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केरलम को हां, बांग्ला को ना क्यों? राज्यों और शहरों का नाम बदलने की प्रक्रिया और राजनीति

Updated at : 25 Feb 2026 5:27 PM (IST)
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Mamata Banerjee

ममता बनर्जी

Keralam : किसी शहर या राज्य का नाम बदलने की प्रक्रिया भारत में कोई नयी बात नहीं है. केरल का नाम केरलम करने के प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद देश में बहस और विवाद जरूर चल रहा हो, लेकिन यह एक सच्चाई है. बंबई का नाम मुंबई, कलकत्ता का नाम कोलकाता, मद्रास का नाम चेन्नई, उड़ीसा का नाम ओडिशा जैसे कई उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं. हां, इस बात पर बहस जरूर हो सकती है कि मोदी सरकार सिर्फ सांस्कृतिक और भाषाई अस्मिता के आधार पर नहीं बल्कि राजनीति में स्वहित के लिए शहरों और राज्यों का नाम बदल रही है.

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Keralam : केंद्रीय कैबिनेट द्वारा केरल का नाम केरलम करने के प्रस्ताव को स्वीकार करने के बाद से बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी बंगाल का नाम बांग्ला करने की मांग तेज कर दी है और इसको लेकर वो केंद्र सरकार पर हमलावर भी हैं. उन्हें उमर अब्दुल्ला जैसे लोगों का साथ भी मिल गया है. ममता बनर्जी का कहना है कि मोदी सरकार ने केरल के लोगों की भावनाओं को तो समझा, लेकिन बंगाल के लोगों के साथ राजनीति कर रही है और इसी वजह से बंगाल का नाम नहीं बदला जा रहा है.

क्या नाम बदलना महज राजनीति है?

ममता बनर्जी का आरोप है कि मोदी सरकार ने केरल का नाम केरलम करने के प्रस्ताव को मंजूरी इसलिए दी है क्योंकि उन्हें चुनाव में इसका फायदा मिलने की संभावना दिख रही है. मोदी सरकार को स्थानीय लोगों की भावनाओं की चिंता नहीं है, बल्कि उन्हें सिर्फ अपना हित दिखता है. हालांकि केंद्र सरकार इस बात से सहमत नहीं है, उनका कहना है कि बंगाल सरकार ने प्रदेश का नाम बांग्ला सुझाया था, जो उचित प्रतीत नहीं होता है, क्योंकि इससे विश्व में बांग्लादेश के नाम से भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है. इसके साथ ही केंद्र सरकार ने यह भी कहा है कि बंगाल जैसे बड़े राज्य का नाम बदलने की कई प्रक्रियाएं हैं, जिन्हें पूरा होने में समय लगता है. इसके पीछे किसी तरह की कोई राजनीति नहीं है.

किसी प्रदेश का नाम बदलना सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा मसला

किसी भी प्रदेश का नाम बदलने के पीछे वजह सांस्कृतिक पहचान होती है. केरल का नाम भी केरलम करने के पीछे उसकी सांस्कृतिक पहचान ही वजह है. केरलम का अर्थ मलयालम में नारियल की भूमि होता है. केरल में नारियल की खूब खेती होती है और वही वहां की पहचान है. इसी वजह से यह माना जाता है कि किसी भी राज्य का नाम वहां की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान के अनुसार होना चाहिए. हालांकि नाम बदलने का जो पक्ष विरोध करता है, उनका कहना है कि मोदी सरकार नाम बदलने के पीछे सिर्फ और सिर्फ राजनीति कर रही है. कई शहरों के नाम सिर्फ इसलिए बदले गए हैं क्योंकि वे मुगलकालीन थे.

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किसी प्रदेश का नाम बदलने की क्या है प्रक्रिया?

किसी भी शहर या राज्य का नाम बदलने की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है. सबसे पहले राज्य सरकार नाम बदलने का प्रस्ताव देती है. उसके बाद विधानसभा से पारित यह प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जाता है. केंद्र सरकार का गृह मंत्रालय उस प्रस्ताव के बारे में विभिन्न मंत्रालयों से सलाह–मशविरा करता है. अगर राज्य का नाम बदलने का प्रस्ताव हो तो संसद में इससे संबंधित विधेयक लाया जाता है और उसे साधारण बहुमत से पास कराया जाता है, उसके बाद उसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाता है. राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद नाम बदलने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. जैसे विभिन्न विभागों और अन्य दस्तावेजों में राज्य का नाम बदल दिया जाता है.

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

राजनीति,सामाजिक, इतिहास, खेल और महिला संबंधी विषयों पर गहन लेखन किया है. तथ्यपरक रिपोर्टिंग और विश्लेषणात्मक लेखन में रुचि. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक. IM4Change, झारखंड सरकार तथा सेव द चिल्ड्रन के फेलो के रूप में कार्य किया है. पत्रकारिता के प्रति जुनून है. प्रिंट एवं डिजिटल मीडिया में 20 वर्षों से अधिक का अनुभव.

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