Kolkata Doctor Case : 51 साल पहले ऑन ड्यूटी नर्स अरुणा शानबाग हुई थी वहशीपन का शिकार, कोलकाता में दोहराया, क्या बदला हमने?

Published by : Rajneesh Anand Updated At : 18 Aug 2024 7:03 AM

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Kolkata Doctor Case : कोलकाता के आरजी कर अस्पताल में जब नौ अगस्त की रात को एक जूनियर डाॅक्टर के साथ हैवानियत हुई, तो पूरे देश में डाॅक्टर्स की सुरक्षा का मुद्दा गरमाया हुआ है. लेकिन दरअसल यह डाॅक्टर की सुरक्षा का मसला नहीं है, बल्कि यह एक महिला की सुरक्षा का मामला है. देश में तमाम कानूनों के बावजूद इस तरह की दरिंदगी होती रहती है. मुंबई के केजीएम अस्पताल में 51 साल पहले ऑन ड्‌यूटी नर्स अरुणा शानबाग के साथ अस्पताल के सफाई कर्मचारी ने बलात्कार किया था

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Kolkata Doctor Case : 1973 मुंबई का केजीएम अस्पताल एक ऑन ड्यूटी नर्स अरुणा शानबाग, उम्र 25 वर्ष के साथ अस्पताल के ही एक सफाईकर्मी ने हैवानियत की. उसके साथ दुष्कर्म किया वह भी उसके गले में लोहे का चेन बांधकर जिससे उसका पूरा शरीर पैरालाइज हो गया और 42 वर्षों तक कोमा में रहने के बाद 2015 को उसकी मौत हुई. उस वक्त भी संवेदना जताई गई, महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा उठा.

नौ अगस्त 2024 कोलकाता के आरजी कर अस्पताल में एक ऑन ड्‌यूटी जूनियर डाॅक्टर के साथ दुष्कर्म किया गया और फिर उसकी हत्या कर दी गई. उसकी साथ मारपीट की गई,गले की हड्डी तोड़ी गई और प्राइवेट पार्ट को डैमेज किया गया. मतलब स्त्री के शरीर के साथ हर तरह की हैवानियत की गई. 36 घंटे से लगातार ड्‌यूटी कर रही कोलकाता की जूनियर डाॅक्टर को उसके भाई ने रात को 2:30 बजे मैसेज किया था, जिसे उसने रीड करके छोड़ दिया और शायद सो गई. उसके बाद जो कुछ हुआ, उसकी कल्पना उसके परिवार वालों ने नहीं की थी. एक बार फिर महिला सुरक्षा का मुद्दा चर्चा में है, क्योंकि महिला डाॅक्टर थी, इसलिए देश भर के डाॅक्टर सुरक्षा की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.

सवालों के घेरे में महिला सुरक्षा

बड़ा सवाल यह है कि 1973 से 2024 तक में महिला सुरक्षा को लेकर कितना बदला हमारा देश? आज भी महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं और हैवानियत झेलती हैं, यानी 51 साल  में महिला सुरक्षा का कुल जमा हासिल है ‘जीरो’. अर्थव्यवस्था भले ही देश की चार ट्रिलियन की होने जा रही हो, लेकिन हम अपनी बेटियों को क्या दे रहे हैं? यह सवाल देश की  राज्य सरकारों और केंद्र की सरकार से बेटियां पूछ रही हैं?  यहां यह भी गौर करने वाली बात है कि यह उदाहरण आधुनिक भारत का है, त्रेता या द्वापर युग से उदाहरण नहीं लिए गए हैं. 

कोलकाता की जूनियर डाॅक्टर के साथ हुए रेप के बाद देश भर के डाॅक्टर गुस्से में हैं और विरोध प्रदर्शन का सिलसिला देशव्यापी हो गया है. डाॅक्टर्स की सुरक्षा बढ़ाए जाने की बात हो रही है और केंद्रीय कानून की बात भी हो रही है. लेकिन यहां भी बड़ा सवाल यह है कि क्या कानून बन जाने से सुरक्षा मिल जाएगी. हम सबको याद है कि 2012 में जब निर्भया केस हुआ, तो उसके बाद जस्टिस वर्मा की कमेटी ने महिलाओं को सुरक्षा देन के लिए कई सिफारिशें कीं, जिनमें से कुछ कानून भी बने.

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रेप की सजा में हुए बड़े बदलाव

परिणाम क्या हुआ?

देश में महिलाओं को सुरक्षित माहौल देने की कोशिश में सरकारों ने रेप के खिलाफ कानून बनाए हैं और उसके क्रियान्वयन को लेकर गंभीर भी है, बावजूद इसके देश में हर घंटे बलात्कार के मामले सामने आ रहे हैं. एनसीआरबी के आंकड़े जो उपलब्ध हैं वे 2022 के हैं, उसके अनुसार देश में एक दिन में बलात्कार के दर्ज मामले 86 हैं, नवीनतम आंकड़ों की जानकारी नहीं हैं, क्योंकि एनसीआरबी ने उसके बाद कोई डेटा जारी नहीं किया है. 2012 के बाद भी देश में कुछ बड़ी घटनाएं हुईं हैं –

1. कठुआ रेप केस-जनवरी 2018 में एक आठ वर्षीय बच्ची के साथ रसाना गांव में सात लोगों ने सामूहिक दुष्कर्म किया, जिसमें एक नाबालिग भी शामिल था.

 2. शक्ति मिल्स रेप केस-2013 में एक 22 वर्षीय फोटो जर्नलिस्ट के साथ शक्ति मिल्स में पांच लोगों ने सामूहिक दुष्कर्म किया,जबकि वह अपने एक सहयोगी के साथ ड्‌यूटी पर थी.

3. जीशा रेप एंड मर्डर केस-2016 में केरल में कानून की एक छात्रा के साथ उसके अपने घर में हैवानियत हुई और फिर उसकी हत्या कर दी गई.

4. हाथरस रेप कांड -2020 में यूपी के हाथरस में एक दलित लड़की के साथ रेप हुआ और हैवानियत इतनी थी इलाज के दौरान लड़की की मौत हो गई.

5. हैदराबाद रेप केस -2019 में एक वेटनरी डाॅक्टर के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ और फिर उसकी हत्या करके शव को जला दिया गया.

New Criminal Laws में भी महिलाओं को दी गई है सुरक्षा

भारतीय न्याय संहिता देश में एक जुलाई से लागू हो गया है. इस संहिता में एक नया चैप्टर जोड़ा गया है जिसे नाम दिया गया है -क्राइम अगेंस्ट वूमेन एंड चाइल्ड. इस चैप्टर में यौन अपराधों की चर्चा है, साथ ही इस संहिता में 18 साल से कम उम्र की महिलाओं के साथ अगर बलात्कार होता है तो उसकी सजा में बदलाव का प्रावधान किया गया है. नाबालिग महिला से सामूहिक बलात्कार से संबंधित प्रावधान को इस संहिता में POCSO एक्ट के अनुरूप बनाया जाएगा. साथ ही इस संहिता में यह प्रावधान भी है कि अगर 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ बलात्कार होता है तो दोषी को आजीवन कारावास या मृत्युदंड दिया जाए. संहिता में यह व्यवस्था भी की गई है कि बलात्कार पीड़ितों की जांच करने वाले चिकित्सकों को सात दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट जांच अधिकारी को सौंपनी होगी. न्याय संहिता में रेप को रोकने के काफी कठोर कानून बनाए गए है. गैंगरेप के सभी मामलों में 20 साल की कैद होगी या फिर आजीवन कारावास की सजा होगी. इसमें 18 साल से कम उम्र की लड़कियों के साथ रेप का नया कानून भी शामिल है. 

दर्ज केस की तुलना में सजा काफी कम

इतना कुछ होने के बाद भी देश में रेप की घटनाएं जिस तरह से सामने आती हैं, उस अनुपात में सजा काफी कम लोगों को होती है. 2022 में रेप के 33 हजार से अधिक मामले सामने आए, लेकिन सजा उनमें से 27 से 28 प्रतिशत लोगों को हुई. इसके जो कारण सामने आते हैं, उसमें देश का सामाजिक बनावट सबसे प्रमुख है. पीड़ित महिला बदनामी के डर से पीछे हट जाती है, कई बार आरोपी प्रभावशाली व्यक्ति होता है, जिसकी वजह से जांच प्रभावित होता है. साक्ष्य और गवाह का अभाव भी आरोपियों को सजा से बचा लेता है. कोलकाता की डाॅक्टर के मामले में भी कुछ इसी तरह के खुलासे हो रहे हैं. संजय राय जो कि आरोपी है, वह किस तरह अस्पताल के उस एरिया में प्रवेश करता है, जो सिर्फ डाॅक्टर्स के लिए सुरक्षित थी, यह बड़ा सवाल है.  सीसीटीवी फुटेज में जो सच दिख रहा है उसके अनुसार वह 11 बजे रात को इमरजेंसी वार्ड में आता है, फिर कुछ देर बाद चला जाता है. फिर देर रात वह नशे में धुत दिखाई देता है. चार बजे सुबह उसे अस्पताल के बाहर जाते हुए देखा जाता है. डाॅक्टर की शिफ्ट अमूमन 10-12 घंटे की हो सकती थी, लेकिन पीड़ित डाॅक्टर 36 घंटे से ड्‌यूटी पर थी.

देश को हिला देने वाले मामले

मथुरा रेप केस : मथुरा नाम की आदिवासी किशोरी के साथ पुलिस कस्टडी में 1972 में रेप हुआ. यह केस काफी चर्चित इसलिए भी हुआ क्योंकि रेप के कानूनों में इस घटना के बाद काफी परिवर्तन हुआ. 1974 में जिला न्यायालय ने उसे शारीरिक संबंध की आदी बताते हुए दोनों पुलिसकर्मियों को बरी कर दिया था और कहा गया था कि शारीरिक संबंध बनाए गए हैं, कोई बलात्कार नहीं हुआ है. बाद में काफी विरोध प्रदर्शन हुआ और सरकार को बलात्कार के कानूनों में बदलाव करना पड़ा.

अरुणा शानबाग : मुंबई के केजीएम अस्पताल में ऑन ड्‌यूटी नर्स के साथ अस्पताल के सफाई कर्मी ने रेप किया. इस घटना के बाद अरुणा शानबाग 42 साल तक कोमा में रही थीं. उनके गले में लोहे की चेन बांधकर दरिंगदगी की गई थी, जिससे पूरा शरीर पैरालाइज हो गया था.

दिल्ली गैंगरेप : 2012 में एक लड़की के साथ दिल्ली में इस तरह की हैवानियत हुई कि देश में बलात्कार के कानूनों पर एक बार फिर पुनर्विचार हुआ और मौत की सजा का प्रावधान इसमें जुड़ा.

कठुआ रेप केस: कठुआ रेप केस में पीड़िता मात्र आठ साल की थी. इस घटना ने इतना तूल पकड़ा कि 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ रेप होने पर मौत की सजा का प्रावधान किया गया.

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किस रेप केस के बाद देश में बलात्कार से संबंधित कानून बदले गए?

1972 का मथुरा रेप केस. मथुरा एक आदिवासी दलित लड़की थी.

जस्टिस वर्मा की कमेटी कब गठित हुई?

2012 के दिल्ली गैंगरेप के बाद जस्टिस वर्मा की कमेटी गठित हुई, जिसने बलात्कार के लिए मौत की सजा की सिफारिश की.

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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