Table of Contentsमहाराष्ट्र में 19 साल के रवि की हो गयी मौतहर साल सैकड़ों लोग करते हैं गांव से पलायनचुटे और चतरोचट्टी पंचायत के इन 5 लोगों की हुई मौतगोमिया में धान की अच्छी-खासी खेती होती हैBrunt of Migration: कभी घोर नक्सल प्रभावित क्षेत्र था चतरोचट्टीनकद कमाने के लिए लोग शहर की ओर कर रहे पलायन2023 में हुआ था झारखंड माइग्रेशन सर्वे5.11 लाख से अधिक प्रवासी श्रमिक लौटे थे झारखंडझारखंड सरकार ने कहा था- अपने ही राज्य में देंगे रोजगारअन्य राज्यों से लौटे थे 30 फीसदी अकुशल प्रवासी श्रमिककमाई के पारंपरिक स्रोतों को छोड़ पलायन कर रहे लोगप्रवासी श्रमिकों को झारखंड सरकार देती है मददलाभ लेने की पात्रताप्रवासी श्रमिक योजना का लाभ लेने के लिए जरूरी दस्तावेजआवेदन की ऑफलाइन प्रक्रियाप्रवासी श्रमिकों के लिए ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रियाक्या कहते हैं गोमिया प्रखंड के प्रखंड विकास पदाधिकारी? Brunt of Migration: झारखंड की राजधानी रांची से करीब 100 किलोमीटर दूर है चतरोचट्टी. यह बोकारो जिले के गोमिया प्रखंड में आता है. आदिवासी बहुल इलाका है. बेरोजगारी बड़ी समस्या है. इसलिए चतरोचट्टी थाना क्षेत्र के लोग रोजगार की तलाश में पलायन करते हैं. कोई देश के किसी अन्य राज्य में जाकर काम करने लगता है, तो कोई विदेश का रुख कर लेता है. कई बार लोग विदेश जाकर कबूतरबाजों के चंगुल में फंस जाते हैं, तो कई बार किसी दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं. कई बार तो नौबत ऐसी होती है कि परिवार के पास शव लाने तक के पैसे नहीं होते. सरकार की मदद से उनके शव को लाया जाता है. इसे विडंबना ही कहेंगे कि अपने परिवार के लिए रोजी-रोटी कमाने गये लोग ताबूत में लौटते हैं. महाराष्ट्र में 19 साल के रवि की हो गयी मौत ताजा मामला गोमिया प्रखंड के चतरोचट्टी थाना क्षेत्र के चतरोचट्टी पंचायत का है. 19 साल का रवि कमाने के लिए मुंबई गया था. वहां सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गया. अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन उसकी जान नहीं बच सकी. उसकी मां अब इस दुनिया में अकेली रह गयी, क्योंकि पिता की 8 साल पहले वज्रपात से मौत हो गयी थी. 3 बहनें हैं, तीनों की शादी हो चुकी है. बूढ़ी मां का अपने इकलौते बेटे रवि के लिए रो-रोकर बरा हाल है. आसपास के लोग, पड़ोस की महिलाएं उसे काफी समझाते हैं, लेकिन जब भी वह अकेली होती है, बेटे की याद में उसकी आंखों अश्रुधारा बहने लगती है. कोरोना संकट के दौरान इस तरह सिर और कंधे पर सामान उठाकर हजारों किलोमीटर दूर अपने गांव जाने के लिए निकल पड़े थे प्रवासी श्रमिक. हर साल सैकड़ों लोग करते हैं गांव से पलायन रवि की मां इकलौती नहीं, जिसके घर का चिराग बुझ गया. चतरोचट्टी थाना क्षेत्र की बात करें, तो महज 3 महीने में 5 प्रवासी श्रमिकों की मौत हो चुकी है. परदेस में मरने वाले इन 5 प्रवासी श्रमिकों में 4 चुटे पंचायत के रहने वाले थे. चतरोचट्टी पंचायत के एक प्रवासी श्रमिक की महाराष्ट्र में मौत हो गयी. क्षेत्र से हर साल बोकारो जिले के चतरोचट्टी थाना क्षेत्र से सैकड़ों लोग पलायन करते हैं. इनमें से कई लोगों की मौत हो जाती है. 3 महीने में चतरोचट्टी थाना क्षेत्र के 5 लोगों की मौत चुटे पंचायत के 4 प्रवासी मजदूरों की हो गयी मौत चतरोचट्टी पंचायत के मंगरो गांव निवासी रवि की मौत चुटे और चतरोचट्टी पंचायत के इन 5 लोगों की हुई मौत रजडेरवा गांव से रशिका मांझी दंडरा गांव के महाबीर मांझी खर्चाबेडा के दिलीप हंसदा जमुआ बेड़ा गांव के करमा बास्के मंगरो गांव के रवि कुमार गोमिया में धान की अच्छी-खासी खेती होती है गोमिया प्रखंड के वरिष्ठ पत्रकार नागेश्वर कहते हैं कि गोमिया प्रखंड में धान की अच्छी-खासी खेती होती है, लेकिन इससे जीवन स्तर में सुधार नहीं आता. बच्चों को पढ़ाने से लेकर बीमार लोगों का इलाज कराने तक के लिए पैसे की जरूरत होती है. इसलिए पलायन लोगों की मजबूरी है. वह कहते हैं कि क्षेत्र में सरकार की तरफ से मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) के अलावा ऐसी कोई योजना नहीं चलायी जाती, जिससे लोगों को रोजगार मिल सके. वे पैसे कमा सकें. झारखंड की ताजा खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें Brunt of Migration: कभी घोर नक्सल प्रभावित क्षेत्र था चतरोचट्टी वह कहते हैं कि झुमड़ा पहाड़ के पास स्थित आदिवासी बहुल यह इलाका कभी घोर नक्सल प्रभावित क्षेत्र हुआ करता था. अब नक्सलवाद नहीं रहा. बावजूद इसके विकास की किरण यहां नहीं पहुंची. मनरेगा योजना में काम करने वालों को समय पर पैसे नहीं मिलते. मनरेगा के अधिकारी हों या कर्मचारी, किसी को समय पर पैसे नहीं मिलते. 2-3 महीने बाद पारिश्रमिक का भुगतान होता है. इससे मनरेगा श्रमिक परेशान रहते हैं और पलायन करते हैं. देश के कोने-कोने में रेलवे स्टेशनों और बस स्टैंड पर अपने घर लौटने के लिए लगी थी प्रवासियों की लंबी कतार. नकद कमाने के लिए लोग शहर की ओर कर रहे पलायन नागेश्वर कहते हैं कि शहरों में जाकर लोग नकद पैसा कमाना शुरू कर देते हैं. काम करने के तुरंत बाद उन्हें पैसे मिल जाते हैं. इसलिए कोई मनरेगा में काम भी नहीं करना चाहता. उन्होंने बताया कि कैमरून में फंसे झारखंड के जो 17 प्रवासी श्रमिक हाल ही में स्वदेश लौटे हैं, उसमें 7 गोमिया प्रखंड के ही रहने वाले हैं. इसे भी पढ़ें : EXCLUSIVE : लॉकडाउन में 6.89 लाख लोग झारखंड लौटे, 2.9 लाख से ज्यादा कुशल श्रमिकों को रोजगार देने की ये है योजना 2023 में हुआ था झारखंड माइग्रेशन सर्वे वर्ष 2020 में कोरोनावायरस ने जब पूरी दुनिया में तबाही मचा रखी थी, तब बड़ी संख्या में झारखंड के प्रवासी श्रमिक अपने लौटे थे. सरकार ने केरला माइग्रेशन सर्वे मॉडल के तहत झारखंड माइग्रेशन सर्वे करवाया था. वर्ष 2023 में जनवरी से मार्च तक सभी जिलों के 10,674 परिवारों का सर्वेक्षण किया गया. इससे पता चला कि झारखंड के 45 लाख लोग आजीविका के लिए देश-दुनिया के अलग-अलग कोने में गये हैं. वर्ष 2023 के इसी सर्वे से पता चला कि 2,549 करोड़ रुपए इन प्रवासी श्रमिकों ने झारखंड भेजे. 5.11 लाख से अधिक प्रवासी श्रमिक लौटे थे झारखंड इससे पहले वर्ष 2020 में जब प्रवासी श्रमिक झारखंड लौटे थे, तो सरकार ने उनका एक डेटाबेस तैयार किया था. कराबी 7 लाख लोग लौटे थे. इनमें से 5,11,663 लोगों को प्रवासी श्रमिकों के रूप में चिह्नित किया गया था. इनमें से 3 लाख श्रमिकों की स्किल मैपिंग ग्रामीण विकास विभाग ने करवायी थी. 3 लाख में से 2.09 लाख कुशल और 92 हजार से अधिक लोग अकुशल श्रमिक थे. इसे भी पढ़ें : झारखंड के गांव और शहर में बढ़ रही प्रति व्यक्ति खर्च की खाई, सबसे गरीब लोग कितना करते हैं खर्च? झारखंड सरकार ने कहा था- अपने ही राज्य में देंगे रोजगार सरकार ने तब कहा था कि झारखंड लौटे प्रवासी श्रमिकों को अब राज्य में ही सरकार रोजगार देगी. उन्हें कमाने के लिए बाहर नहीं जाना होगा. इसके लिए बाकायदा उनकी स्किल मैपिंग की गयी थी. कौशल विकास मिशन और झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (जेएसएलपीएस) ने 2.70 लाख से अधिक कुशल श्रमिकों की सूची तैयार की थी. उसे उद्योग विभाग ने विभिन्न उद्योगों और औद्योगिक संगठनों को भेज दिया. हालांकि, इनमें से कितने लोगों को झारखंड में नौकरी मिली, इसकी जानकारी कभी सार्वजनिक नहीं की गयी. अन्य राज्यों से लौटे थे 30 फीसदी अकुशल प्रवासी श्रमिक झारखंड सरकार के ग्रामीण विकास विभाग ने 2.5 लाख प्रवासी श्रमिकों की स्किल मैपिंग की थी. विभाग ने बताया था कि इनमें से 30 फीसदी यानी कम से कम 75 हजार लोग अकुशल श्रमिक हैं. पलायन रोकने के लिए राज्य सरकार का लक्ष्य इन लोगों को घर में ही रोजगार उपलब्ध कराना है. कोरोना संकट के दौरान इस तरह झारखंड लौटे थे प्रवासी श्रमिक. कमाई के पारंपरिक स्रोतों को छोड़ पलायन कर रहे लोग 15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग होकर अस्तित्व में आये झारखंड राज्य की आबादी वर्ष 2011 की जनगणना में 3.29 करोड़ थी. वर्ष 2023 में यह बढ़कर 4 करोड़ से अधिक हो गयी. वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, झारखंड की कुल आबादी में 26.2 फीसदी लोग आदिवासी समाज से आते हैं. राज्य में 34 जनजातियां निवास करतीं हैं. सदियों से इनकी आजीविका जल, जंगल और जमीन पर आधारित रहीं हैं, लेकिन अब इन्हें पैसे कमाने के लिए अपने पारंपरिक कमाई के स्रोतों को छोड़कर शहरों में पलायन करना पड़ रहा है. इसे भी पढ़ें : दूध-फल पर ज्यादा खर्च करते हैं झारखंड के शहरी, ग्रामीण अंडा-मछली और मांस पर प्रवासी श्रमिकों को झारखंड सरकार देती है मदद मृत्यु या पूर्ण दिव्यांगता की स्थिति में 1,50,000 रुपए प्रवासी श्रमिक की मृत्यु या पूरी तरह से अपंग होने की स्थिति में पंजीकृत श्रमिक के आश्रित को सरकार देती है. 1,00,000 रुपए प्रवासी श्रमिक की मृत्यु या पूरी तरह से अपंग होने की स्थिति में अपंजीकृत श्रमिक के आश्रित को देती है सरकार. दोनों आंखें या दो अंगों के नुकसान पर 1,50,0000 रुपए पंजीकृत श्रमिक के आश्रित को देती है सरकार 1,00,000 रुपए अपंजीकृत श्रमिक के आश्रित को देती है सरकार एक आंख या एक अंग के नुकसान पर 75,000 रुपए मिलते हैं पंजीकृत प्रवासी श्रमिकों के आश्रित को 50,000 रुपए मिलते हैं अपंजीकृत प्रवासी श्रमिकों के आश्रित को राष्ट्रीय आपदा में मृत्यु या पूरी तरह दिव्यांग होने की स्थिति में पंजीकृत श्रमिक : किसी भी राज्य से पंजीकृत श्रमिक के पैतृक गांव तक शव लाने की पूरी व्यवस्था सरकार करेगी. अपंजीकृत श्रमिक : किसी भी राज्य से अपंजीकृत श्रमिक के पैतृक गांव तक शव लाने की पूरी व्यवस्था सरकार करेगी. लाभ लेने की पात्रता प्रवासी श्रमिक को झारखंड का नागरिक होना चाहिए. श्रमिक की उम्र 18 से 65 वर्ष के बीच होनी चाहिए. झारखंड राज्य के बाहर काम करने के दौरान दुर्घटना में मृत्यु या अपंगता हुई हो. श्रमिक अकुशल या अर्द्ध-कुशल श्रमिक का काम करता हो. श्रमिक को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग का होना चाहिए. प्रवासी श्रमिक योजना का लाभ लेने के लिए जरूरी दस्तावेज झारखंड की नागरिकता का प्रमाण पत्र (आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र इत्यादि) रोजगार का प्रमाण या झारखंड से बाहर जाने का सबूत आवेदन का पहचान पत्र आय प्रमाण पत्र या आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग का होने का सबूत प्रवासी श्रमिक योजना का लाभ लेने के लिए बैंक अकाउंट का डिटेल, ताकि पैसा खाते में ट्रांसफर किया जा सके आवेदन की ऑफलाइन प्रक्रिया आवेदक को कार्यालय समय (10 बजे से 5 बजे के बीच) जिला श्रम कार्यालय जाना होगा. वहां जाकर जिला श्रम पदाधिकारी से आवेदन का फॉर्म लेना होगा. उस फॉर्म को भरना होगा. आवेदन पत्र में जितनी जानकारी मांगी गयी है, सारी जानकारी भरें. उसके साथ सभी जरूरी दस्तावेज (सेल्फ अटेस्टेड) अटैच करें. आवेदन पत्र पर जमा करके जिला श्रम कार्यालय में जमा करें. जिला श्रम कार्यालय में जहां आवेदन जमा कर रहे हैं, वहां से पावती रसीद जरूर ले लें. यह भी सुनिश्चित करें कि पावती रसीद पर तारीख और समय जरूर लिखा हो. संभव हो, तो आवेदन जमा लेने वाले का पहचान नंबर भी ले लें. प्रवासी श्रमिकों के लिए ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया सबसे पहले श्रमाधान (Shramadhan) की ऑफिशियल वेबसाइट पर जायें. आधार नंबर, पूरा नाम, माता या पिता का नाम, आवासीय पता, कार्यस्थल का पता, योग्यता, स्किल डिटेल और जन्म तिथि जैसी व्यक्तिगत जानकारियां डालें. ड्रॉपडान से उस कैटेगरी को चुनें, जिसमें आप आते हैं और वहां अपना मोबाइल नंबर भरें. अब अपना बैंक अकाउंट नंबर, बैंक का आईएफएससी कोड और अपने नॉमिनी (आश्रित) का नाम डालें. आपके साथ किसी अनहोनी की स्थिति में नॉमिनी के खाते में ही पैसे ट्रांसफर किये जायेंगे. चेकबॉक्स को सेलेक्ट करें, इस बात की स्वीकारोक्ति दें कि आप अपना आधार डिटेल यूआईडीएआई (UIDAI) के साथ वेरिफिकेशन के लिए शेयर कर रहे हैं. भारत सरकार और झारखंड सरकार के पास भी आपकी ये सूचनाएं चली जायेंगीं. अब सबमिट का बटन दबा दें. नोट : प्रवासी श्रमिक योजना का लाभ लेने के लिए किसी भी घटना-दुर्घटना की सूचना तत्काल पास के सरकारी कार्यालय में देना जरूरी है. मसलन, प्रखंड विकास पदाधिकारी, श्रम अधीक्षक या जिला मजिस्ट्रेट, जो भी कार्यालय आपके सबसे समीप हो. क्या कहते हैं गोमिया प्रखंड के प्रखंड विकास पदाधिकारी? चतरोचट्टी थाना क्षेत्र के चुटे ओर चतरोचट्टी पंचायत में प्रवासी मजदूरों के निबंधन के लिए कैंप लगाकर निबंधन किया गया है, ताकि किसी प्रकार की आकस्मिक घटना होने पर श्रम विभाग से मिलने वाला मुआवजा उसके आश्रित को दिलवायी जा सके. रही बात क्षेत्र में रोजगार की, तो नरेगा से विभिन्न योजनाएं चलायी जा रहीं हैं. पंचायत में भी योजनाएं संचालित होती हैं. क्षेत्र के कुछ लोग खासकर टावरलाइन में काम करने वाले अधिक पैसे की लालच में अन्य राज्यों में या विदेश कमाने चले जाते हैं. –महादेव कुमार महतो, बीडीओ, गोमिया प्रखंड, बोकारो इसे भी पढ़ें झारखंड के 10 लाख मजदूर देश के कोने-कोने में बहाते हैं पसीना, श्रमिक संगठनों के पास हैं ऐसी-ऐसी शिकायतें भारत सरकार की मदद से कैमरून में फंसे 17 प्रवासी मजदूर आज लौट रहे घर, परिजनों में खुशी की लहर झारखंड से राजस्थान कमाने गये श्रमिक की आगरा में मौत, 1 लाख का मुआवजा कैसे मिलेगा परिवार को? 46 दिन बाद कुवैत से झारखंड पहुंचा प्रवासी श्रमिक रामेश्वर महतो का शव