसी प्रकार पुनः उसे बचायें जो छूट रहे हैं. वही दिन असली छठ का दिन होगा.

(लेखिका हिंदी और मैथिली की जानी-मानी कथाकार हैं.)

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