जानिए, अगर कोई दलित अपना लेता है ईसाई धर्म, तो उसे क्यों नहीं मिलेगा कानूनी संरक्षण और आरक्षण
सुप्रीम कोर्ट ने बताया ईसाई को क्यों नहीं मिल सकता एससी का दर्जा
Scheduled Caste status : हिंदू धर्म की बुराइयों में से एक है अस्पृश्यता यानी छूआछूत और यहीं से जन्मी है अनुसूचित जाति (Scheduled Caste). आजादी के बाद राष्ट्र निर्माताओं ने यह माना कि इतिहास में छूआछूत की वजह से समाज के निम्न तबकों के साथ काफी दुर्व्यवहार हुआ, जिसकी वजह से वे समाज की मुख्यधारा से बाहर हो गए, इसलिए उन्हें एससी श्रेणी में लाकर कई सुविधाएं और कानूनी संरक्षण दिया गया. समय के साथ एससी श्रेणी के कई लोगों ने धर्म परिवर्तन कर लिया और ईसाई बन गए. अब सवाल यह है कि क्या एक एससी श्रेणी के व्यक्ति को धर्म परिवर्तन के बाद भी वह सुविधाएं और सुरक्षा मिलेंगी, जो पहले मिलती थीं. सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में मंगलवार को अपना फैसला सुनाया है. आइए समझते हैं.
Scheduled Caste status : सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा है कि अनुसूचित जाति के लोगों को मिलने वाली सुविधाएं और कानूनी संरक्षण सिर्फ और सिर्फ हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म मानने वालों को ही दी जा सकती है. अन्य किसी भी धर्म को मानने वाले इन सुविधाओं का उपयोग नहीं कर सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें यह कहा गया था कि अगर अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति ईसाई धर्म स्वीकार कर लेता है, तो उसका Scheduled Caste(अनुसूचित जाति) का दर्जा समाप्त हो जाता है.
संविधान के अनुच्छेद 341 में अनुसूचित जाति के संबंध में दी गई है जानकारी
भारत का संविधान लागू होने के बाद अनुच्छेद 341 में अनुसूचित जातियों के बारे में उल्लेख किया गया. राष्ट्रपति के आदेश से देश और राज्यों के एससी श्रेणी की जातियों को अधिसूचित किया गया है. संसद के पास यह अधिकार है कि वह इस सूची को संशोधित कर सके. 1950 में जब राष्ट्रपति ने सूची को जारी किया, तो उसमें सिर्फ हिंदू धर्म के लोगों को ही एससी की सूची में शामिल किया गया था, लेकिन बाद में सिख और बौद्ध धर्म के लोग भी एससी की श्रेणी में शामिल कर लिए गए. सिखों को 1956 में और बौद्ध धर्म के अनुयायियों को 1990 में एससी की श्रेणी में शामिल किया गया.
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ईसाई या मुसलमान क्यों नहीं पा सकते हैं SC का दर्जा?
संविधान में एससी का दर्जा उन लोगों को दिया गया था, जो समाज में काफी दबे–कुचले थे और जिनके साथ अस्पृश्यता यानी छूआछूत का व्यवहार किया गया था. चूंकि यह सामाजिक संरचना सिर्फ हिंदू धर्म के लोगों में ही मौजूद थी, इसलिए हिंदू धर्म के उन लोगों को एससी की श्रेणी में रखा गया, जो छूआछूत के शिकार थे. ईसाई और मुसलमान धर्म के लोगों में इस तरह का कोई भेदभाव नहीं बताया जाता है. एससी श्रेणी में शामिल लोगों को समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए उन्होंने शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिला. इसके अलावा पंचायतों, विधानसभाओं और संसद में भी भागीदारी दी गई और आरक्षण का लाभ दिया गया. एससी समुदाय के लोगों को सामाजिक सुरक्षा देने के लिए एससी/एसटी एक्ट का लाभ दिया गया, ताकि अगर कोई व्यक्ति या समाज उनके साथ जाति आधारित भेदभाव करता है, तो वे कानून का सहारा ले सकें.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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