केरलम को हां, बांग्ला को ना क्यों? राज्यों और शहरों का नाम बदलने की प्रक्रिया और राजनीति

Edited by Rajneesh Anand
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ममता बनर्जी

Keralam : किसी शहर या राज्य का नाम बदलने की प्रक्रिया भारत में कोई नयी बात नहीं है. केरल का नाम केरलम करने के प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद देश में बहस और विवाद जरूर चल रहा हो, लेकिन यह एक सच्चाई है. बंबई का नाम मुंबई, कलकत्ता का नाम कोलकाता, मद्रास का नाम चेन्नई, उड़ीसा का नाम ओडिशा जैसे कई उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं. हां, इस बात पर बहस जरूर हो सकती है कि मोदी सरकार सिर्फ सांस्कृतिक और भाषाई अस्मिता के आधार पर नहीं बल्कि राजनीति में स्वहित के लिए शहरों और राज्यों का नाम बदल रही है.

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Keralam : केंद्रीय कैबिनेट द्वारा केरल का नाम केरलम करने के प्रस्ताव को स्वीकार करने के बाद से बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी बंगाल का नाम बांग्ला करने की मांग तेज कर दी है और इसको लेकर वो केंद्र सरकार पर हमलावर भी हैं. उन्हें उमर अब्दुल्ला जैसे लोगों का साथ भी मिल गया है. ममता बनर्जी का कहना है कि मोदी सरकार ने केरल के लोगों की भावनाओं को तो समझा, लेकिन बंगाल के लोगों के साथ राजनीति कर रही है और इसी वजह से बंगाल का नाम नहीं बदला जा रहा है.

क्या नाम बदलना महज राजनीति है?

ममता बनर्जी का आरोप है कि मोदी सरकार ने केरल का नाम केरलम करने के प्रस्ताव को मंजूरी इसलिए दी है क्योंकि उन्हें चुनाव में इसका फायदा मिलने की संभावना दिख रही है. मोदी सरकार को स्थानीय लोगों की भावनाओं की चिंता नहीं है, बल्कि उन्हें सिर्फ अपना हित दिखता है. हालांकि केंद्र सरकार इस बात से सहमत नहीं है, उनका कहना है कि बंगाल सरकार ने प्रदेश का नाम बांग्ला सुझाया था, जो उचित प्रतीत नहीं होता है, क्योंकि इससे विश्व में बांग्लादेश के नाम से भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है. इसके साथ ही केंद्र सरकार ने यह भी कहा है कि बंगाल जैसे बड़े राज्य का नाम बदलने की कई प्रक्रियाएं हैं, जिन्हें पूरा होने में समय लगता है. इसके पीछे किसी तरह की कोई राजनीति नहीं है.

किसी प्रदेश का नाम बदलना सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा मसला

किसी भी प्रदेश का नाम बदलने के पीछे वजह सांस्कृतिक पहचान होती है. केरल का नाम भी केरलम करने के पीछे उसकी सांस्कृतिक पहचान ही वजह है. केरलम का अर्थ मलयालम में नारियल की भूमि होता है. केरल में नारियल की खूब खेती होती है और वही वहां की पहचान है. इसी वजह से यह माना जाता है कि किसी भी राज्य का नाम वहां की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान के अनुसार होना चाहिए. हालांकि नाम बदलने का जो पक्ष विरोध करता है, उनका कहना है कि मोदी सरकार नाम बदलने के पीछे सिर्फ और सिर्फ राजनीति कर रही है. कई शहरों के नाम सिर्फ इसलिए बदले गए हैं क्योंकि वे मुगलकालीन थे.

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किसी प्रदेश का नाम बदलने की क्या है प्रक्रिया?

किसी भी शहर या राज्य का नाम बदलने की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है. सबसे पहले राज्य सरकार नाम बदलने का प्रस्ताव देती है. उसके बाद विधानसभा से पारित यह प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जाता है. केंद्र सरकार का गृह मंत्रालय उस प्रस्ताव के बारे में विभिन्न मंत्रालयों से सलाह–मशविरा करता है. अगर राज्य का नाम बदलने का प्रस्ताव हो तो संसद में इससे संबंधित विधेयक लाया जाता है और उसे साधारण बहुमत से पास कराया जाता है, उसके बाद उसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाता है. राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद नाम बदलने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. जैसे विभिन्न विभागों और अन्य दस्तावेजों में राज्य का नाम बदल दिया जाता है.

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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