पाकिस्तान में ट्रेन हाईजैक करने वाली बलूच लिबरेशन आर्मी की मांग क्या है, वे क्यों 1948 से ही कर रहे विद्रोह?

Edited by Rajneesh Anand
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1947 में बलूचिस्तान ने की थी स्वतंत्रता की घोषणा

Pakistan Train Hijack : बलूच लिबरेशन आर्मी ने एक बार फिर बलूचिस्तान की स्वतंत्रता के लिए आवाज बुलंद की है और पाकिस्तान सरकार को हिलाकर रख दिया है. बीएलए ने 400 यात्रियों से भरी हुई जाफर एक्सप्रेस को हाईजैक कर अपनी उपस्थिति जोरदार ढंग से पेश की है. बलूच लिबरेशन आर्मी का कहना है कि पाकिस्तान ने 1948 में जबरदस्ती बलूचिस्तान को पाकिस्तान में शामिल किया. बलूचिस्तान के लोग यह दावा करते हैं कि उनकी सभ्यता-संस्कृति अलग है जिसे पाकिस्तान का पंजाबी बहुल शासन मिटाना चाहता है. साथ ही वे यह भी कहते हैं कि पाकिस्तान उनका दोहन कर रहा है. भारत ने बलूच मानवाधिकारों की बात कई बार की है, लेकिन अधिकारिक रूप से उनके आंदोलन का समर्थन नहीं किया है

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Pakistan Train Hijack : पाकिस्तान से अलग बलूचिस्तान की मांग को लेकर बलूच आतंकवादियों ने बलूचिस्तान के बोलन जिले के पास जाफर एक्सप्रेस ट्रेन को हाईजैक कर लिया. इस घटना में अबतक 155 यात्रियों को बचाया गया है. 27 आतंकी मारे गए हैं, जबकि 11 मार्च से 12 मार्च तक के रेस्क्यू ऑपरेशन में अबतक 30 सुरक्षाकर्मियों के मारे जाने की सूचना है. ट्रेन को हाईजैक करना एक बड़ा ही संगीन मामला है और इस घटना ने पूरे विश्व का ध्यान इस ओर खींचा है. आतंकवादियों ने मशकफ सुरंग के पास ट्रेन को हाईजैक किया. पाकिस्तानी एजेंसियों के अनुसार जाफर एक्सप्रेस को जब हाईजैक किया गया, उस वक्त ट्रेन में 400 यात्री थे. यह ट्रेन क्वेटा से चली थी. बलूच लिबरेशन आर्मी ने हाइजैक करने की जिम्मेदारी ली है और बयान जारी कर यह कहा है कि वे मातृभूमि के लिए संघर्ष कर रहे हैं और जबतक उनकी मांग पूरी नहीं होगी वे संघर्ष करते रहेंगे.

क्या है बलूच लिबरेशन आर्मी?

बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) पाकिस्तान का एक प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन है. यह आर्मी पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रांत बलूचिस्तान सक्रिय है. बलूच लिबरेशन आर्मी का गठन 2000 के दशक की शुरुआत में हुआ था, हालांकि यह अधिकारिक स्थापना का वर्ष है. बलूच लिबरेशन आर्मी 1970 से ही सक्रिय रहा था, लेकिन उस वक्त इसके खिलाफ अभियान चलाकर इसे दबा दिया गया थाो यह आर्मी यह चाहती है कि बलूचिस्तान को एक स्वतंत्र मुल्क बनाया जाए और उसका अपना अस्तित्व हो. यही वजह है कि बलूच लिबरेशन आर्मी पाकिस्तानी सेना के खिलाफ संघर्षरत है.

बलूचिस्तान को स्वतंत्र करने की मांग कब और क्यों उठी?

Baloch Liberation Army
बलूच लिबरेशन आर्मी

1947 में जब भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान एक अलग मुल्क बना, उसी वक्त से बलूचिस्तान अलग देश की मांग उठती रही है. बलूचों का आरोप यह है कि पाकिस्तान ने उन्हें जबरन अपने में शामिल कर लिया था, जबकि वे उसी वक्त से अपनी अलग पहचान के लिए आवाज बुलंद कर रहे हैं और खुद को अलग राष्ट्र के रूप में देखते हैं. अंग्रेजों ने आजादी के वक्त जब देसी रियासतों को अपने भविष्य का फैसला करने की इजाजत दी थी, तो उनके पास तीन विकल्प थे- पहला वे भारत में शामिल हो जाएं, दूसरा वे पाकिस्तान में शामिल हो जाएं और तीसरा वे स्वतंत्र भी रह सकते हैं. उस वक्त बलूचिस्तान की कलात रियासत जो एक बड़े हिस्से में फैली थी उसने स्वतंत्र रहने का फैसला किया था और 11 अगस्त को अपनी स्वतंत्रता घोषित भी कर दी थी, उसे 1948 में पाकिस्तान ने अपने में मिला लिया था. उसी वक्त से बलूचिस्तान में अलग देश की मांग उठती रही है.

क्या है बलूच लिबरेशन आर्मी की स्थिति

अधिकारिक स्थापना के बाद से बलूच लिबरेशन आर्मी ज्यादा सक्रिय है. बलूच नेता नवाब अकबर बुग्ती की 2006 में जब हत्या हुई तो बलूचिस्तान में विद्रोह ज्यादा तेज हो गया. बलूच लिबरेशन आर्मी ने पाकिस्तानी सेना और सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमले तेज कर दिए, जिसके बाद पाकिस्तान सरकार ने बलूच लिबरेशन आर्मी पर प्रतिबंध लगा दिया. बलूच सेना आर्मी लगाता पाकिस्तान और चीन की सरकार को यह चेतावनी दे रहा है कि वह बलूचिस्तान में उनके मर्जी के बिना कोई काम ना करें, इसका विरोध करने के लिए BLA ने चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) से जुड़े ठिकानों पर हमले भी किए, परिणाम उसपर प्रतिबंध के रूप में सामने आया. अमेरिका ने भी बलूच लिबरेशन आर्मी पर प्रतिबंध लगा रखा है.

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अलग मुल्क बलूचिस्तान की मांग क्यों?

बलूचों का दावा है कि वे पाकिस्तान से अलग हैं. उनकी सभ्यता-संस्कृति कुछ भी पाकिस्तानियों से मेल नहीं खाती है. वे यह मानते हैं कि पाकिस्तान में पंजाबियों की जो संस्कृति है वे उनसे अलग हैं. साथ ही बलूचिस्तान में खनिज संपदा का भंडार होने के बाद भी यह क्षेत्र विकास से कोसों दूर है, जिसकी वजह से यहां के लोग दोहन का आरोप लगाते रहे हैं. यहां मुख्यत: बलूच जाति के लोग रहते हैं, जो बलोची बोलते हैं. ये लोग खुद को ईरानी मूल का बताते हैं इनकी उपजातियां इस प्रकार है-

  • मरी (Marri)
  • बुग्ती (Bugti)
  • रिंद (Rind)
  • मेंगल (Mengal)
  • बलोच (Baloch)
  • लशारी (Lashari)
  • नौशेरवानी (Nausherwani)

बलूचिस्तान में पश्तून जाति के लोग भी रहते हैं जिनकी भाषा पाश्तो है. ये लोग क्वेटा और उसके आसपास के इलाकों में ज्यादा रहते हैं. इनके अलावा ब्राहुई जाति के लोग भी बलूचिस्तान में हैं. इनकी भाषा ब्राहुई है. इन लोगों का मानना है कि पाकिस्तान का पंजाबी बहुल प्रशासन इनकी पहचान को मिटाना चाहता है.

बलूचों के 5 बड़े विद्रोह

बलूचिस्तान की स्वतंत्रता के लिए बलूचों ने कई बार विद्रोह किया, लेकिन उन्हें अबतक सफलता नहीं मिली है. बलूचों के विद्रोह इस प्रकार हैं-

  • पहला विद्रोह 1948 : पाकिस्तानी सेना ने  विद्रोह को दबा दिया. 
  • दूसरा विद्रोह 1958-59: सेना ने कुचल दिया.
  • तीसरा विद्रोह 1962-69: सेना ने दबा दिया.
  • चौथा विद्रोह 1973-77: इस विद्रोह में हजारों बलूच शहीद हुए
  • पांचवां विद्रोह 2004 से जारी : बलूच लिबरेशन आर्मी और पाकिस्तानी सेना में संघर्ष

बलूचिस्तान के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय प्रमुख संगठन इस प्रकार हैं –

  • बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA)
  • बलूच रिपब्लिकन आर्मी (BRA)
  • बलूच लिबरेशन फ्रंट (BLF)
  • बलूच नेशनल मूवमेंट (BNM)

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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