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जन्मदिन पर विशेष : अमृता को साहिर से प्रेम था, लेकिन आजीवन इमरोज के साथ रहीं

Updated at : 31 Aug 2017 1:23 PM (IST)
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जन्मदिन पर विशेष : अमृता को साहिर से प्रेम था, लेकिन आजीवन इमरोज के साथ रहीं

ऐ मेरे दोस्त! मेरे अजनबी! एक बार अचानक – तू आया वक़्त बिल्कुल हैरान मेरे कमरे में खड़ा रह गया। साँझ का सूरज अस्त होने को था, पर न हो सका और डूबने की क़िस्मत वो भूल-सा गया… यह बेमिसाल पंक्तियां हैं मशहूर कवयित्री अमृता प्रीतम की. आज अमृता प्रीतम का जन्मदिन है. उनका जन्म […]

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ऐ मेरे दोस्त! मेरे अजनबी!

एक बार अचानक – तू आया

वक़्त बिल्कुल हैरान

मेरे कमरे में खड़ा रह गया।

साँझ का सूरज अस्त होने को था,

पर न हो सका

और डूबने की क़िस्मत वो भूल-सा गया…

यह बेमिसाल पंक्तियां हैं मशहूर कवयित्री अमृता प्रीतम की. आज अमृता प्रीतम का जन्मदिन है. उनका जन्म 31 अगस्त 1919 को हुआ था. अमृता प्रीतम पंजाबी और हिंदी की प्रसिद्ध लेखिका थीं. उन्होंने सौ से अधिक कविताओं की किताब लिखी, साथ ही फिक्शन, बायोग्राफी, आलेख और आटोबॉयोग्राफी लिखा, जिसका कई भारतीय भाषाओं सहित विदेशी भाषाओं में भी अनुवाद हुआ. अमृता प्रीतम पहली महिला लेखिका हैं जिन्हें 1956 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. 1982 में उन्हें ‘कागज ते कैनवास’ के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला. 2004 में पद्मविभूषण भी प्रदान किया गया.

अमृता प्रीतम -इमरोज का अनूठा प्रेम

अमृता प्रीतम ने आजीवन यह कहा कि उन्हें साहिर लुधियानवी से प्रेम था. उनकी आत्मकथा और कविताओं में उनका प्रेम उजागर होता है. बावजूद इसके वे आजीवन इमरोज के साथ रहीं. इमरोज एक चित्रकार हैं और उनका असली नाम इंदरजीत है. हालांकि वे इमरोज नाम से ही ज्यादा जाने गये. इमरोज भी इस बात से भली-भांति परिचित थे कि अमृता साहिर को चाहतीं हैं, लेकिन उनका कहना था कि वो साहिर को चाहतीं हैं, तो क्या मैं उन्हें चाहता हूं. इमरोज और अमृता के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने एक दूसरे से कभी नहीं कहा कि उन्हें प्रेम है. इमरोज का यह भी कहना था कि बताने से प्रेम नहीं होता, यह तो अनुभूति की चीज है और हम इस बात को समझते थे. अमृता-इमरोज का रिश्ता कितना मजबूत था इसे समझने के लिए उनके जीवन की एक घटना का जिक्र जरूरी है.

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1958 में इमरोज को गुरुदत्त ने अपने साथ काम करने का मौका दिया. इमरोज ने यह बात खुशी से अमृता को बतायी, अमृता ने खुशी जाहिर की लेकिन उनकी आंख भर आयी, उन्हें ऐसा लगा कि साहिर के बाद इमरोज भी उन्हें छोड़कर चले जायेंगे. इमरोज के जाने वाले दिन अमृता को तेज बुखार हो गया. इमरोज मुंबई चले तो गये, लेकिन अमृता का दुख वे समझ गये और वापस चले आये, स्टेशन पर अमृता उन्हें मुस्कुराती मिली और उनका बुखार उतर गया था. अमृता जहां भी जातीं इमरोज उनके साथ होते थे और आजीवन साथ रहे. अमृता का निधन 31 अक्तूबर 2005 को हुआ. अमृता-इमरोज हमेशा साथ रहे कभी एक दूसरे को बिना यह कहे कि मुझे तुमसे प्रेम है. इनके अद्‌भुत और गहरे प्रेम संबंध पर अमृता की दोस्त उमा त्रिलोक ने एक किताब भी लिखी है.

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