पीएम मोदी ने चोल कालीन 1000 साल पुराने ताम्रपत्रों की स्वदेश वापसी को बताया गर्व का क्षण, क्या आप राजेंद्र चोल को जानते हैं?

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PM Modi with Netherland PM

नीदरलैंड के प्रधानमंत्री चोल युगीन ताम्रपत्र पीएम मोदी को सौंपते हुए

Chola Copper Plates : भारत ने नीदरलैंड से 11वीं सदी की ऐतिहासिक चोल कालीन ताम्रपत्र को सफलतापूर्वक वापस लाकर एक बड़ी कूटनीति और सांस्कृतिक जीत हासिल की है. पीएम नरेंद्र मोदी और डच प्रधानमंत्री रॉब जेटन की मौजूदगी में इन ताम्रपत्रों को भारत को सौंपा गया. इस मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने नीदरलैंड सरकार का भी शुक्रिया अदा किया और लेडेन यूनिवर्सिटी की तारीफ की, जहां 19वीं सदी से इन ताम्रपत्रों को संभाल कर रखा गया था. भारत सरकार 2012 से इन ताम्रपत्रों को देश वापस लाने की कोशिश कर रही थी.

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Chola Copper Plates : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात के 134वें एपिसोड में चोल साम्राज्य की कॉपर प्लेट्स का जिक्र किया. उन्होंने बताया कि जब वे नीदरलैंड की यात्रा पर गए थे, उसी दौरान उन्हें चोल युगीन ताम्र पत्र दिए गए. पीएम मोदी ने बताया कि इन ताम्र पत्रों को 300 साल बाद भारत वापस लाया गया है. यह ताम्रपत्र भारतीय सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक हैं. पीएम मोदी ने कहा कि भारत वापस लाई गई चोल-युग की प्लेटों में 21 बड़ी और तीन छोटी तांबे की प्लेटें शामिल हैं. आइए जानते हैं इन ताम्र पत्रों की और राजा राजेंद्र चोल की खासियत, जिनके शासन की खूबियां इन प्लेटों में दर्ज है.

चोल युग की 21 बड़ी और 3 छोटी प्लेटें पीएम मोदी को सौंपी गई

Coppers-plates
चोल कालीन ताम्रपत्र और उनका मुहर

नीदरलैंड में पीएम मोदी को चोल राजवंश के शासनकाल की कुल 24 प्लेटें सौंपी गईं. इन प्लेटों में 21 बड़ी और 3 छोटी प्लेटें शामिल हैं. इन ताम्र पत्रों का वजन 30 किलोग्राम है. इन ताम्र पत्रों को कांसे के छल्ले से बांधा गया है, जिस पर चोल राजवंश की शाही मुहर लगी हुई है.यह ताम्र पत्र 11 शताब्दी की हैं. उस वक्त दक्षिण में चोल राजाओं का शासन था और राजेंद्र चोल के हाथों में कमान थी. वे चोल शासक राजराजा चोल के बेटे थे. इन पट्टिकाओं में तमिल और संस्कृत में उस काल की महत्वपूर्ण बातें लिखी हुई हैं. इन प्लेटों में नागपट्टिनम के पास अनाइमंगलम गांव को बौद्ध विहार, चूड़ामणि विहार के रखरखाव के लिए दी गई स्थायी जमीन और रेवेन्यू ग्रांट का रिकॉर्ड है. राजराजा ने यह आदेश बोलकर जारी किया था. उनके बेटे राजेंद्र चोल ने इस ऑर्डर को तांबे की प्लेटों पर औपचारिक रूप से लिखवाया था ताकि उनके दान को स्थायी कानूनी और शाही अधिकार मिल सके. इन ताम्र पत्रों में चोल वंश की समुद्री ताकत और दक्षिण एशियाई देशों से उनके संबंधों का भी उल्लेख है. इतिहासकार इन ताम्रपत्रों को चोल साम्राज्य की सबसे महत्वपूर्ण अभिलेखों में से एक मानते हैं.

ये ताम्रपत्र नीदरलैंड कैसे पहुंचे?

चोल कालीन ताम्र पत्र आखिर भारत से नीदरलैंड कैसे पहुंचे? यह सवाल सबके मन में उठता है, तो आप यह जान लें कि 17वीं-18वीं सदी में नागपट्टिनम क्षेत्र डच नियंत्रण में था, तब ये ताम्रपत्र वहां से नीदरलैंड ले जाए गए. बाद में उन्हें लीडेन विश्वविद्यालय( Leiden University) के संग्रह का हिस्सा बनाया गया. भारत 2012 से इन्हें वापस लाने की कोशिश कर रहा था और 2026 में सफलता मिली है.

राजेंद्र चोल कौन थे?

चोल साम्राज्य दक्षिण भारत के सबसे अधिक शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था. राजेंद्र चोल उसके सबसे प्रसिद्ध शासकों में से एक थे. वे महान चोल सम्राट राजराजा चोल प्रथम के बेटे थे. उन्होंने लगभग 1014 से 1044 ईस्वी तक शासन किया और चोल साम्राज्य को शिखर तक पहुंचाया. राजेंद्र चोल ने दक्षिण भारत से निकलकर पूर्वी भारत तक सैन्य अभियान चलाया और गंगा क्षेत्र तक अपनी शक्ति का विस्तार किया. उन्होंने पाल राजवंश के साथ युद्ध किया था और उनसे काफी संपत्ति जीती थी. इसी जीत की याद में उन्होंने गंगैकोंड चोलपुरम नामक नई राजधानी बसाई, जिसका अर्थ है -गंगा को जीतने वाला चोल राजा. राजेंद्र चोल ने पूरे दक्षिण भारत में अपनी सत्ता जमाने के बाद अपनी नौसेना को मजबूत किया, जिसके लिए उनकी ख्याति बहुत ज्यादा है. दक्षिण एशियाई देशों के साथ उनके व्यापार और युद्ध की खूब चर्चा होती है. उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया तक नौसैनिक अभियान चलाए और उस समय के शक्तिशाली श्रीविजय साम्राज्य को चुनौती दी थी. यह साम्राज्य आधुनिक इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप पर स्थित एक शक्तिशाली और समृद्ध मलय बौद्ध समुद्री साम्राज्य था. मजबूत समुद्री ताकत की वजह से चोल साम्राज्य का व्यापार और प्रभाव भारत से बाहर तक फैल गया.राजेंद्र चोल को इतिहासकार भारत के सबसे सफल समुद्री और साम्राज्यवादी शासकों में गिनते हैं. राजेंद्र चोल ने अपना प्रभाव हिंद महासागर में स्थापित कर लिया था.

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रजनीश आनंद

लेखक के बारे में

By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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